भाजपा नहीं, आप हारे हैं! भाजपा को नहीं, आप को जीतना है!

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यहाँ सोशल मीडिया पर बड़ी बड़ी बातें लिखी जाती हैं किन्‍तु उनकी पहुँच एवं प्रभाव आज भी सीमित हैं। इस कारण से इसका त्याग नहीं होना चाहिये क्यों कि यह वह मञ्च है जो ऐसे अनेक को स्वर देता है जो अन्यथा चुप ही रहते, अकहे ही रह जाते।

सोशल मीडिया की सीमाओं एवं प्रभाव क्षमता को समझा जाना चाहिये। रसायन विज्ञान के विद्यार्थी उत्प्रेरकों से परिचित होंगे। अभिक्रिया हेतु उनकी उपस्थिति चार चाँद लगा देती है किंतु स्वयं में वे इच्छित परिणाम नहीं दे सकते। ढीले ढाले सरलीकरण में अभी की सोशल मीडिया को उत्प्रेरक से समझा जा सकता है।

Perception हेतु एक बड़ा ही सुंदर शब्द है – भाति। भोजपुरी में जिसे ‘बुझाइल’ कहा जाता है, बुद्धि एवं बोध का मेल। इसे भान भी कह सकते हैं। लोकतंत्र का जो प्रारूप आप अपना रखे हैं, उसमें भान बहुत महत्वपूर्ण होता है। मँगरू, महेंदर, माइकेल, मोहम्मद, मोंगासिंघ तथा मार्कण्डेय, इन सबके मत का मूल्य एक होता है। मार्कण्डेय मत देने या तो जाते ही नहीं, या बहुधा नोटा दबा कर आ जाते हैं। गणित देखें, सत्तर प्रतिशत का मतदान हो तथा विजयी को उसमें से ४० प्रतिशत मिले तो वह सकल वयस्क जनसंख्या का मात्र अट्ठाइस प्रतिशत पाकर विजयी हो जाता है।

मत प्रतिशत की भूमिका वहीं समाप्त हो जाती है। जयी ही सरकार बनाते हैं, नीतियाँ बना कर राज करते हैं तथा प्रशंसा या गालियाँ खाते हैं। उनके पक्ष या विपक्ष का मत प्रतिशत राज चलाते समय कोई महत्व नहीं रखता। यहाँ जो रोटी की दृष्टि से सुविधाजनक स्थिति में हैं, तीक्ष्ण विश्लेषणात्मक बुद्धि के स्वामी हैं, उनके तर्क मँगरू नहीं समझता। उसकी समझ, उसका संसार, उसका स्वार्थ, सब छोटे होते हैं किन्‍तु संख्या दृष्टि से वह बहुत बड़ा होता है तथा उसके मतदान केंद्र पर पहुँचने की सम्भावनायें अधिक होती हैं अर्थात वास्तविक भाग्यविधाता वही होता है। आप उसे मूर्ख बना सकते हैं, उसका भावनादोहन कर सकते हैं, उसे दारू रुपया दे कर क्रय कर सकते हैं किन्‍तु इन सबसे उसकी महत्ता अल्प नहीं हो जाती।

यहीं भान, स्वार्थ, भावना एवं बुद्धि महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। भारत में चुनाव इन्हीं के प्रबंधन से लड़े जाते रहे हैं, आगे भी बात यही रहनी है क्यों कि आमूल चूल परिवर्तन की बातों एवं अराजक राज की लहरों पर सवार हो कर आये पापियों की करनी जनता देख चुकी है। दुबारा कोई प्रयास करेगा तो उसे पहले सकारात्मक भान को स्थापित करना होगा तथा यह मान कर चलना होगा कि जनता उसे भी ‘एक और मूर्ख बनाने वाला’ ही समझेगी।

तब जब कि चुनाव व्ययसाध्य हैं, तब जब कि लड़ने में लगा धन एक निवेश है जिस पर आगे पाँच वर्ष या उससे भी बहुत आगे तक लाभ लेना है; कोई भी पार्टी एक व्यावसायिक निगम की भाँति ही काम करेगी, अपने हेतु प्राथमिकता के भिन्न भिन्न क्षेत्र भले चुन ले।

२०१४ लोकसभा चुनावों में भान तत्कालीन सत्तापक्ष के बहुत विरुद्ध था तथा जो विकल्प था उसके पक्ष में हिन्‍दुत्व के पोषक समृद्ध राज्य की पृष्ठभूमि थी। उसने समझा एवं यह मानते हुये कि जो मिला ही हुआ है, उस पर क्या केंद्रित होना, चुनावों में हिन्‍दुत्त्व के स्थान पर विकास की बातें की। जीता तो उसके नाभिक पक्ष के मतदाताओं का समर्थन था ही, मँगरू का भान, उसकी अपेक्षायें, उसकी आशायें भी साथ लगी थीं। आगे बढ़ते हुये सकारात्मक भान का प्रभाव विधानसभा चुनावों पर भी पड़ा यद्यपि बिहार का उदाहरण ही सत्ता में बैठे कांग्रेसी विकल्प को सावधान करने हेतु पर्याप्त होना चाहिये था।

