दिल्ली का तंदूर हत्याकांड : 29 साल बाद अब सुशील शर्मा की रिहाई

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सुशील शर्मा के लिए ऐतिहासिक दिन है आज का..आज उसकी रिहाई का फैसला हो गया है..

इस हत्या के दोषी सुशील शर्मा के लिये अपनी ज़िन्दगी के दो दिन कभी न भुलाये जा सकेंगे – एक दिन तो वह जिस दिन उसने यह अपराध किया था और दूसरा आज का जब आखिरकार उसके रिहाई के आदेश पर दस्तखत हो गए हैं न्यायाधीश के.

ये दिल्ली उच्चन्यायालय के न्यायाधीश हैं जिन्होंने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया है. इस निर्णय की सराहना होनी ही चाहिए. क्योंकि इस निर्णय ने दो बातों को साक्ष्य के साथ भारत देश की जनता की अदालत में सिद्ध कर दिया है.

एक ये कि जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाइड. 29 सालों से जेल की सज़ा काट रहा एक अभियुक्त अपने दंड की अवधि से दुगुनी अवधि जेल में काट चुका है. तो इसे जस्टिस डिलेड भी कहा जाएगा और जस्टिस डिनाइड भी. जस्टिस डिलेड है माननीय अदालत की व्यस्तता के चलते और जस्टिस डिनाइड है सुशिल शर्मा के दुर्भाग्य के चलते.

दूसरा सत्य जो सिद्ध हुआ है वह ये है कि ऊपर वाले की अदालत में देर है अंधेर नहीं. ज़ाहिर है नीचे की अदालत को देर लगी लेकिन ऊपर की अदालत ने आखिरकार सुशील पर मेहरबानी की और अब सुशील बहुत जल्दी रिहा हो कर खुले आसमान के नीचे सांस ले सकेगा.

1995 में हुए तंदूर हत्याकांड ने मीडिया की बहुत सुर्खियां बिखेरी थीं. दिल्ली का रहने वाला नवयुवक सुशील शर्मा युवक कांग्रेस का नेता था. उसकी पत्नी नैना साहनी एक प्राइवेट विमान कंपनी में पायलट थी. जीवन हंसी ख़ुशी बीत रहा था कि अचानक ऐसा ग्रहण लगा दोनों के दाम्पत्य जीवन में कि उसके बाद जो हुआ उससे सब कुछ बिखर गया. एक शक ने दो ज़िन्दगियों को बर्बाद कर दिया.

सुशील को लगा कि उसकी पत्नी किसी और व्यक्ति से प्रेम संबंध है. शक दिन पर दिन इतना बढ़ गया कि आखिरकार एक दिन तनातनी ने हिंसक रूप ले लिया और सुशील ने पत्नी की ह्त्या कर दी. उसके बाद क़ानून से बचने की कोशिश में उसने अपनी पत्नी के शरीर के टुकड़े टुकड़े करके तंदूर में जलाने की कोशिश की थी.

जांच में पुलिस ने सुशील को अभियुक्त बनाया और अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया के अनन्तर उसे दोषी पाया. 2003 में शर्मा को 2003 में निचली अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन 20117 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी थी. हालांकि 2015 में सुशील को एक बार पैरोल भी मिली थी.

(इन्द्रनील त्रिपाठी)