महासंग्राम 2019 : नये साल की बड़ी चुनावी खबरें

Share on facebook
Share on twitter
Share on google
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

गुजरात में कांग्रेस का मिशन 50 फीसदी

तीन राज्यों के विधानसभा के चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस में मानो नई जान आ गई है। आत्म विश्वास से लबरेज कांग्रेस की नजर अब बीजेपी और मोदी के गढ़ गुजरात पर हैं. राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को विश्वास है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जीत के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। अपने इसी लक्ष्य को पाने के लिए कांग्रेस गुजरात में पूरी तरह से कमर कस चुकी है और नई तैयारियां और रणनीति के साथ आनेवाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने की तैयारी कर रही है।

इसके लिए कांग्रेस ने जमीनी स्तर पर काम करना भी शुरू कर दिया है। अपनी इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने गुजरात में मिशन 50 फीसदी के तहत 13 सीटों को लक्ष्य बनाया है। आणंद, अमरेली, बनासकांठा, साबरकांठा, पाटन, जूनागढ़, दाहोद, बारडोली, सुरेंद्रनगर, जामनगर, पोरबंदर, भरूच और मेहसाणा। ये वो सीटें हैं जहां कांग्रेस को जीत के आसार नजर आ रहे हैं.

मिशन 50 फीसदी के तहत इन 13 सीटों का चयन पिछले दो विधान सभा और 2 लोकसभा चुनाव के परिणामों के देखते हुए किया गया है. ये वो सीटें हैं जहां कांग्रेस को बाकी जगह से अच्छा समर्थन प्राप्त हुआ है या कांग्रेस की अच्छी पकड है। ये सीटें ज्यादातर ग्रामीण या आरक्षित इलाके में आती हैं। इसके लिए पार्टी ने जमीनी स्तर पर बूथ लेवल कमिटी के साथ काम शुरू कर दिया है और प्रतिबद्ध पार्टी कार्यकर्ताओं की खोज की जा रही है।

हर सीट पर एक गुजरात कांग्रेस सचिव को नियुक्त किया गया है जिसका कार्य है कि वो चुनावी रणनीति के तेहत कार्य करे और ज्यादा से ज्यादा कांग्रेल के कार्यकर्ताओं को इस मिशन 50 फीसदी से जोड़े। 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी हार से सबक लेते हुए कांग्रेस इस बार कोई कौर कसर छोड़ने के मूड में नहीं दिख रही है। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात की सभी 26 सीटों पर बीजेपी का परचम लहराया था वहीं कांग्रेस को एक सीट भी नहीं मिली थी।

अब देखना है कि राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस के लिए मिशन 50 फीसदी सत्ता की राह आसान करता है या मोदी का जादू इन 13 सीटों पर भी चलेगा।

किसान कर्ज माफी को लेकर मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक

हाल मे हुए मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को किसानों के कर्ज माफी के एलान का बड़ा फायदा पहुंचा. तीनों प्रदेशों में सरकार बनाने की खास वजह भी यही रही। 15 साल से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता पर काबिज रही बीजेपी पर कांग्रेस का ये दांव भारी पड़ गया. अब बीजेपी भी इसी राह पर चलने की तैयारी कर रही है, सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 करोड़ किसानों का चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज माफ करने का मन बना चुके हैं. माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में बहुत कम समय बचा हुआ हैं जिसके चलते ये घोषणा जल्द कर दी जाएगी।

मोदी सरकार का ऐसा कदम उठाने की दो वजह हैं. पहला वो देश भर में आए दिन हो रहे किसान आंदोलनों को शांत कर किसानों का बीजेपी सरकार के लिए आक्रोश खत्म करना चाहते हैं और दूसरा कांग्रेस को कर्ज माफी की रणनीति का फायदा नहीं उठाने देना चाहती है बल्कि इस रणनीति का लाभ सरकार खुद लेना चाह रही है. मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी लोकसभा चुनाव में ग्रामीण मतदाताओं को लुभा कर… जीत सुनिश्चित करने के लिए जल्द से जल्द किसान कर्ज माफी को लेकर ये बड़ा कदम उठाने वाली है. इसके लिए मोदी सरकार किसान कर्ज माफी के लिए धन के आवंटन की योजना पर काम करना शुरू कर दिया है.

मोदी सरकार के इस कदम से देश के तकरीबन 26 करोड़ 30 लाख किसानों को लाभ पहुंचेगा। सूत्रों के मुताबिक मोदी सरकार किसान कर्ज माफी के अलावा धान और गेहूं के न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य को बढ़ाने के साथ साथ दूसर लोक लुभावन योजनाएं की भी घोषणा कर सकती है. माना जा रहा है मोदी सरकार की ओर से दिए जाने वाली ये योजना अब तक की सबसे बड़ी कर्जमाफी योजना होगी। कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली पिछली गठबंधन सरकार ने 2008 में लगभग 7,20,000 (सात लाख बीस हजार करोड़) करोड़ रुपये के कर्ज माफी की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद 2009 में बड़े जनादेश के साथ यूपीए सरकार को सत्ता में लौटने में मदद मिली थी। उधर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इतनी बड़ी कर्ज माफी से देश का वित्तीय घाटा बढ़ेगा।

बिहार में कौन होगा बड़ा भाई?

