#द्रविड़ियन_रेस का_पोस्टमोर्टम : भाग -1 : एक झूठ जो विदेशी ईसाइयों ने ईसाइयत फैलाने के लिए बोला

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यह मात्र एक झूठ नहीं, एक झूठ से शुरू हुई साजिश थी जिसकी भूमिका को रचने के लिये दक्षिण भारत मे संस्कृत और हिन्दी विरोध के बैकग्राउन्ड की बाकायदा स्थापना की गई.

हम लोग जानते हैं ,जब भी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने की कोशिश होती है, दक्षिण भारत का एक बड़ा तबका अंग्रेजी के साथ खड़ा नजर आता है / उत्तर भारत के लोगों को लगता है कि ये लोग राष्ट्र विरोधी हैं जबकि बात कुछ और है.

सच्चाई ये है कि दक्षिण भारतीय , खास तौर पर तमिलवासी , संस्कृत / हिंदी के विरोध में खड़ा होता है / और उसके इस रिएक्शन के पीछे एक इतिहास है ,,लेकिन वो इतिहास 150 साल से ज्यादा का नहीं है / इसी का अब हम पोस्ट मोर्टेम करेंगे.

जिस तरह आपने देखा कि संस्कृत ग्रंथों के अनुसार “आर्य’ शब्द को शाश्त्रों में एक आदरसूचक सम्बोधन को कहते हैं , लेकिन क्रिस्चियन /यूरोपियन संस्कृतविदों ने उसको आर्यन रेस / नश्ल घोषित करके,भारतीय समाज का सत्यानाश किया,और विश्व के #सुप्रीमआर्यहिटलर और जर्मन इसाइयों ने 60 लाख यहूदियों और 40 लाख जिप्सियों की बर्बरतापूर्वक हत्या करवाई / उसी तरह एक शब्द है -“#द्रविड़” जिसको कि पादरियों ने एक नयी रेस/ नश्ल का नाम दे दिया . इस “द्रविड़ रेस” को आर्यों के हांथो पराजित और विश्थापित नश्ल सिद्ध किया , जो अभी भी सबसे बड़ा राजनैतिक हथियार है दक्षिण भारत में / और अभी भी वहां की क्रिस्चियन मिशनरियां उस तथाकथित पराजित और विश्थापित कौम के कपोलकल्पित इतिहास की दुहाई देकर आज भी धर्म परिवर्तन का खुला खेल खेल रहीं है.

पहले ये चर्चा करेंगे कि “द्रविड़ शब्द” को “द्रविड़ रेस” में कैसे परिवर्तित किया गया , और फिर ऐतिहासिक संस्कृत ग्रन्थ के अनुसार द्रविड़ शब्द का अर्थ क्या होता है / इसी शब्द को कालांतर में दलित चिंतकों ने शूद्रों से कैसे जोड़ा, अछूतों से कैसे जोड़ा ? 150 वर्षों में 87.5 % टेचनोक्रट्स जो बेरोजगार और बेघर हो गए उनसे कैसे इनका रिश्ता जोड़ा ? कैसे ब्रम्हानिस्म और ब्राम्हण शब्द को खलनायक कि तरह पेश किया ?

ब्रिटिश अधिकारीयों और धर्म परिवर्तन का एजेंडा वाले क्रिश्चियन पादरिओं के राजनैतिक और ईसाइयत की ,मिलीजुली शाजिश का परिणाम है – द्रविड़ और द्रविड़ियन रेस के उपज की थ्योरी/ “कल्पना की उड़ान” / जोकि अभी भी वामपंथ और दलित चिंतकों का मुख्य “Modus oparandi ” है, जिसके जरिये वे बिना तथ्यों के इतिहास को अपने मनमाने हिसाब से लिखते हैं /
दो अधिकारी फ्रांसिस व्हीट एलिस और अलेक्सैंडर डी कैम्पवेल ने तेलगु और तमिल भाषाओँ के व्याकरण का अध्ययन किया, और एक नए सिद्धांत कि परिकल्पना रची , कि ये भाषाएँ,अन्य भारतीय भाषाओँ से भिन्न हैं /फिर एक नए अधिकारी B H Houghton ने एक नए शब्द कि रचना की -“#तमिलियन “, और एक नयी तथ्यहीन और कपोल कल्पित कहानी को जन्म दिया कि- ” ये तमिलियन ही भारत के मूल निवासी थे” /

इस तरह एक नयी आधारहीन परिकल्पना ने जन्म लिया/ फ्रांसिस व्हीट एलिस और अलेक्सैंडर डी कैम्पवेल ने तमिल और तेलगू भाषियों को भाषायी, और B H Hondsgon ने नश्लीय / रेसियल भिन्नता के आधार एक अलग नश्ल की परिकल्पना की /

परन्तु इन तेलगु और तमिलभाषी भारतीयों को एक अलग नश्ल / रेस सिद्ध करने के असली षडयन्त्र, बिशप रोबर्ट कलडवेल (1814-91 ) नामक एक पादरी ने की/ जिसने ऊपर वर्णित भाषायी और नश्लीय भिन्नता को आधार बनाकर एक पुस्तक लिखी (लेखन परंपरा / श्रवण परंपरा ) जिसका नाम था -“Comparative Grammar of the Dravidian Race ” जो आज भी बहुत पॉपुलर है.

