कांग्रेस और दिग्गी से भोपाल का सवाल

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हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, आगजनी बलवा सरीखे दर्जनों मुकदमों में नामजद रहे कश्मीर के कुख्यात आतंकवादी गुलाम अहमद मीर उर्फ मोमा काना को 2010 में बाकायदा राष्ट्रपति भवन में बुलाकर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के हाथों से पद्मश्री सम्मान दिलवाकर तत्कालीन कांग्रेसी यूपीए की सरकार ने समान्नित किया था।

उसी 2010 में बिनायक सेन नाम के नक्सली को देशद्रोह के कुकर्म में छत्तीसगढ़ के सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। लेकिन 2011 में वो जैसे ही जमानत पर जेल से बाहर आया वैसे ही उसको योजना आयोग का सदस्य सरीखा महत्वपूर्ण सरकारी पद सौंपकर तत्कालीन कांग्रेसी यूपीए की सरकार ने सम्मानित किया था।

लेकिन वही कांग्रेस आज भोपाल से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने के खिलाफ विधवाविलाप करने में जुटी है, मुहर्रमी मातम कर रही है। जबकि सच यह है कि 2008 से 2014 तक साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर राक्षसी अत्याचारों का कहर ढाने के बावजूद उनके खिलाफ एक सबूत नहीं खोज पायी थी कांग्रेस की सरकार।

विशेष रूप से सरकारी वकील बनाई गई जिस बहुत नामी गिरामी वकील रोहिणी साल्यान को साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को फंसाने के लिए सरकारी खजाने से 6 करोड़ रुपये की फीस देकर कांग्रेसी सरकार ने तैनात किया था वो रोहिणी साल्यान उन 6 साल तक साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ एक चार्जशीट तक तैयार नहीं कर पाई थी।

अतः कांग्रेस से यह सवाल जरूर पूछे भोपाल कि आतंकवादी को पद्मश्री तथा सज़ायाफ्ता देशद्रोही को सरकारी पद से समान्नित करने वाली कांग्रेस द्वारा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ किया जा रहा राजनीतिक ताण्डव सैद्धांतिक है या शैतानी.?

(सतीश चन्द्र मिश्र)

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