ज़रा चूड़ियाँ पहन कर तो देखो!!

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चूड़ियाँ पहन कर तो देखो!!माफ करना , क्या कहा आपने ?

यही ना आपने कि “हमने भी चूड़ियाँ नहीं पहन रखी है.” अगर चूड़ियाँ पहने होते तो? कायर और कमजोर होते? नहीं पहनी तो बहुत बहादुर और मजबूत हो? क्या यही मतलब समझ पाये हो इन चूड़ियों का?आखिर जानते क्या हो आप इन चूड़ियों के बारे में? किसने कहा कि चूड़ियाँ कमजोर और औरत या आपकी नजर में कहूं कमजोर औरत की निशानी हैं?

मर्द होने पर इतना घमण्ड कि इन चूड़ियों को कायरता की निशानी मान बैठे, शर्म आती है ना इन चूड़ियों के साथ खुद को देखने में? कभी जानने की कोशिश की है इन चूड़ियों का अर्थ?जनाब ये चूड़ियाँ निशानी है ‘धैर्य’ , ‘बलिदान’, ‘त्याग’ , ‘सहनशीलता’, ‘प्यार’ और ना जाने ऐसे कितने ही मानवीय गुणों की जिन्हें आप स्त्रियों का आभूषण कहते हैं, जो आभूषण हर गरीब से गरीब और अमीर से अमीर लड़की को धरती गिरते ही पहना दिये जाते हैं, कभी ये आभूषण इन्हे पूज्यनीय बनाते हैं कभी चुभते हैं तो कभी अपने बोझ तले इनका अस्तित्व ही रौंद देते हैं मगर फिर भी ये आभूषण पहनती हैं, बड़े गर्व और अदब से पहनती हैं.

ये रंग-बिरंगी चूड़ियाँ निशानी है उस मात्र शक्ति की जो इस सृष्टि की जननी है, लेकिन कैसे चूड़ियां तो कमजोर पहनते हैं ना? कैसे सहती हैं ये इतना दर्द ? और कहां से लाती हैं इतनी हिम्मत? क्या जरूरत है अपना जीवन दांव पर लगाने की? क्यों खुश होती हैं ये तुम्हें नौ माह अपनी कोख में ढोकर खुद के पुनर्जन्म का खतरा मोल लेने में? जबकि इन्हें भी पता है कि कल को तुम इन्हीं चूड़ियों को कायरता और कमजोरी का प्रतीक चिह्म बना बैठोगे, क्या मिलता है इन्हें किसी और की खातिर अपनी खूबसूरती, अपने शरीर के साथ खिलवाड़ करने में?

कितनी नाइंसाफी है ना कुदरत की कि इतनी खतरनाक जिम्मेदारी इन चूड़ियों के हिस्से कर दी? ये तो कमजोर हैं ना तन से भी मन से भी? लेकिन शायद सृष्टि के रचनाकार को विश्वास था कि इस सृष्टि की जननी कहलाने हक वही रख सकता है जिसके पास खामोशी से दर्द सहने की असीम ताकत हो, खुद को कुर्बान करने की कुव्वत हो, और ममता भरा दिल हो ताकि वो अगली पीढ़ी को अपने वात्सल्य की छांव में बड़ा कर सके और ताज्जुब ये हक मिला किसे?

इन्हीं चूड़ियों को, मगर ये तो कमजोर और कायर थी ना फिर भी? आप मर्दों को चूड़ियां नहीं पहनाई क्योंकि आप ताकतवर और बहादुर हैं ना. जब तुम थके हारे जीवन से निराश हुये तो इन चूड़ियों की खनक में छिप कर तुमने नयी ऊर्जा पायी, ताउम्र ये खनक तुम्हारे नाम रही, कभी मां बनकर कभी पत्नी बनकर, खुद को खो कर तुम्हारा संसार अपनाया, तुम्हारे हर निर्जीव जर्रे को सजीव बनाया, मगर तुमने क्या किया इनके साथ? तुम लड़की हो, पर्दे में रहो!!

