महागठबंधन – 1 : अमित शाह का बयान और उत्तरप्रदेश में राह नहीं आसान

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लोकसभा का शिकारी मैदान, बुआ-बबुआ का मचान और सामने महागठबन्धन का घमासान..

महागठबंधन ने पूरा ज़ोर लगाया है कि अभी से एकता की शक्ति का पूरा प्रदर्शन कर सकें और बीजेपी को डरा सकें. हालांकि ये अलग बात है कि इस तरह वे बीजेपी की जीत के फॉर्मूले को ही समर्थन दे रहे हैं.

नरेंद्र मोदी कई मौकों पर अपने भाषणों में कह चुके हैं वह बात जो 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने पहली बार कही थी. उन्होंने कहा था कि वो दिन भी आएगा जब चुनाव संग्राम में एक तरफ सारा विपक्ष होगा और एक तरफ अकेली बीजेपी. वह अवसर था जब कांग्रेसी षड्यंत्र सफल हुआ था और वाजपेयी जी की सरकार को एक वोट से गिरा दिया गया था. उस दिन दुःख भरे मन से भी वाजपेयी जी ने अपने प्रभावशाली सम्बोधन में अपनी पार्टी बीजेपी का आत्मविश्वास प्रदर्शित किया था और यह बात कही थी. जिन्होंने नहीं सुना है उन्हें यूट्यूब पर वाजपेयी जी का वह भाषण अवश्य सुनना चाहिए क्योंकि वह भारतीय राजनीति के अमर वक्ता अटलबिहारी वाजपेयी जी का ऐतिहासिक सम्बोधन था.

आज सच हो गयी है वाजपेयी जी की कही बात. वहीं इस सच्चाई ने एक सच और कह दिया है जो सब जानते हैं – सत्यमेव जयते! जहां एक तरफ विपक्ष इतना कमज़ोर है कि आपस में सर जोड़ कर मजबूत होने की कोशिश है वहीं पक्ष अर्थात बीजेपी अपनी नीतियों और राष्ट्रवाद के आत्मविश्वास से सराबोर है. हाल ही में विपक्षी गठबंधन पर बीजेपी सुप्रीमो अमित शाह ने कहा था कि गठबंधन कोई समस्या नहीं है हमारे लिए. हाँ, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन अवश्य हमारे लिए कुछ चुनौती ज़रूर खड़ी कर सकता है.

यह एक राजनीतिक बयान था और उसका लाभ भी मिला बीजेपी को. कुछ डिज़ाइनर पत्रकारों ने इसको जस का तस मान कर हवा दे दी और विपक्ष ने भी आँख मींच कर कान खोल लिए और इसका वही अर्थ लगा लिया जो कहा गया था. सभी ने एकमत से इसे यूपी में बीजेपी की घबराहट मान लिया और इस तरह अन्तर्निहित अर्थ को जानने में असफल रहे विपक्ष ने अमित शाह के मंतव्य को सफल किया.

अब ध्यान से समझिये कहा क्या और चाहा क्या अमित शाह ने. उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन को मजबूत बता कर उन्होंने सपा और बसपा को अतिरिक्त आत्मविश्वास का शिकार होने का अवसर दे दिया. एक तीर से दो शिकार भी कर लिए. अब महागठबंधन की महान पार्टी कांग्रेस को उत्तरप्रदेश में कुछ नहीं मिलने वाला सिवाए दो सीटों के. ये दोनों सीटें माता और पुत्र की हैं ताकि प्रतिष्ठा सलामत रहे. अब कांग्रेस इस बात को मान लेती है तो यूपी में तो उसकी नाक ही कटेगी और यदि वह इस शर्त को नकारती है तो महागठबंधन टूटेगा. कांग्रेस इस शर्त को न मानने के लिए मजबूर इस लिए भी है कि अगर ये शर्त मान ली तो राहुल की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कमज़ोर पड़ती है. इस प्रदेश से ही देश का प्रधानमंत्री बनता रहा है और अस्सी लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश को कोई भी नज़रअंदाज़ करके नहीं चल सकता.

अब इस तथ्य ने यूपी के इन नेताओं को भान करा दिया है  कि वे भी किसी से कम नहीं हैं. यहीं भान पहुंचा सकता है नुक्सान यूपी में गठबंधन को और देश में महागठबंधन को. वैसे आधिकारिक तौर पर सपा-बसपा से इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है किन्तु अंदर से बाहर ख़बरें ला रहे सूत्र बताते हैं कि जाति विशेष के आधारभूत वोट बैंक पर टिके हुए अस्तित्व वाले इन दोनों नेताओं ने तय कर लिया है कि जब मलाई पर हमारा ही नाम लिखा है तो मलाई तो हम ही खाएंगे, बाहर वालों को नहीं खाने देंगे!

आगे अंदरखाने का समाचार ये है कि इस यूपी के ‘महा’गठबंधन में ड्राइविंग सीट पर मायावती बैठी हैं. अखिलेश उनके ‘बड़प्पन’ को स्वीकार कर रहे हैं और ३८ सीटों पर बसपा और ३७ सीटों पर सपा के चुनाव लड़ने की बात तय हुई है. इसके अलावा यहां उन्होंने अपने अतिरिक्त दो ही पार्टियों को पैर रखने की अनुमति दी है एक ज़ाहिर है कांग्रेस है, तो दूसरी रालोद. चौधरी अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोक दल को सपा-बसपा ने कांग्रेस से ज्यादा इज़्ज़त बख्शी है और उन्हें पश्चिमी यूपी की तीन सीटों पर लड़ने की अनुमति प्रदान की है.  वहीं उन्होंने कांग्रेस को सिर्फ अमेठी और रायबरेली ही दी है ताकि कांग्रेस का यूपी से पूरी तरह से सूपड़ा साफ़ न हो जाए और प्रतिष्ठा भी थोड़ी बहुत बची रहे.

(पारिजात त्रिपाठी)