कुम्भ : एक प्रेमकथा

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कुंभ की अनंत भीड़ में
अक्सर खोने का
किस्सा आया
मुक्ति की ख़ातिर सबने
मोह को त्यागा
योग को साधा
मेरे हिस्से मोह को तजकर
योग में सधकर प्यार आया !

सदियों से तर जाने की ख़ातिर
पुरखे हवन करते हैं
संस्कृति को हमारी
सैलानी भी नमन करते हैं

आस्था और विश्वास के
अनूठे संगम तट पर आकर
चांदनी किरणें जब
लहरों से आलिंगन करती हैं
प्रेममय दो मन तब
अपने प्रेम से आचमन करते हैं !

अनन्त भीड़ में खोकर भी
प्रेम को मैंने पाया है
स्वांसों की तपन में तुमने
दिव्य कुम्भ के
उस जल से नहलाया है
जिसमें सारी दुनिया
की आस्था -विश्वास
और प्रेम का जन सैलाब
उमड़ आया है
न मैं साध्वी हूँ न जोगिनी
लेकिन कुम्भ के इस महायज्ञ में
मैंने खुद को प्रेम मे तरते पाया है !

(शालिनी सिंह)

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