नवाजुद्दीन ठाकरे – एक ज़िन्दा कहानी

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लोकशाही नहीं ठोकशाही चलेगी का नारा देने वाले… हिंदुस्तान के फायरब्रांड नेता बाला साहेब ठाकरे की जिंदगी पर बनी फिल्म ठाकरे इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही है… नवाजुद्दीन सिद्दिकी की अदायगी वाली ये फिल्म इन दिनों हर दिल अजीज बनी हुई है… फिल्म ठाकरे को उनके ही करीबी और शिवसेना के नेता संजय राउत ने अपने तजुर्बों से संवारा है और बाला साहेब की जिंदगी के हर पहलू को छूने की कोशिश की है…

शिवसेना के अखबार सामना का संपादकीय लिखने वाले वाले संजय राउत ने जिस तरह से फिल्म की पटकथा लिखी है… उसके जरिए उन्होंने दर्ज़ करा दिया है कि वो न सिर्फ एक राजनीतिज्ञ और पत्रकार हैं बल्कि ये भी जता दिया है कि उनके अंदर एक आला दर्जे का कहानीकार भी करवट लेता है… फिल्म ठाकरे संजय राउत और नवाजुद्दीन की मिलीजुली मेहनत का नतीजा है… फिल्म की कहानी के अलफाज़ संजय राउत के है तो उन अलफाज़ों को खूबसूरती से ज़ामा पहनाया है नवाजुद्दीन सिद्दकी ने…

नतीजा ये रहा कि दर्शकों को एक उम्दा किस्म की फिल्म देखने को मिली… ठाकरे की इस बायोपिक में बाला साहेब के ग्रे शेड वाली तस्वीर को सामने रखते हुए… उनकी सोच को जस्टिफाई करने की कोशिश की है, ताकि उनके अक्स की नक्काशी हो सके और ऐसा निगार पेश हो सके जिससे साहेब मराठी मानुस के साथ साथ हर हिंदुस्तानी के जेहन में फिर जिंदा हो सकें… बाला साहेब के तमाम विवादस्पद फैसलों को कहानी में रखा गया है, साथ ही उनकी तस्वीर नायक की तरह पेश कर के… उनके फैसलों का समर्थन किया गया है…

अभिजीत पानसे के निर्देशन में फिल्म ठाकरे उन सभी सवालों का जवाब देती है …जिनसे बाल ठाकरे जीवन भर घिरे रहे, फिर चाहे वो लोकतंत्र में भरोसा न करने का उनका सिद्धांत हो या फिर आपातकाल का समर्थन हो या मराठावाद की हिमायत… फिल्म में साहेब के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने गज़ब की अदाकारी की है… एक्टिंग में उनकी पकड़ का नतीजा है कि वो पूरी फिल्म में बाला साहेब ही लगे… दर्शकों को कहीं नहीं लगा कि नवाजुद्दीन उनके सामने हैं… हर सीन के लिए उन्होंने मेहनत की… फिल्म में एक पिता… एक पति और नाजुक दिल वाले किरदार को उन्होंने जिंदा कर दिया…

फिल्म के दूसरे कलाकारों ने भी अपने किरदार के साथ इंसाफ किया… साहेब की पत्नी मीना ठाकरे का रोल करने वाली अमृता राव के लिए फिल्म में कम जगह थी लेकिन उतने में ही उन्होंने दमदार तरीके से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है… हालांकि फिल्म का दूसरा हिस्सा कुछ डाक्यूड्रामा की तरह हो गया है लेकिन देखा जाए तो फिल्म के निर्देशक अभिजीत पानसे की मेहनत रंग लाई है… अभिजीत ने निर्देशन के जरिए 1960 से 1993 तक के हर दौर को बहुत खूबसूरती से फिल्माया है…

