मध्यप्रदेश में कमल ‘अनाथ’ नहीं हुआ क्योंकि कमलनाथ हैं न !

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कल तक जो जनता कमल के साथ थी आज वो कमलनाथ के साथ है. मध्यप्रदेश में वाकई गजब सियासी बिसात है.

15 साल बाद जब मध्यप्रदेश में सत्ता की बगियां से कमल को उखाड़ा जाने लगा तो माली की आंख भर आई. पंद्रह साल तक माली कभी मामा तो कभी मसीहा के रूप में बगियां में मुफ्त की खैरात से लेकर विकास का पानी सींचता रहा. जो राज्य अंधेरे में डूब कर बिजली के सपने देखता था तो जमीन पर चलने के लिए सड़क ढूंढता था उसे इतना आराम मिल गया कि 15 साल में सरकार की जो रोटी गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों, किसानों और बेरोजगारों की रोटी भूख मिटाती थी वही तवे पर जलती हुई दिखने लगी. तवे की रोटी को पलटकर जनता ने 15 साल पुरानी शिवराज की सरकार भी पलट दी. ये राजनीति की विडंबना है जो साबित करती है कि जनता को मूर्ख समझने वाले असल में जनता को कभी समझ ही नहीं पाए हैं. नेता को गरियाना आसान है लेकिन जनता को समझना मुश्किल.

शिवराज सिंह ने हार की नैतिक जिम्मेदारी ली. पद से इस्तीफा दिया क्योंकि ये आखिरी औपचारिकता होती है जिसे चुनाव हारने पर राज्य का सीएम पूरी करता है. भावुक भी हुए. याद आए सत्ता के 13 साल. जाते जाते कांग्रेस की किसानों की कर्जमाफी पर सवाल भी कर गए. पूछ डाला कि कांग्रेस कैसे दस दिनों में कर्जा माफ करेगी? ये शिवराज का आखिरी राजनीतिक दांव था जो उन्होंने सीएम आवास में चला. इससे कुछ घंट पहले तक वो सरकार बनाने की जुगत में भी जुटे थे कि किसी तरह एसपी-बीएसपी और निर्दलीय विधायक साथ आ जाएं. लेकिन हो न सका. ठीक उसी तरह जिस तरह चौथी बार चुनाव जीत न सके. मुख्यमंत्री का जो पद आज से 13 साल पहले किसी बीजेपी के सीएम से मिला था उसे सहेज कर रखने वाले शिवराज ने विरासत के तौर पर कांग्रेस के कमल को सौंप दिया. कह सकता है कि राज्य में चुनाव हारने पर कमल अनाथ नहीं हुआ है क्योंकि कमलनाथ हैं न.

कमलनाथ वैसे भी फंड मैनेजमेंट के मामले में सबका साथ –सबका विकास करने वाले माने जाते हैं. कमलनाथ ने कभी भी मध्यप्रदेश में सत्ता को लेकर सत्ते पे सत्ता नहीं चला. यहां तक कि साल 1993 में उन्होंने दिग्विजय सिंह के समर्थन में मोर्चा संभाला था. दिग्विजय सिंह को सीएम बनाने में भूमिका निभाई थी. इस बार दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ को सीएम बनाने के लिए मोर्चा संभाला है. अब छिंदवाड़ा की विकास की सड़क को कमलनाथ को मध्यप्रदेश के उन दूरस्थ इलाकों तक ले जाना है जहां शिवराज विकास के रास्तों को पगडंडी की शक्ल में कच्चा छोड़ गए. मध्यप्रदेश में जब कमलनाथ को कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो इसकी बड़ी वजह ये थी कि पार्टी ने उनके भीतर सबको साथ लेकर चलने की काबिलियत देखी थी.कमलनाथ ने तब कहा था कि वो मुख्यमंत्री पद के भूखे नहीं हैं. कमलनाथ को अरुण यादव की जगह प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. अरुण यादव की सियासी पारी को बुधनी में रन आउट करा दिया गया. अरुण यादव को शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ बुधनी से मैदान में उतारा था. अरुण यादव अपनी पार्टी के काम आ गए. अरुण यादव पर ये आरोप है कि वो अपने कार्यकाल में संगठन का ढांचा खड़ा नहीं कर पाए और केवल एक गुट तक ही सीमित रहे. लेकिन कमलनाथ को मैनेजमेंट का मास्टर कहा जाता है और जिस तरह से उन्होंने मध्यप्रदेश में गुटबाजी के बावजूद चुनाव जीता उससे उनके सीएम पद पर मुहर लगाने में आसानी हुई.

आज के दौर की जो पीढ़ी खासतौर से मध्यप्रदेश के युवा अगर दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा कमलनाथ के बारे में अच्छे से नहीं जानते हैं और केवल उन्हें छिंदवाड़ा का सांसद मानते हैं तो उन्हें भी ये जान लेना चाहिए कि उनके राज्य में पांच साल राज करने वाला सीएम आखिर कौन है. कमलनाथ गांधी परिवार में स्वर्गीय संजय गांधी के बेहद करीबी माने जाते थे. मूल रूप से कोलकाता के रहने वाले कमलनाथ ने छिंदवाड़ा को सियासत की कर्मभूमि बनाया. उनकी लोकप्रियता को इस रूप में समझा जा सकता है कि जब साल 2019 में मोदी लहर में बड़े बड़े नामों के तंबू उखड़ गए थे तो उस आंधी में भी कमलनाथ खड़े हुए थे. आज बीजेपी को कांग्रेस से सिर्फ 0.9 फीसदी कम वोट मिले. कहा जा रहा है कि अगर 4337 वोट मिले होते तो शिवराज फिर से सरकार बना लेते. खैर. जनता को रोटी बदलनी तो बदल दी. शिवराज भी अब सत्ता से हटकर सोचें कि आखिर चूक कहां हुई जो किनारे पर आ कर डूबे. लेकिन कमल पर वोट डालने वाले खुद को ये दिलासा दे सकते हैं कि कमल नहीं तो क्या ….कमलनाथ हैं ना.

(इंद्रनील त्रिपाठी)

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