अयोध्या और बाबरी ढांचे का असल सच

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भारत विश्व का सबसे पुराना देश है और अयोध्या विश्व का सबसे पुराना शहर। सृष्टि की रचना के साथ ही विश्व मे 2 सभ्यताओं का आगमन हुआ, पहली मानव सभ्यता जिसे महर्षि मनु ने बनाया था और दूसरी असुर सभ्यता जिसे कई असुरो ने मिलकर बनाया।

असुर एकजुट होकर रहते थे और अपनी मनमानी करते थे। उत्तर में सरयू नदी के तट पर मनु को एक पुत्र हुए इक्ष्वाकु। इक्ष्वाकु ने ही अयोध्या की स्थापना की और उसके पहले राजा बने। अयोध्या को हमेशा इस बात का घमंड रहेगा कि इतिहास के सबसे ज्यादा महान राजा उसी की कोख से जन्मे।

इक्ष्वाकु के बाद महान राजाओ की एक श्रंखला लग गयी कुकस्थ, हरिश्चंद्र, सगर, दिलीप, भागीरथ तथा दिलीप द्वितीय। इसके बाद अयोध्या के राजा बने रघु, जिन्होंने अखण्ड भारत की नींव रखी, रघु के परपोते हुए राम।

राम के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उन्होंने दक्षिण में असुरो को निर्णायक रूप से पराजित किया था। दरसल इक्ष्वाकु के समय कहा गया था कि पृथ्वी पर या तो मानव राज करेंगे या फिर असुर और चूंकि असुर विज्ञान में निपुण थे इसलिए उनकी संभावना अधिक थी।

मगर अयोध्या के तथाकथित राजाओ ने भी विज्ञान की खोजे की तथा करवाई, जिसका लाभ राम को मिला और उन्होंने रावण का अंत करके एक बुरी सभ्यता का सफाया किया तथा मानवों को विजेता बनाया। राम ने दोबारा अखण्ड भारत की नींव रखी और अयोध्या के राजा बने।

मगर श्री राम की मृत्यु के बाद रघुकुल में आपसी संघर्ष शुरू हो गया, श्री राम की नवी पीढ़ी आते आते रघुवंशियो ने भारत के 7 बड़े नगरों में अपनी राजधानियां बना ली थी, ये नगर आज के अनुसार थे श्रीनगर, काबुल, लाहौर, काशी, अहमदाबाद, हैदराबाद और इनकी राजधानी अयोध्या। जब इन सातों जनपदों में युद्ध हुआ तो अयोध्या पूरी तरह तहस नहस हो गयी। अयोध्या का क्षेत्रफल भी घट गया और वो आज एक कस्बे जैसी है।

इसके बाद अयोध्या में कई राजा आये मगर अयोध्या किसी की राजधानी नही बन सकी। बात सन 1270 की है अयोध्या को दिल्ली सल्तनत के सुल्तान बलबन ने जीता, और यहाँ के मंदिरों को जमकर लूटा। इसके बाद यह नगरी मुसलमानों के ही कब्जे में रही। अब यहाँ एक विचित्र घटना होती है, दिल्ली में सुल्तान फिरोजशाह तुगलक का राज आता है।

फिरोज शाह तुगलक ने सरयू तट पर एक मस्जिद खड़ी की। ये मस्जिद ठीक उसी जगह पर बनी जहाँ पहले एक मंदिर था। ज्ञातव्य हो फिरोजशाह तुगलक 1351 में सुल्तान बना था। इसके बाद 1526 में दिल्ली सल्तनत का अंत हुआ और मुगल सल्तनत आयी।

जब मुगल आये उस समय भारत मे भक्ति आंदोलन चल रहे थे। हर महान राजा का ईश्वरीयकरण हो रहा था, श्री राम भी अछूते नही रह सके। उन्हें भगवान बना दिया गया, चरित्र के स्थान पर उनके चित्र की पूजा करके बार बार उनका अपमान किया गया और ये बाबर ने नही खुद हिन्दुओ ने किया।

बाद में तो रामायण की जगह रामचरित मानस ने ले ली तथा महाभारत की जगह भागवत जी ने ली। प्रथम मुगल सम्राट बाबर कभी अयोध्या नही आया वो अवध अवश्य आया था मगर लखनऊ में रुका था। अवध एक प्रान्त है जबकि अयोध्या उसकी नगरी।

मगर विवाद शुरू होता है सिखों की श्रद्धा से, 1728 में कुछ सिख अयोध्या आये। सिख खुद को श्री राम के बेटे लव की संतान मानते थे, उन्होंने अपने पूर्वज श्री राम की जन्मस्थली खोजनी चाही जो कि सरयू तट पर होना चाहिए थी। सरयू से थोड़ी ही दूरी पर उन्हें तुगलक का बनवाया यह ढांचा मिला।

दिखने में मस्जिद जैसा था मगर इसके खंभों पर शंख और कमल बने हुए थे मतलब साफ था कि यह एक मंदिर है। खाली पड़ा था, सिखों ने इसे राम जन्मभूमि कहा, यहाँ पूजा पाठ की और वापस आ गए। इसके बाद छोटी संख्या में हिन्दू वहाँ जाने लगे मगर मुसलमानों ने कोई आपत्ति नही ली।

1738 में महान पेशवा बाजीराव अयोध्या पधारे उन्होंने भी इस ढांचे पर कोई विवाद नही किया। इसके बाद मराठा साम्राज्य से भक्तों का तांता लग गया। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर अयोध्या आयी, उन्होंने भी इस ढांचे पर कोई आपत्ति नही ली।