वास्तविकता यह थी कि मँगरू या महेंदर की अपेक्षाओं को साधना तब भी बहुत कठिन था, आज भी है। उसकी परास बहुत सीमित है, उसकी प्रतिक्रिया भी, तथा प्रतिक्रिया न दे पाने की स्थिति में उसके अपने छोटे संसार में लौट जाने की संभावनायें बहुत बड़ी। उसे जो साध लेगा, विधानसभा में वही जीतेगा क्यों कि वहाँ का अंकगणित भी छोटी परास में काम करता है। राज्यों के चुनाव परिणाम इस सत्य को पुन: दर्शाये हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि अनुसूचित जातियों को कथित रूप से प्रभावित करने वाले निर्णय की वास्तविकता क्या थी? प्रश्न यह है कि संदेश क्या गया एवं उसका भान परिवर्तित करने हेतु क्या किया गया? उलटने की प्रक्रिया में क्या संदेश गया तथा कौन सा भान स्थापित हुआ? लघु परास में उसके परिणाम स्पष्ट हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि हिंदुत्त्व हेतु क्या किया गया? प्रश्न यह है कि सबका साथ की भङ्गिमा लिये हुये अपने अभिनय को भी वास्तविक समझा जाने लगा तथा यह माना जाने लगा कि माइकेल, मोहम्मद एवं जुलेखा बेगम भी आ गयीं पाले में ! जिन लोगों ने शताब्दियों से समस्त संसार पर राज किया, जो आज भी समस्त संसार हेतु कैंसर बने हुये हैं, उन्हें महँगू महेन्दर की भाँति या नितांत मूर्ख समझने की भूल मूर्ख ही कर सकते हैं। निगमों में, कम्पनियों में प्रबंधन से ऐसी भूलें हो जाती हैं किन्‍तु इनसे वे डूबती नहीं हैं, मारे वे जाते हैं जिनके हित हत होते हैं।

प्रश्न यह है कि क्या हिंदुओं ने अपने लिये लोकतंत्र के इस मायावी प्रारूप में कोई अन्य कम्पनी खड़ी की है? यदि नहीं तो भले घर की तज कोठे वाली को लुभाने में लगी हो, भाजपा के अतिरिक्त हिंदुओं के पास कोई विकल्प है भी? यहाँ बहुत बड़ा तर्क रेला आयेगा, हम भाजपा से नहीं, भाजपा हम से है; हम सहस्राब्दियों से बने हुये हैं, भाजपा पर आश्रित नहीं आदि इत्यादि। ऐसे तर्क सुनने में बड़े क्रांतिकारी लगते हैं किंतु कालबोध से शून्य होते हैं। वे गतिकी पर ध्यान नहीं देते कि कभी लाहौर में भी वे बने हुये थे तथा कैराना में भी।

वे ध्यान नहीं देते कि ग्राम सिधुवा टप्पा गुलहरिया मौजा गोबरही में सृष्टि के आरम्भ से दो वर्ष पूर्व तक जीसस क्राइस्ट के भजन नहीं गाये गये थे, आज गाये जा रहे हैं तथा महँगू एवं महेंदर अपनी छोटी बुद्धि में इस पर मीमांसा कर रहे हैं कि क्या जाति बनाये रखते हुये धरम नहीं परिवर्तित कर सकते? सरकार तो आरक्षण में मान्यता देती ही है! ऐसे भी हिंदू हैं जो ‘पण्डित नेहरू’, उनकी पुत्री तथा उनके आगे के जोशुआ खानदान में ‘सुद्ध बरम’ देखते हैं तथा जिन्हें अपने झूठे दम्भ का झण्डा ऊँचा रखना ही है, मरने के पश्चात किसने देखा कि संतानों पर क्या बीतनी है? उन्हें कश्मीरी पण्डितों की भूलें दिखाई ही नहीं देती, कश्मीरी ‘असुद्ध बरम’ होते हैं।

आप के पास समय नहीं है, भाजपा नहीं, आप हार रहे हैं – धीरे धीरे परन्तु सुनिश्चित। इस समय भाजपा के साथ लग कर उसे अपने पक्ष में मुड़ने को बाध्य करने के अतिरिक्त आप के पास कोई विकल्प नहीं है। यदि आप समझ रहे हैं कि ‘पण्डित नेहरू’ वाली कांग्रेस अपना चरित्र तज हिंदू सभा हो जायेगी तो आप से बड़ा मूर्ख कोई नहीं है। डाँट कर, डपट कर, चाहे जैसे भी हो २०१९ में आप को भाजपा को केंद्र में पुन: लाना ही होगा।

उस समय भी इस कम्पनी से कोई बहुत क्रांतिकारी आशा न पालें किंतु आप के पास विकल्प पर काम करने को समय रहेगा, क्या पता कि भाजपा ही वास्तव में घनघोर हिन्‍दूवादी पार्टी बन जाये? ध्यान रखें कि ये घण्टा मैंने आप के लिये लिखा है, भाजपा के लिये नहीं। सुनिश्चित करें कि कौन सा पाला पकड़ना है अन्यथा भाजपा के पास धन तो है ही, फडनवीश एवं आगामी क्रिसमस में मसीही भजन गाने वाली उसकी बीबी भी है। उनके स्वास्थ्य पर कोई अंतर नहीं पड़ना, वे आते जाते रहेंगे, समस्या आप की है। आप हारे हैं, वे नहीं। मैं क्रिसमस से पहले ही इसाइयों के प्रकाशित मुखमण्डल यहाँ देख पा रहा हूँ। देश एक दिन में नहीं मिटते, दशकों में कट जाते हैं। घुन आरी से अधिक प्रभावी होते हैं। आरी का काटा पनप सकता है किंतु घुन का खाया कदापि नहीं !

किं किं श्रद्धा प्रयत्नाभ्याम् जगतीह न साध्यते !
श्रद्धा एवं निरंतर प्रयत्नों से इस संसार में मनुष्य क्या नहीं पा सकता !

(सनातन सिंह)

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