कौन बनेगा महाराष्ट्र-पति?

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प्रजातंत्र का ये अजब खेल है जो शुद्ध राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित है और इसमें जनता की भूमिका बेवकूफ बने जमूरे जैसी होती है. नाचना उसको ही है पर नचाने वाले को चुनने का हक़ उसके पास नहीं है. ये तो नचाने वालों के आपसी मोल-तौल पर निर्भर करता है.

अब कौन बनेगा महाराष्ट्र-पति, इसको लेकर पेंच फंसा हुआ है महाराष्ट्र में. एक स्थिति होती है पेंच के फंसने की और दूसरी होती है पेंच फंसाने की. यहां पेंच फंसाने की स्थिति बनाने वाला पक्ष शिव सेना है. सच तो ये है कि दोनों तरफ से तैयारी पूरी थी जो चुनाव के पहले ही कर ली गई थी. पहले ही ये तय हो गया था कि जब भाव-ताव का वक्त आयेगा तो करना क्या है और कैसे करना है. इसलिए हैरान सिर्फ जनता है इस प्रदेश की, बीजेपी या शिवसेना नहीं!

युवा नेता उद्धव ठाकरे सीएम न सही, डिप्टी-सीएम बन कर मानेंगे और शिव सेना उनको बना कर मानेगी. यहां अस्तित्व की लड़ाई नहीं बल्कि प्रभुत्व का संग्राम है. मोदी और शाह की पार्टी मानती है कि उसकी साख ने उनको जिताया है जबकि शिव सेना मानती है कि ये हमारा किला है, सेनापति तो हम ही तय करेंगे.

लोग कहते हैं कि जाट अड़ियल होते हैं, पर जाटलैण्ड में तो मामला बड़े प्यार से सुलझ गया. यहां पर अपने आपको मराठा शक्ति का प्रतिनिधि मानने वाली शिव सेना ने अपना अड़ियल रवैया उसी तरह दिखाया है जैसे कश्मीर में मेहबूबा और उत्तरप्रदेश में माया ने दिखाया था.

ऊँट किस करवट बैठेगा अभी साफ़-साफ़ कहा नहीं जा सकता क्योंकि इस बार ऊँट शिव सेना का है जो महाराष्ट्र की रेतीली राजनीति से निकलकर कांग्रेस की उबड़-खाबड़ भूमि पर भी चलने को तैयार है. कांग्रेस ने एनसीपी और राष्ट्रीय कांग्रेस नामकी दो ज़मीनें तैयार कर राखी हैं. एनसीपी महाराष्ट्र को अपनी ज़मीन मानती है और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत राष्ट्र के साथ-साथ अब इस प्रदेश को भी अपनी बपौती मानने के सपने देखने लगी है. जिनको पीट कर चुनाव जीता अब उन्हीको जिताने वाले हैं जनता के जिताये हुए प्रतिनिधि. जनता से न कोई पूछेगा और न जनता इस लायक है कि बता सके या निर्देशित कर सके. जनता है जम्हूरियत का जमूरा. बस और कुछ नहीं!

चाहे वो आदित्य ठाकरे हों, या उद्धव ठाकरे, चाहे वो राज ठाकरे हों या आज की शिव सेना – किसी में भी बाल ठाकरे वाला तेजस्वी व्यक्तित्व और दूरदर्शिता दर्शित नहीं होती. बाल ठाकरे ने अपने प्रभुत्व और मान की रक्षा करते हुए भाजपा के साथ उसे बराबर से सम्मान देते हुए चलने की दीर्घ और सफल राजनीति की थी.

किन्तु आज राजनीति नहीं, अवसरनीति हो रही है जो असली चेहरा दिखाती है इन पार्टियों का. क्या इस तरह ये ज़ाहिर नहीं होता कि इन पार्टियों के नेताओं में से किसी को भी इस प्रदेश की जनता की बिलकुल परवाह नहीं है? अगर जनता की परवाह होती तो जनता जनार्दन के जनादेश की रक्षा नहीं की जाती? क्या कोई भी ये सोच रहा है कि इस समय प्रदेश की जनता क्या सोच रही होगी और कितना असहाय महसूस कर रही होगी? क्या जनता से भी कोई सलाह लेगा?