फिल्म की कास्टिंग बड़ी जानदार है… फिल्म का हर किरदार हूबहू असली किरदार की तरह ही नजर आता है… फिल्म के कहानीकार संजय राउत इतनी शानदार पटकथा लिखेंगे ये दर्शकों के सिनेमाहाल में आने के बाद ही पता चलता है… लेकिन दर्शकों के लिए मायूसी की बात ये है कि फिल्म तीन स्विकेल में पूरी होगी, जिस से उनका इंतजार लम्बा होना तय है…

फिल्म ठाकरे हिंदी के अलावा अंग्रेजी और मराठी में भी बनाई गई है ताकि हर कुनबे के दर्शक फिल्म से जुड़ सकें… और ये भी संभव है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में शिवसेना को इसका राजनीतिक फायदा भी मिले… बॉक्स ऑफिस पर फिल्म अच्छा बिजनेस कर रही है और उम्मीद है कि आने वाले वक्त में इसे दर्शकों की रिस्पॉन्स और ज्यादा मिले… फिल्म के लेकर हमारा मशविरा ये है कि अगर आप बाला साहेब ठाकरे के मुरीद हैं, अगर आप बायोपिक के शौकीन हैं और अगर आपकी अच्छी फिल्म देखने की ख्वाहिश है तो ठाकरे आपको नाउम्मीद नहीं करेगी.\

इन दिनों सिल्वर स्क्रीन पर बायोपिक का चलन देखने को मिल रहा है… लेकिन बायोपिक का चलन अभी का नहीं है… हिंदुस्तान की पहली फिल्म ही बायोपिक थी… ये दौर अभी ऊफान पर है, कई अज़ीम शख्सियत सिनेमाई पर्दे पर बॉलीवुड की शान बढ़ाने के लिए कतार में हैं…

सिनेमा के रुपहले पर्दे पर बायोपिक का चलन अभी का नहीं है… बल्कि भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म राजा हरीशचंद्र बायोपिक ही थी… सिनेमा के हर दौर में इस तरह की फिल्में बनती आई हैं… ये अलग बात है कि शुरुआती दौर में ये बायोपिक्स राजा महाराजाओं और देवी देवताओं पर बनती थीं… लेकिन धीरे धीरे इनकी सूरत बदलती चली गई… राजा महाराजाओं की जगह आजादी के मतवालों ने ले ली… बायोपिक्स का केसरिया रंग हो गया…

इस फैहरिस्त में शहीद भगत सिंह, गांधी, अंबेडकर, बोस, वीर सांवरकर, सरदार जैसी फिल्में शामिल रहीं… जिनमें शहीद भगत सिंह को तो जबर्दस्त कामयाबी मिली… बाकी दूसरी फिल्मों को तारीफ और तालियों से तो नवाज़ा गया लेकिन ये कॉमर्शियली बेहद कमजोर रहीं… जिसके चलते असर ये हुआ कि बायोपिक का दौर थमता नजर आने लगा… इन फिल्मों से निर्माता निर्देशक की अच्छी फिल्म बनाने की भूख तो मिटी लेकिन व्यवसायिक लाभ की जो उन्हें उम्मीद थी वो टूट गई…

इस दौर में बैंडिट क्वीन और गुरु ही ऐसी फिल्में रहीं जिसने निर्माताओं के बीच बायोपिक की कामयाबी की थोड़ी आस को जिंदा रखा… साल 2011 में दक्षिण भारत की अभिनेत्री सिल्क स्मिता पर डर्टी फिल्म नाम से फिल्म बनी… इस फिल्म की कामयाबी के बाद… एक बार फिर मेकर्स का मिजाज बदला और बॉलीवुड में बायोपिक का फिर दौर शुरू हो गया… फरहान अख्तर की भाग मिल्खा भाग ने कामयाबी की कई इबारत लिखीं…

फिल्म ने सौ करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया… नतीजा ये हुआ कि बॉलीवुड में बायोपिक जुकाम हो गया और ये लगातार फैलता रहा… धोनी द अनटोल्ड स्टोरी… नीरजा… एयरलिफ्ट… दंगल जैसी तमाम फिल्में आईं… जिन्होंने तारीफ के साथ मुनाफा भी बटोरा… लेकिन बायोपिक से कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़े… राजकुमार हिरानी की फिल्म संजू ने… ये फिल्म हिंदुस्तान की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की लिस्ट में… तीसरे नम्बर पर शुमार हुई…

