अब दिखी डरी हुई ट्रेन

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हैरानी है कि अमृतसर रेल हादसे से रेलवे को सबक मिल गया पर लोगों को नहीं. एक वीडियो आज कल सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हो रहा है जो हैरान कर देने वाला है. अभी अमृतसर हादसे को हुए चार दिन ही हुए हैं और लोग हैं कि जान पर खेल रहे हैं. दरअसल ये जान पर खेलने वाला अंदाज़ नहीं ये लापरवाही का बहुत बड़ा अंदाज़ है जो आजकल हिन्दुस्तानियों में सर्वत्र देखने को मिल रहा है.

वायरल वीडियो में देख के समझ नहीं आ रहा है कि क्या प्रतिक्रिया दें? इस वीडियो में दिखाया जा रहा है कि एक ट्रैन किसी क्रासिंग पर बेबस खड़ी है. हॉर्न भी बजा रही है. लेकिन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता. लोग उसके सामने ही निर्लज्जता से पटरी को क्रॉस कर के आजा रहे हैं. मोटरसाइकिल वाला हो या स्कूटर पर बच्चों को बैठाये व्यक्ति या ऑटोरिक्शे में स्कूल के बच्चों को ले जारहा ड्राइवर या पैदल चल रहे लोग या कार में बैठ कर जा रहे समझदार. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि ट्रेन को रास्ता दें. किसी को ये भी फर्क नहीं पड़ता कि वे ये देख लें कि वे चल कहां रहे हैं. आप भी अवश्य देखिएगा भारत के इन बेशर्म लोगों का ये वी़डियो!

हम वीडियो में आगे देखते हैं कि इस ट्रैन से गार्ड उतर कर नीचे आता है. वो लाल झंडा दिखा कर गाडी को रोकने पर विवश है. गाडी तो पहले ही रुकी है, लाल और हरे झंडे से पहले ही उसको सामने से आ रहे और जा रहे लोग साफ़ नज़र आ रहे हैं. फिर हम देखते हैं कि एक ट्रैफिक पुलिस टाइप के सज्जन आकर लोगों को रोकने का प्रयास कर रहे हैं पर लोग हैं कि मानते नहीं. दरअसल इस देश के लोगों को डंडे की बुरी तरह जरूरत है. बिना डंडे के उनको ये समझ नहीं आता कि क्या करना उनका कर्तव्य है और क्या करना बेशर्मी!

लापरवाही तो छोटा शब्द है यह व्यवहार शुद्ध गैरज़िम्मेदाराना भाव है जो बेशर्मी का दूसरा नाम है. साठ लोगों की मौत जिस तरह से हुई उससे शायद लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा. क्या वास्तव में हमें किसी के मरने जीने से कोई फर्क नहीं पड़ता? क्या हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि हज़ारों लोगों को लेकर चल रही ट्रेन को हम जगह दें, चलने देंं? कोई दुर्घटना हो जाये तो फिर राष्ट्रीय संपत्ति पर पत्थर फेंकने कांच फोड़ने और देश के लाखों करोड़ों का नुकसान करने में कोई पीछे नहीं रहेगा. क्या वास्तव में हम स्वार्थ में इतने अंधे हो गए हैं कि सामाजिक और राष्ट्रीय नियम-कायदों को ठेंगे पर रखते हैं? क्या यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र है?

(पारिजात त्रिपाठी)

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