जस्टिस रामना का क्या कुसूर था – जो अयोध्या बेंच से हटा दिए गये ?

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10 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने अयोध्या मसले की सुनवाई करनी थी, उसमे 5 जज थे, जस्टिस गोगोई, जस्टिस यू यू ललित, जस्टिस रामना, जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस बोबडे.

जस्टिस ललित पर मुस्लिमों के वकील राजीव धवन ने आरोप लगा दिए और वो केस की सुनवाई से हट गए –अब एक ही जज, जस्टिस यू यू ललित की जगह आना था बेंच में.

मगर आज चीफ जस्टिस गोगोई ने एक नई बेंच गठित कर दी जिसमे जस्टिस अब्दुल नज़ीर को शामिल किया और जस्टिस रामना को हटा कर उनकी जगह जस्टिस अशोक भूषण को ले लिया.

अगर जस्टिस नज़ीर को लेना ही था तो वो सीधे सीधे जस्टिस यू यू ललित की जगह ले सकते थे –फिर जस्टिस रामना का क्या कुसूर था जो उन्हें हटा दिया गया – नज़ीर को शामिल करना तो जरूरी था क्यूंकि उनके बिना तो बेंच “सेक्युलर” ही नहीं होती –मगर जस्टिस रामना ? क्या 22 जनवरी
को उनका फैसला कि हिन्दू लड़की की शादी मुस्लिम पुरुष से वैध नहीं है, तो उन्हें हटाने का कारण नहीं बन गया.

अब नज़ीर साहब के बेंच में होने का मतलब साफ़ है कि वो तो मंदिर के पक्ष में फैसला नहीं देंगे क्यूंकि उन्होंने मस्जिद को नमाज़ के लिए इस्लाम का अभिन्न अंग माना था –उनके लिए इस्लाम पहले होगा, बाद में संविधान, जैसा देश के बड़े बड़े मुसलमान मानते हैं, हामिद अंसारी को ही देख लो, 10 साल उपराष्ट्रपति रहे मगर वो ही ढाक के तीन पात, जाते जाते कह गए, हम मुसलमानों को भारत में डर लगता है.

दूसरे जस्टिस चंद्रचूड़, उन्होंने तो असहमति के अधिकार को सेफ्टी वाल्व बता कर “असहमति” रखने वालों को प्रधान मंत्री की हत्या तक करने का एक तरह से अधिकार दे दिया था – उन्हें अब मस्जिद के लिए मुसलमानो की “असहमति” में दम दिखाई दे सकता है –अब एक और जज अगर
नज़ीर के साथ हो लिया तो गया राम मंदिर गंगा पानी में –

सबूतों को अगर न्यायाधीश ना मानें तो कोई क्या कर लेगा – मुझे ना जाने क्यूँ अदालत से कोई आशा नहीं है –होगा वो ही जो राम जी चाहेंगे -इस लेटलतीफी में भी शायद कोई अच्छाई हो जो बाद में पता चले, कुछ कह नहीं सकते –

(सुभाष चन्द्र)
25/01/2019

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