छब्बीस ग्यारह: भारत का एक काला दिन

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भारत का एक काला दिन, जब आतंकवादियों ने भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई पर हमला किया। मगर इस घटना से कई लोगो की राजनीति पर भी ग्रहण लग गया। सबसे पहली थी कांग्रेस, महाराष्ट्र कांग्रेस पर ढील देने के आरोप लगे। जब दिल्ली से सेना की एक स्पेशल फोर्स मुंबई आयी तब फॉर्मेलिटी में देर की गई जिसके कारण मौत का तांडव ज्यादा समय तक चलता रहा।

तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को इस्तीफा देना पड़ा, फिर आते है केंद्र सरकार की ओर। गुजरात के आतंकी हो या सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के, सोनिया गांधी आतंकवादियों की मौत पर आँसू बहाती रही मगर जब मुंबई हमले की बात आयी तो महज सांत्वना देने के कोई बड़ी कार्रवाई नही की गई। ऊपर से दिग्विजय सिंह ने हिन्दू आतंकवाद की बात कहकर कांग्रेस का अध्याय सदा के लिए समाप्त कर दिया।

इस पर धारणा है कि कांग्रेस इन आतंकवादियों को हिन्दू सिद्ध करना चाहती थी ताकि भगवा आतंकवाद की थ्योरी को सही माना जाए। जब कसाब को पकड़ा गया तब उसकी कलाई पर हिन्दुओ का धर्मसूत्र बंधा हुआ था। मगर कसाब जिंदा पकड़ा गया और 4 डंडे खाकर उसने पाकिस्तान का सारा राज उगल दिया।

हिन्दू धर्म को आतंक से जोड़ने की कांग्रेस की रणनीति धरी रह गयी। बाद में कांग्रेस ने कसाब को फांसी देकर चुनाव जीतना चाहा मगर तब तक देश दक्षिणपंथी क्रांति की चपेट में आ चुका था और 2014 में नरेंद्र मोदी दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हुए।

इन सबसे बड़ा संकट आया राज ठाकरे पर। राज ठाकरे ने 2 साल पहले 2006 में ही अपनी अलग पार्टी बनाई थी और इस हमले से कुछ दिन पहले उत्तर भारतीयों पर हमले करवाये थे मगर जब मुंबई पर आतंकी हमले हुए तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के शेर कही नजर नही आये। इस घटना ने राज ठाकरे की छवि हमेशा के लिए बिगाड़ दी। राज ठाकरे अपने चाचा बालासाहेब ठाकरे की 40 साल पुरानी राजनीति को कॉपी कर रहे थे।

1969 में शिवसेना ने गुजरातियो और दक्षिण भारतीयों पर कहर बरसा कर अपनी राजनीति शुरू की थी जो कि सफल भी रही। मगर 2008 एक अलग युग था, राज ठाकरे का 1969 वाला पैटर्न अब ओछी मानसिकता कहा गया। जहाँ दुनिया वैश्वीकरण की ओर बढ़ गयी वहाँ उनकी राजनीति महाराष्ट्र छोड़िए मुंबई में ही सिमट कर रह गयी।

हाल ही के चुनावों में राज ठाकरे के मात्र एक विधायक की जीत दर्शाती है कि नेता कितना ही अच्छा वक्ता हो मगर जब तक उसकी सोच अपडेट नही है वो आधुनिक भारत पर अपनी छाप नही छोड़ सकता। इस चुनाव में राज ठाकरे की राजनीति का सदा के लिए अंत हो गया, दूसरी ओर अजीत पवार ने इससे सबक लिया की मूल पार्टी से कटते समय एक बड़ी पार्टी का समर्थन लेना आवश्यक है, उन्होंने वही किया भी।

बहरहाल पाकिस्तान ने भी इसकी कीमत चुकाई, 3 साल बाद ठीक इसी दिन अर्थात 26 नवम्बर 2011 को अमेरिका ने पाकिस्तानी सेना पर ड्रोन हमले किये और 40 जेहादियो को मौत के घाट उतारा।

इसलिए जब भी 26/11 का नाम लिया जाएगा, इसका महत्व दिल्ली या मुंबई में नही सिमट सकेगा। यह वो दिन था जिसने पूरे भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। हमले में शहीद हुए मुंबई पुलिस और दिल्ली फोर्स के अफसरों को शत शत नमन।

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