तुम औरत हो तुम नहीं कर सकती या कहो कि तुम्हें करना नहीं चाहिये!तुम लड़की हो मर्यादा में रहो!! परिवार की इज्जत हो तुम शराफत से रहो!! ये मत पहनो! ऐसे मत चलो! ऐसे मत हंसो! ऐसे मत बोलो! वहां मत जाओ! क्यूंकि तुम एक लड़की हो तुमने चूड़ियां जो पहनी है, ये खनक तुम्हें बस चारदीवारी के अंदर अच्छी लगती है, तुमने ना केवल इन्हें कैद किया, भोग की वस्तु बनाया बल्कि इनकी सांसों को ही रौंद कर रख दिया, बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है इन चूड़ियों को पहनने की, फिर भी तुम्हें इतना आसान क्यों लगता है चूड़ियां पहनना?

तरस आता है तुम्हारी सोच पर,तुम इनके ‘प्यार’ को गुलामी समझ बैठे, इनके ‘समर्पण’ को दासता समझ बैठे, इनकी ‘सहनशीलता’ को कायरता समझ बैठे, इनकी ‘खामोशी’ को कमअक्ली समझ बैठे, इनकी उमड़ती ‘भावनाओं’ को पागलपन समझ बैठे, इन पर स्वामित्व अपना जन्म सिद्ध अधिकार मान कर इन्हें निरीह साबित कर दिया, इनके सम्बल को पिछलग्गू करार दिया, और खुद मर्दनुमा होने का ढोंग करते रहे, मगर कैसे भूल गये कि जब ये ज्वालामुखी फटता है तो स्वयं प्रलय के स्वामी को सृष्टि बचाने की खातिर इनके कदम तले आना पड़ता है, आपकी कल्पना से परे कहीं ज्यादा संहारक है इनका वो रूप, शायद आप भूल सकते हैं मगर इन्हें भली भांति एहसास है उस रूप का, मगर ताज्जुब! ये, फिर भी सब सहती क्यों है?

कहां छिपी है वो ज्वाला? ये, क्यों नहीं दिखाती वो प्रलयंकारी रूप? हां बिल्कुल सही, नहीं दिखातीं अपना वो रूप, डरती जो हैं, मगर किससे? समाज से? नहीं नहीं खुद से ही, क्योंकि चूड़ियां जो पहनी हैं इन्होंने, इन चूडि़यों की खनक इन्हें हर पल एहसास कराती है कि ये अपने परिवार की धुरी हैं सब कुछ खाक हो जायेगा सब कुछ बिखर जायेगा ना जाने कितनी जिन्दगियां तबाह हो जायेंगी अगर इनकी लावा बाहर आ गयी, इन्हें हर पल याद रहता है कि तुम जननी हो पालनहार हो संहारक नहीं इसलिये ये खुद ही टूटती हैं बिखरती हैं खुद से ही खुद के टुकड़ों को समेटती हैं, और अपने ही टुकड़ों से लहूलुहान होती हैं सिर्फ उस ज्वालामुखी को दबाने की कोशिश में जो इनके अंदर धधकता है सिर्फ इसी डर में कि कहीं सब कुछ भस्म ना कर दे वो ज्वाला, हां क्योंकि झ्होंने चूड़ियां जो पहन रखी हैं!

क्या सच में अब भी लगता है कि ये चूड़ियां कमजोरों की निशानी है? क्या वाकई ये कायरता की प्रतीक हैं? क्या सच में चूडि़यां पहनना इतना आसान है? तो फिर एक बार तुम भी चूड़ियां पहन कर देखो ना|धन्यवाद दोस्तो ये विचार समर्पित है उस सोच को जिसे मैंने हमेशा ये कहते देखा है “हमने भी चूड़ियां नहीं पहन रखीं हैं”, बहुत ही हास्यास्पद लगती है लोगों की ये सोच!

क्या वाकई ये कायरता की प्रतीक हैं? क्या सच में चूडि़यां पहनना इतना आसान है? तो फिर एक बार तुम भी चूड़ियां पहन कर देखो ना|धन्यवाद दोस्तो ये विचार समर्पित है उस सोच को जिसे मैंने हमेशा ये कहते देखा है “हमने भी चूड़ियां नहीं पहन रखीं हैं”, बहुत ही हास्यास्पद लगती है लोगों की ये सोच!

(साभार)

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