संजू फिल्म की कामयाबी के बाद… बायोपिक बनाने की छटपटाहट खुल कर देखने को मिली… इस तर्ज पर कई फिल्मों का निर्माण होने लगा… खेल, राजनीति, शिक्षा, ग्लैमर, कोई क्षेत्र नहीं बचा… जिनकी मशहूर शख्सियतों पर बायोपिक नहीं बन रही हो… हालांकि एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और ठाकरे फिल्म को… राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास भी कहा जा रहा है… लेकिन इतना जरूर है कि इन फिल्मों के जरिए दर्शकों का मनोरंजन खूब हो रहा है…

माना जाए तो बायोपिक का ये दौर अभी ऊफान पर है… कई फिल्में बन रहीं हैं और कई फिल्में रिलीज होने की कतार में हैं… नरेंद्र मोदी से लेकर सायना नेहवाल पर फिल्में बुनी और गढ़ी जा रही हैं… हिंदुस्तानी सिनेमा के इतिहास में 2010 के बाद के दौर को… अगर बायोपिक दौर कहा जाए तो गलत नहीं होगा… हालांकि इस दौर में बनने वाली फिल्में मुनाफा तो कमा रही हैं साथ ही ये फिल्में… दर्शकों के लिए मीनिंगफुल भी हैं…

दर्शक जहां इन फिल्मों के जरिए… हिंदुस्तान की अजीम शख्सियतों के सफरनामे से रूबरू हो रहे हैं तो वहीं… पद्मावत और मणिकर्णिका जैसी फिल्में भारत की भव्यता और गौरवशाली इतिहास का दीदार करवाते नजर आ रहीं हैं… आज के दौर में जब बॉलीवुड हॉलीवुड की टक्कर में खड़ा नजर आ रहा है… स्टोरी, टैक्निक, स्टंट और प्रज़ेंटेशन में हॉलीवुड से कमतर नजर नही आ रहा है ऐसे में बायोपिक फिल्मों की कामयाबी अपने आप में अद्भुत है…

बायोपिक्स ने हिट फिल्मों के फार्म्यूले को दरकिनार करते हुए… सारे ट्रैंड्स को नजरअंदाज करते हुए… कामयाबी की नई पारिभाषा गढ़ डाली है… इनकी कामयाबी हमें यकीं दिलाती हैं कि हवा ही रोशनी का फैसला करती है और जिस दिए में जान होती है वो दिया ही रोशन रहता है…

पसीने की स्याही से जो लिखते हैं अपने इरादों को, उनके मुक्कदर के पन्ने कभी कोरे नहीं रहते… ये साबित किया… बेतकल्लुफ अंदाज, तलाशती आंखे, जिगर को चीरती हुई आवाज और बेमिसाल अदाकारी के मालिक नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने… मुफलिसी की ज़मीं से कामयाबी के फलक़ तक का सफर कैसे तय करते हैं…

ये सिखाया नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने… इरादा मजबूत हो तो कायनात भी आ जाती है दामन में… ये दिखाया नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने… नवाज ने अपने जुनून, सब्र और मेहनत से… वो सब हासिल किया है जिसकी ख्वाहिशमंद दुनिया होती है… आज नवाजुद्दीन सिद्दीकी को किसी पहचान की दरकार नहीं है… दौलत, शौहरत और इज्जत सब उनके कदम चूमती है… लेकिन इस मकाम को पाना उनके लिए आसान नहीं था, इस सफर में उन्हें कई दफे अपने जज़्बातों को, ख्वाहिशों को… चाहतों और इज्जत को… गिरवी रखना पड़ा लेकिन…

