ग़लतफ़हमी न पालें पत्रकार बिरादर!!

Share on facebook
Share on twitter
Share on google
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

अमूमन आजकल सुनने में आता है कि पत्रकारिता का अर्थ है निष्पक्ष होना. पर यह सुनने में कभी नहीं आता कि पत्रकारिता का अर्थ है बिकना नहीं.

उपरोक्त दो वाक्यों को पढ़ कर आप आज की भारतीय पत्रकारिता का चरित्र आंक सकते हैं. जो लोग बिलकुल ही निष्पक्ष नहीं हैं, वही कसमें खाते हैं निष्पक्ष होने की. प्रश्न यह है कि पक्ष और निष्पक्ष क्या होता है? झूठ और सच में पक्ष और निष्पक्ष क्या है? बुराई और सच्चाई में पक्ष और निष्पक्ष क्या है? सही और गलत में पक्ष और निष्पक्ष क्या है? राम और रावण में पक्ष और निष्पक्ष क्या है?

उपरोक्त प्रश्नों में आपको उनके उत्तर भी मिल जाएंगे. लेकिन राजनीति की टीम बी याने कि पत्रकारिता भारत की, इसके उपरान्त भी उस वैश्या की तरह अपने को सती-सावित्री बताती रहेती है जो मर्दों का एक पूरा शहर खा चुकी है.

किस गलतफहमी में जी रहे हैं ये आज के तथाकथित पत्रकार. इनका दंभ कितना थोथा है कि इनको ये भी नहीं पता कि प्रायः ये जहाँ जा कर जिससे भी मिलते हैं उस व्यक्ति के मानस में इनका जो चेहरा बनता है उसके माथे पर लिखा होता है – दलाल !

फिर भी हिन्दुस्तान की ये पत्रकार कौम गली-कूचों में इतराती फिरती है कि हम तो वीआईपी है. महलों चौबारों में डोलते बड़े बदनाम पत्रकार खुश होते हैं कि हम तो बड़े नामवर हैं, उनको पता नहीं कि उनका कितना ‘नाम’ है. यह जबर्दस्ती ओढ़ी हुई गलतफहमी में जीने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं.

मेरे लेख से मेरे पत्रकार मित्र बुरा न मानें क्योंकि उनकी बिरादरी का हिस्सा रहा हूँ कभी मैं भी. कभी मैं भी देश के तथाकथित बड़े न्यूज़ चैनल्स से जुड़ा हुआ था एंकर बन कर भी और रिपोर्टर बन कर भी. किन्तु यह बता कर राहत मिलती है कि जो अनुभव पत्रकारिता का मैने अमेरिका और इंग्लैंन्ड में जिया है, अपने देश भारत में नहीं. यहाँ तो हैरानी के नित-नये अध्याय देखने को मिले हैं जबकि बाहर शुद्ध रूप से पत्रकारिता देखी है.

पत्रकारिता की परिभाषा देना चाहूंगा जो विषय की आवश्यकता भी है और अनिवार्यता भी. पत्रकारिता का अर्थ है पत्र (अथवा किसी माध्यम से) बताना या सूचित करना. इसमें ये कहीं नहीं लिखा है कि समाचार सूचित करते समय आप अंधे, बहरे और गूंगे होने का अभिनय करें. आप सही को सही न कहें और गलत को गलत न कहें. इसी तरह बीच का बन कर आप सच को न सच कहें और झूठ को झूठ ! ऐसा आचरण अथवा किसी अपराधी को महान या किसी महापुरुष को अपराधी बताना आपकी व्यक्तिगत शठता को उजागर करता है आपकी व्यवसायगत नीति को नहीं ! बीच का बनना कहीं नहीं ले जाता क्योंकि मूलतः बीच का बनना पलायनवाद है, भीरुता है अन्यथा शुद्ध ठगी है!

और हाँ, वो जितने भी लोग इस तरह की पत्रकारिता कर रहे हैं, एक क्षण के लिए अपनी हिप्पोक्रेसी से बाहर आ कर विचार करें, वे पत्रकारिता किसी मिशन के लिए कर रहे हैं या पेट भरने के लिए? दुनिया को मूर्ख न बनाएं तो अच्छा है. सबको पता है कि आप कमाने के लिए पत्रकारिता का धंधा कर रहे हैं और समाज का महान दायित्वपूर्ण अंग होने के दिखावे में जी रहे हैं. जिस तरह आज देश के नेता जन-पथ पर नग्न हैं, उसी तरह पत्रकार भी हैं. इसीलिए मैंने कहा कि पत्रकार देश के नेताओं की टीम बी हैं.

और अब आपको बता दूँ कि तथाकथित निष्पक्षता का ढोंग करने का लाभ नहीं है. क्योंकि सरकार बदलते ही थाली के बैंगन गिरगिट सा रंग बदलते हैं – ये सत्य बैंगन भी जानता है और गिरगिट भी. इन दोनों के अतिरिक्त सारी दुनिया भी जानती है. तो इस दिखावे के माध्यम से आप स्वयं को ही मूर्ख बना रहे हैं, किसी अन्य को नहीं !

इसलिए पुराने घाघ पत्रकारों को नहीं, नई पीढ़ी के ऐसे पत्रकारों को कहना चाहूंगा – सच को सच कहें और झूठ को झूठ, सही को सही कहें गलत को गलत. नकली हो कर अंधे, बहरे तथा गूंगे का अभिनय करना है तो पत्रकारिता छोड़ कर ठगी का कोई दूसरा धंधा पकड़ लें, प्रतियोगिता कम होगी और सफलता अधिक !!