मगर 1818 में मराठा साम्राज्य का पतन हो गया। 1851 में अवध की बेगम हजरत महल अंग्रेजो से पराजित हुई अंग्रेजो ने उनसे अयोध्या को छीन लिया। अंग्रेजो ने इस ढांचे को बंद करवा दिया और इसे बाबरी ढांचा कहा।

इसका नतीजा यह हुआ कि 1853 में हिन्दू मुस्लिम दंगे हुए और यह एक विवादित स्थल बन गया। 1947 में देश आजाद हुआ और 1949 में दोबारा यह ढांचा विवाद का कारण बना जब हिन्दुओ को पूजा करने से रोका गया।

इसके बाद से ही यह केस कोर्ट में था, 1992 में इस ढांचे को कारसेवकों की भीड़ ने तोड़ दिया। ध्यान रहे यह ढांचा मंदिर था या मस्जिद यह किसी को नही पता था बस जाकर तोड़ दिया। क्या पता मंदिर ही हो? ज्ञातव्य हो सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि वो ढांचा मस्जिद नही था।

इसके बाद इस केस पर अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और मंदिर निर्माण शुरू हो गया। अब हमे समझने की आवश्यकता है कि क्या यह लड़ाई उचित थी?

सबसे पहली बात यह तो साफ है कि वहाँ पहले एक मंदिर था मगर मंदिर तोड़ा गया किसी और काल मे और मस्जिद तामील हुई किसी और काल मे। दूसरी बात बाबर का इस ढांचे से कोई लेना देना नही, क्योकि बाबर ने मात्र 4 साल राज किया उसमे भी 15 युद्ध किये।

बाबर को इस ढांचे में इतनी दिलचस्पी नही हो सकती क्योकि एक तो उसे विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेव राय को भी मक्खन लगाना था और पैसो की सख्त जरूरत थी।

इस ढांचे का बाबरी नाम किसी अन्य कारण से हो सकता है, संभव है सिखों को जब पता चला कि इसे एक मुस्लिम ने बनवाया तो 18वी सदी में तो मुगलो का ही नाम आता था। इसलिए सिख इसे बाबर की धरोहर मान बैठे, ऊपर से सुन्नी वफ्फ बोर्ड ने भी जबरदस्ती हवा में उड़ता तीर पकड़ लिया और बार बार बाबरी ढांचा कहकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी।

दूसरा प्रश्न यह है कि क्या यह श्री राम की जन्मभूमि है? मैं कहूंगा संभव है मगर 0.000000001% कारण यह है कि जब राम का जन्म हुआ तब अयोध्या एक कस्बा नही थी। वो समूचे अखण्ड आर्यावर्त की राजधानी थी। मेरा व्यक्तिगत विचार है की उस समय की अयोध्या आज के दिल्ली मुंबई या कम से कम भोपाल, हैदराबाद या चेन्नई बराबर की तो रही ही होगी ना कि एक कस्बे जैसी।

राजा दशरथ का महल सरयू तट पर था मगर यह ढांचा 1.5 किमी दूर था। चलिए हम मान लेते है कि उस समय सरयू का क्षेत्रफल अधिक होगा मगर आप अयोध्या का आंकलन कैसे करेंगे???

सरयू नदी उत्तराखंड से शुरू होती है और बिहार बंगाल तक जाती है ऐसे में राजा दशरथ का महल किस राज्य में होगा?? प्रश्न बहुत है मगर एक बात साफ है इतिहास में हिन्दुओ के साथ अन्याय तो हुआ। यह ढांचा पहले एक मंदिर था जिसे जबरदस्ती इस्लामिक रूप देने की कोशिश हुई और अंततः अब दोबारा इसका उत्थान होगा। यह हिन्दुओ के अभिमान की लड़ाई थी जिसे बेकार में राम का नाम देकर उनका एक बार फिर अपमान किया गया।

श्री राम ने रावण को मारकर धर्म की नींव रखी हमे उनका आभारी होना चाहिए था, हमे उनके चरित्र को अपनाना चाहिए था और प्रयास करना चाहिए था भारत को दोबारा विश्वगुरु बनाने का। मगर इसके विपरीत हमने राम के चरित्र को खुद अपने पैरों से कुचल दिया और उनका मंदिर बनाकर खुद को विजेता समझ रहे है। कदाचित जाहिल होना इसी को कहते है, देश को वापस मनु और इक्ष्वाकु की आवश्यकता है जो हमे सभ्यता सिखाये।

अयोध्या आंदोलन में शहीद हुए सभी कारसेवकों को श्रद्धांजलि, अयोध्या के रघुवंशी राजाओ को शत शत नमन तथा पी नरसिम्हा राव साहब और कल्याण सिंह जी जैसे शासको को धन्यवाद जिनके कारण रघुवंशियो की यह विरासत बच सकी।

भारत रघुवंशियो का देश है, भारत का क्या भविष्य होगा हमारे हित और स्वार्थ क्या है इसका निर्णय हम रघुवंशियो द्वारा मिली विरासतो के आधार पर लेंगे। किसी बलबन, तुगलक या औरंगजेब के कृत्य हमे रोक नही सकते। विश्व भारत की उंगली पकड़कर चलना सीखा है और इसी तरह आगे बढ़ेगा। निकट में ना सही मगर दूर भविष्य में हम दोबारा सुपरपॉवर बनेंगे तथा विश्व सत्ता का स्वाद चखेंगे।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया !!

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