‘चौकीदार’ का शाब्दिक विश्लेषण

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शब्द-कल्पद्रुम में चौकीदार का वास्तविक अर्थ देखने का विचार आया. तब शब्द-कल्पद्रुम के पृष्ठ ४/०४० में चौकीदार शब्द की व्याख्या कुछ इस तरह से दृष्टिगत हुई –

यामिकभटः, पुं, (यामे यामे नियुक्तः । याम + ठक् । स चासौ भटश्चेति ।) प्रहरिकः । “चौकी-दार ” इति भाषा । 

इसका अर्थ हुआ – वह व्यक्ति जिसे रात्रि पर्यंत रक्षणार्थ नियुक्त किया गया हो.

यथा उन्नादाम्बुद वर्द्धितान्धतमसः प्रभ्रष्ट दिङ्मण्डले काले जाग्रद उदग्र “यामिकभट” प्रारब्ध कोलाहले।
कर्णस्या सुहृदर्णवाम्बु वडवावह्ने र्यदन्तः पुरा-दायातासि यदम्बुजाक्षि ! कृतकं मन्ये भयं योषिताम् ॥”इति कर्णाटः ॥

चौकी … अर्थात आसन, माता की चौकी , पञ्चायतन पूजन चौकी आदि लोक प्रचलित शब्द हैं,
बिस्तर शब्द आम भाषा में प्रयोग करते हैं विवाह में वर को कुशा की मूंठ , विवाह संस्कार के समय वर के सत्कार पूजन में विष्टरं , विष्टरं कह कर पण्डित जी कन्या के पिता द्वारा आसन समर्पित करते हैं हमारे यहां गढ़वाल में यह भी चौकी पर ही दी जाती है ,, सो हर वर उस दिन वहां चौकी पर आसन ग्रहण करता है, चौकीदार को गालियां देने वाले महामना गालियां देने के पूर्व अपने माता पिता के विवाह का स्मरण कर लीजिएगा ..!!!! 

वि विस्तीर्य्यते इति । वि + स्तॄ + अप् ।
“वृक्षासनयो र्विष्टरः ।” ८ । ३ । ९३ । इतिनिपातनात् षत्वम् ।) विटपी । दभमुष्टिः ।पीठाद्यासनम् । इत्यमरः ॥ आदिना कुशा-सनादिग्रहः । इति भरतः ॥ * ॥ (यथा,भागवते । ३ । २८ । १६ ।“काञ्चीगुणोल्लसत्श्रोणिं हृदयाम्भोजविष्टरम् ।दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्द्धनम् ॥”)विष्टरलक्षणमाह । विष्टरस्तु सार्द्धद्बितयवामा-वर्त्तवलिताधोमुखाग्रा असंख्यातदर्भाः । तथाच गृह्यासंग्रहः ।“ऊर्द्ध्वकेशो भवेद्ब्रह्मा लम्बकेशस्तु विष्टरः ।दक्षिणावर्त्तको ब्रह्मा वामावर्त्तस्तु विष्टरः ॥”इति ॥छन्दोगपरिशिष्टम् । “दर्भसंख्या न विहिता विष्टरास्तरणेष्वपि ॥” 

#मैं_भी_हूं_चौकीदार

(महेश कुरियाल)

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