तुम लौट आओ, गौरी!

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मेरे घर से थोड़ी दूर पर एक नदी है, कल कल करता हुआ पानी, किनारे पर लगी हुयी ढेरों नाव, चिडियों की चहचहाहट, पेड पौधों की मर्मर ध्वनि और मनुष्यों का शोर ! यू तो ये हर नदी की कहानी होती है पर इस नदी की कहानी थोड़ी सी अलग है!
मै जब भी कालेज से लौट रही होती हु, भरी दोपहरी मे नाविक तथा मछुआरे अपने घर जा चुके होते गृहस्थ,तथा पक्षी आराम कर रहे होते, उस समय एक लड़की नदी के किनारे बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर मानो मौन प्रकृति से बाते कर रही होती,
आते-जाते मेरी नजर अनायास ही उस लड़की पर चली जाती मन अपने आप से कयी सवाल करने लगता ये कौन है रोज यहा क्यू आती है…………..

इक दि मै जाकर उस लडकी के पास बैठ गयी सिर पर हाथ फेरा प्यार से पूछा बेटा तुम्हारा नाम क्या है रोज यहा क्यू बैठी रहती हो, एक साथ मैने जाने कितने सवाल कर डाले, किन्तु वो मौन थी………. बस अपनी बडी बडी काली आंखों से मेरी तरफ देखने लगी, इतनी सुंदर आंखें कवियों की कल्पनाओं से बढ़कर!

सुन्दर आंखों को कभी कुछ बदलना नही पडता, मन अपने आप ही उन पर छाया डालता रहता है, मन के भाव अपने आप ही उस छाया में फेलते सिकुडते रहते है!……… कभी कभी आंखें चमक दमक कर जलने लगती है तो कभी उदासीनता को कालिमा मे बुझ सी जाती है!

उसकी आँखों में बेपनाह दर्द था, वो लडकी गूंगी थी, मेरा मन भर आया दूसरे दिन मैंने उसके बारे में सब पता लगा लिया था घर मे दो बडी बहने थी जिनके हाथ पीले हो चुकेथे अब सिर्फ मां बाप और निःशब्द गौरी ही घर मे थे,
मां गौरी को अपने कोख की कालिमा मानती थी ऐसा नही था कि गौरी के घर में किसी चीज की कमी थी कहने को सबकुछ था बस किसी के मन मे गौरी के लिए प्यार नही था. मां बाप सभी उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे. पूरा मुहल्ला उसे चिढाता था
अब मुझे समझ में आ गया था कि गौरी यहाँ क्यों बैठती है हम धीरे-धीरे अच्छे दोस्त बन गए, मै रोज गौरी से मिलने-जुलने लगी उसके लिए कुछ ना कुछ ले जाती छोटी-छोटी चीजों को पाकर भी गौरी इतनी खुश हो जाती मानो उसे फलक के तारे मिल गये हो, मै गौरी को तेखकर बहुत खुश होती अब तक गौरी मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी
मै अपनी सारी परेशानी गौरी को बताती वो ध्यान से सुनती मुझे प्यार करती, जिस दिन मै उससे ना मिलती दूसरे दिन गौरी मुझसे कोई बात ना करती मेरी दी हुयी कोई चीज़ ना लेती बहुत मनाना पडता था, सच कहू तो उसका रूठना मुझे अच्छा लगता था, मै उसकी अच्छी दोस्त थी या नही ये मै नही जानती पर वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी इधर कुछ दिनों से गौरो दिखाई नही दी निगाह दूर तलक जा कर लौट आती थी मेरी,

मन बहुत बेचैन हो रहा था जैसे मेरा कुछ खो गया है किमती सा, मै उसके घर गयी तो पता चला गौरी अब नही रही अपने गांव गयी थी, वही सांप ने काट लिया गौरी विदा हो गयी, उसके मा की कोख का कलंक मिट गया,
मै अब भी जब कभी परेशान होती हूँ तो नदी के किनारे बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर नदी के बहाव को देखती रहती हू, मुझे लगता है कि गौरी मुझे देख रही है मुझे सुन रही है मै रोती हू, कहती हू लौट आओ गौरी, पर गौरी गूंगी के साथ ही साथ बहरी भी हो गयी है मेरी सदायें उस तक पहुंचती ही नही है………..
इस दुनिया से जाने वाले कहा चले जाते हैं मुझे नही पता पर, तुम जहा भी हो गौरी लौट आओ……………. 😢😢😢😢😢

-शालू शुक्ला
(लखनऊ)

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