बिशप रोबर्ट कलडवेल ने नए विचार का जन्म दिया कि Dravidian भारत के #मूलनिवासी थे , आर्यों के आने के पूर्व / परन्तु -“आर्यों के एजेंट ब्राम्हणों ” ने इन भोले भाले द्रविडिअन्स को धूर्ततापूर्व (Cunning ) धर्म के बंधनों में जकड रखा है, और जब तक संस्कृत शब्दों को तमिल भाषा से बाहर नहीं निकला जाएगा,ये भोले भाले द्रविड़ लोग अन्धविश्वास से मुक्ति नहीं पायेगे / (ज्ञातब्व हो की जो नेटिव परम्पराएँ और शाश्त्र ,बाइबिल के फ्रेमवर्क में फिट न हो , उसे इसाइयों ने मिथ और अन्धविश्वास की श्रेणी में रखा ) इसलिए कड्वेल जैसे यूरोपीय लोंगो का कर्तव्य है कि भोले भाले द्रविडिअन्स को अंध विश्वास से मुक्ति दिला कर उनकी आत्माओ को अवलोकित करें यानि क्रिस्चियन धर्म में शामिल करे.

इस तरह रखी गयी ब्राम्हणवाद और ब्राम्हैनिज़म के विरोध और गाली देने की आधार शिला / Cunning Brahmans जैसे शब्दों का प्रयोग ,पहली बार क्रिश्चियनिटी को स्थापित करने के लिए हुवा / H T COLEBROOKE ने 1801 में एक लेख लिखा – की सभी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं / लेकिन ALAXANDER डी कैम्पबेल और व्हीट एलिस , जो कि मद्रास का कलेक्टर था , दोनों ने एक पुस्तक लिखी – “ग्रामर ऑफ़ तेलगू लैंग्वेज ” (१८१६) – जिसमे उन्होंने कल्पना और खड़यन्त्रकारी तरीके से ये तथ्य पेश किया कि तमिल और तेलगु की उत्पत्ति संस्कृत से नहीं किसी अन्य भाषा से हुयी है / ये एक क्रांतिकारी और विघटनकारी नया खेल खेल गया , विदेशियों के द्वारा भारतीय समाज को बांटने का / अब इस तथ्य को बाइबिल के फ्रेमवर्क में फिट करना था ,,तो व्हीट एलिस ने दावा किया कि #द्रविड़ियनलैंग्वेजेज (तमिल और तेलगू ) कि उत्पत्ति #हिब्रू भाषा से हुयी है.

वो कैसे ? ?

तो अब देखिये इससे एक तीर से तीन शिकार किये उन्होने –

(१) इन भाषाओँ को संस्कृत और संस्कृत भाषियों से डिसकनेक्ट –( ईसाइयत फ़ैलाने के लिए मैदान साफ़)
(२) हिब्रू किसकी भाषा है …ये वो भाषा है जो जीसस क्राइस्ट बोलते थे / ( ईसाइयत से कनेक्ट – ईसाइयत फैलाने का आधार )
( आप गूगल करें तो Dravidian Language को Hebrew से कनेक्शन मिल जाएगा , इसीलिए गूगल बाबा सच्चे बाबा नहीं है , बस अच्छे बाबा है , आपको सोच समझकर उनको पढ़ना चाहिए )
(३) अगले 100 सालों में जब भारत की जीडीपी, विश्व जीडीपी की 25 प्रतिशत हिस्सेदारी खोकर , मात्र 2 प्रतिशत का shareholder रह जाएगा , और लगभग 87.5 % प्रतिशत टेचनोक्रट्स , व्यापारी और अन्य लोग ,जब बेरोजगार और बेघर हो जाएंगे , तो एक वर्ग का उदय होगा जिसको दलित वर्ग कहा जाएगा , और फिर ईसाइयत को फ़ैलाने का बड़ा मजबूत तबका एक साथ , इन पादरियों को उपलब्ध होगा


(डॉक्टर त्रिभुवन सिंह)
Disclaimer: इस आर्टिकल में लेखक के विचार पूरी तरह निजी हैं जिनकी सत्यता,व्यावहारिकता या संपूर्णता के प्रति न्यूज़ इंडिया ग्लोबल (NIG) जिम्मेदार नहीं है. लेखक के लेख को ज्यों का त्यों प्रकाशित किया है और इसमें कोई छेड़छाड़ या संपादन नहीं किया गया है. इस आर्टिकल के जरिए दी गई कोई भी जानकारी, सूचना, ज्ञान, विचार, विचारधारा लेखक के निजी हैं और उनके लिए न्यूज़ इंडिया ग्लोबल (NIG) उत्तरदायी नहीं है.

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