ख्वाबों की डौर को हाथों से छूटने नहीं दिया… तमाम सिलवटें ली हुई अपनी किस्मत को… उन्होंने अपने हुनर और सब्र की इस्त्री से सवांरा… नतीजा ये हुआ कि आज उनकी उड़ान के सामने आसमान कम पड़ गया…

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के छोटे से गांव बुधना के… रहने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी का जन्म… 19 मई साल 1974 में… एक ज़मींदार मुस्लिम परिवार में हुआ… आठ भाई बहनों में सबसे बड़े नवाज ने अपनी ग्रेजुएशन तक की तालीम… हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से साइंस साइट से की… इसके बाद वो बतौर कैमिस्ट बड़ोदरा की… एक मेडिकल कंपनी से जुड़ गए… लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था…

दिल्ली में एक नाटक को देख कर उन्हें लगा कि… उन्हें भी अदाकारी की दुनियां में अपनी किस्मत को आजमाना चाहिए… फैसला हो चुका था और नवाज ने नौकरी छोड़ कर दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला ले लिया… उनके घरवालों को नवाज का ये फैसला रास नही आया लेकिन नवाज अपने सपनों की धुन में जिंदगी के साथ… कदम से कदम मिलाते रहे… NSD से ग्रेजुएट होने के बाद… साल 1996 में वो… किस्मत आजमाने मायानगरी मुंबई पहुंच गए…

हल्की कद काठी, साधारण सूरत की वजह से हर जगह उन्हें सिर्फ… न सुनने को मिला… साल 1999 में आमिर खान की फिल्म सरफरोश में… एक छोटे से गेस्ट रोल के तौर पर… उनको बॉलीवुड में डेब्यू करने का मौका तो मिला… लेकिन बॉलीवुड के दरवाजे उनके लिए पूरी तरह से अभी भी नहीं खुले… नवाज को साल 2007 तक छोटे छोटे रोल ही मिले… जिसकी वजह से गुजारा करना और मुंबई में रहना नवाज के लिए मुश्किल होता चला गया…

साथ ही उनकी माली हालत इतनी खस्ता हो गई कि वो जिंदगी दूसरों की शर्तों पर जीने को तैयार हो गए… शर्तें भी ऐसीं कि अगर दूसरों का खाना बनाओगे तभी सिर पर छत रहेगी… नवाज सारी जिल्लतों और ज़लालतों की अधपकी नींद लेते हुए… कामयाबी का ख्वाब आंखों में दबाए रहे… एक दिन वो वक्त आया… जब नवाज की परवाज भरने के रास्ते खुल गए… साल 2007 में नवाज को अनुराग कश्यप की फिल्म… ब्लैक फ्राइडे में छोटा सी भूमिका मिली…

नवाज ने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया… और छोटे से किरदार में जान फूंक दी… इसके बाद उनके दिन बदलने लगे और हर किरदार में… परत दर परत खुद को निखारते चले गए… साल 2012 को फिल्म कहानी से उनकी जिंदगानी बदल गई… नवाज का तारूफ अच्छे अदाकारों में होने लगा… इसके बाद वो रुके नहीं और एक बाद एक कई फिल्मों में अदाकारी का… शानदार मुजाहिरा करते हुए… ऊंचाइयों के पायदान पर चढ़ने लगे…

उन्होंने हर तरह के किरदार किए और… उन किरदारों को यादगार बना डाला… गैंग्स ऑफ वासेपुर का फैज़ल खान हो या बजरंगी भाईजान का रिपोर्टर… उनकी अदाकारी का क़ायल ज़माना हो गया… मंटो और ठाकरे में नवाजुद्दीन साबित कर दिया कि वो महज अदाकार ही नही बल्कि अदाकारी की खान हैं… नवाजुद्दीन सिद्दीकी दिन ब दिन कामयाबी की नई इबारते लिखते जा रहे हैं साथ ही ये भी सिखाते जा रहे हैं कि अगर राहों को रोशन करना है तो दिल में उम्मीदों की लौ जलाए रखना जरूरी है

(इन्द्रनील त्रिपाठी)

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