वे अतिअल्प संख्या वाले पत्रकार मेरे लिए सराहनीय हैं जिनके पास बालगंगाधर तिलक जी वाली दृष्टि है, जो मीडिया को माध्यम मानकर समाज के प्रति अपनी सकारात्मक भूमिका के निर्वाह हेतु कृतसंकल्प हैं, जो मानव मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और सनातन धर्म के मूल्यों को विचार व व्यवहार – दोनों ही धरातलों पर जीते हैं. मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ. शेष सभी निकृष्ट कोटि के पत्रकारों के लिए अधिक शब्दों का प्रयोग करना बुद्धिमानी नहीं.

महलों चौबारों में डोलते बड़े बदनाम पत्रकार खुश होते हैं कि हम तो बड़े नामवर हैं, उनको पता नहीं कि उनका कितना ‘नाम’ है. यह जबर्दस्ती ओढ़ी हुई गलतफहमी में जीने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं.

मेरे लेख से मेरे पत्रकार मित्र बुरा न मानें क्योंकि उनकी बिरादरी का हिस्सा रहा हूँ कभी मैं भी. कभी मैं भी देश के तथाकथित बड़े न्यूज़ चैनल्स से जुड़ा हुआ था एंकर बन कर भी और रिपोर्टर बन कर भी. किन्तु यह बता कर राहत मिलती है कि जो अनुभव पत्रकारिता का मैने अमेरिका और इंग्लैंन्ड में जिया है, अपने देश भारत में नहीं. यहाँ तो हैरानी के नित-नये अध्याय देखने को मिले हैं जबकि बाहर शुद्ध रूप से पत्रकारिता देखी है.

पत्रकारिता की परिभाषा देना चाहूंगा जो विषय की आवश्यकता भी है और अनिवार्यता भी. पत्रकारिता का अर्थ है पत्र (अथवा किसी माध्यम से) बताना या सूचित करना. इसमें ये कहीं नहीं लिखा है कि समाचार सूचित करते समय आप अंधे, बहरे और गूंगे होने का अभिनय करें. आप सही को सही न कहें और गलत को गलत न कहें. इसी तरह बीच का बन कर आप सच को न सच कहें और झूठ को झूठ ! ऐसा आचरण अथवा किसी अपराधी को महान या किसी महापुरुष को अपराधी बताना आपकी व्यक्तिगत शठता को उजागर करता है आपकी व्यवसायगत नीति को नहीं ! बीच का बनना कहीं नहीं ले जाता क्योंकि मूलतः बीच का बनना पलायनवाद है, भीरुता है अन्यथा शुद्ध ठगी है!

और हाँ, वो जितने भी लोग इस तरह की पत्रकारिता कर रहे हैं, एक क्षण के लिए अपनी हिप्पोक्रेसी से बाहर आ कर विचार करें, वे पत्रकारिता किसी मिशन के लिए कर रहे हैं या पेट भरने के लिए? दुनिया को मूर्ख न बनाएं तो अच्छा है. सबको पता है कि आप कमाने के लिए पत्रकारिता का धंधा कर रहे हैं और समाज का महान दायित्वपूर्ण अंग होने के दिखावे में जी रहे हैं. जिस तरह आज देश के नेता जन-पथ पर नग्न हैं, उसी तरह पत्रकार भी हैं. इसीलिए मैंने कहा कि पत्रकार देश के नेताओं की टीम बी हैं.

और अब आपको बता दूँ कि तथाकथित निष्पक्षता का ढोंग करने का लाभ नहीं है. क्योंकि सरकार बदलते ही थाली के बैंगन गिरगिट सा रंग बदलते हैं – ये सत्य बैंगन भी जानता है और गिरगिट भी. इन दोनों के अतिरिक्त सारी दुनिया भी जानती है. तो इस दिखावे के माध्यम से आप स्वयं को ही मूर्ख बना रहे हैं, किसी अन्य को नहीं !

इसलिए पुराने घाघ पत्रकारों को नहीं, नई पीढ़ी के ऐसे पत्रकारों को कहना चाहूंगा – सच को सच कहें और झूठ को झूठ, सही को सही कहें गलत को गलत. नकली हो कर अंधे, बहरे तथा गूंगे का अभिनय करना है तो पत्रकारिता छोड़ कर ठगी का कोई दूसरा धंधा पकड़ लें, प्रतियोगिता कम होगी और सफलता अधिक !!

वे अतिअल्प संख्या वाले पत्रकार मेरे लिए सराहनीय हैं जिनके पास बालगंगाधर तिलक जी वाली दृष्टि है, जो मीडिया को माध्यम मानकर समाज के प्रति अपनी सकारात्मक भूमिका के निर्वाह हेतु कृतसंकल्प हैं, जो मानव मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और सनातन धर्म के मूल्यों को विचार व व्यवहार – दोनों ही धरातलों पर जीते हैं. मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ. शेष सभी निकृष्ट कोटि के पत्रकारों के लिए अधिक शब्दों का प्रयोग करना बुद्धिमानी नहीं.

(पारिजात त्रिपाठी)

ट्रेंडिंग

काम की खबरें

देश

विदेश

मनोरंजन

राजनीति