2019 के लोकसभा चुनाव के लिए सभी क्षेत्रीय दलों ने भी कमर कस ली है. NDA और UPA अपनी सहयोगी क्षेत्रीय दलों के साथ चुनावी गणित में लगी हुई है, कहीं सीटों का बंटवारा हो चुका है तो कहीं मानने मनाने की कवायद जारी है. बिहार में कांग्रेस और आजेडी का मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ना लगभग तय है लेकिन जोड़ तोड़ से पहले आरजेडी ने बिहार में खुद को कांग्रेस का बड़ा भाई बता कर अपनी मंशा जाहिर कर दी है कि कांग्रेस ज्यादा की उम्मीद न करे।

वहीं कांग्रेस हाल में हुए पांच राज्यों विधान सभा चुनाव में तीन राज्यों में अपनी जीत के बाद आत्म विश्वास से भरी और बेहद उत्साहित नजर आ रही है. जाहिर है कि वो बिहार में अपनी शर्तों के साथ गठबंधन करने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों पर दबाव बनाएगी, आरजेडी के ऐसे तेवर और कांग्रेस बढती हुई महत्वाकांक्षा को देखते हुए लग रहा है कि कांग्रेस और आरजेडी का संभावित गठबंधन की राह आसान नहीं होगी। जहां कांग्रेस का मानना है कि सहयोगी पार्टियों के साथ गठबंधन कर के कांग्रेस बीजेपी को पटखनी दे सकती है तो वहीं आरजेडी ड्राइविंग सीट पर बैठने का ख्वाब देख रही है।

आरजेडी की बिहार में किंग मेकर की भूमिका निभाने की मंशा तब सामने आ गई जब आरजेडी के नेता और विधायक और प्रवक्ता भाई वीरेंद्र ने कहा कि बिहार में आरजेडी बड़ी पार्टी है, इस कारण यहां आरजेडी ही बड़े भाई की भूमिका में रहेगी। चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस के हावी होने के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘यहां आरजेडी पर कांग्रेस हावी नहीं हो सकती है। बड़े भाई के सामने कोई बोलता है क्या?’ आरजेडी नेता का गठबंधन के पहले ऐसे बयान आने से लग रहा है कि कांग्रेस को गठबंधन के पहले अच्छी तरह होमवर्क करना होगा.

आपको बता दें कि इस से पहले पाच राज्यों के विधान सभा चुनाव के परिणाम के एक दिन पहले ही दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक हुई थी। इस बैठक में आरजेडी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इशारों ही इशारों में अपने बड़े जनाधार का दावा ठोकते हुए क्षेत्रीय दलों को उचित प्रतिनिधित्व देने की बात रखी थी। हालांकि अभी इन बयानों और बढ़े हुए आत्मविश्वास से गठबंधन को लेकर कोई नतीजा निकलेगा ये तय नहीं है. लेकिन बिहार आरजेडी की कर्म भूमि रही है और प्रदेश में कांग्रेस से ज्यादा आरजेडी का जनाधार है जाहिर है कि उनका दावा ज्यादा पुख्ता माना जाएगा लेकिन तीन राज्यों में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस को जो ऑक्सीजन मिली है वो उसका बखूबी इस्तेमाल करना चाहती हैं गठबंधन की शर्तों में ज्यादा समझौते के मूड में नजर नहीं आ रही है। हालांकि अभी कोई भी कयास लगाए जाए, कोई भी अपने दावे को मजबूत कहे तस्वीर आरजेडी सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव के फैसले के बाद ही साफ होगी.

शिवपाल थामेंगे कांग्रेस का हाथ

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी ने भले ही कांग्रेस से किनारा कर लिया हो और गठबंधन में कांग्रेस को कई जगह नहीं दी हो लेकिन कांग्रेस अकेले रह गई हो ऐसा कहना सही नही होगा, कांग्रेस का हाथ थामने के लिए प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के अध्यक्ष और पूर्व सपा नेता शिवपाल सिंह यादव तैयार हैं. उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता शिवपाल का कहना है कि बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में हराने के लिए उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकती है.

शिवपाल ने कहा कि हालांकि उनकी पार्टी सभी 75 जिलों में अपने उम्मीदवार खड़ा करने के लिए तैयार है लेकिन बीजेपी को हराने के लिए जो लोग मोर्चा बनाना चाहते हैं तो हम उनके साथ हैं. शिवपाल यादव का मानना है कि बिना उनकी पार्टी का सहयोग लिए बीजेपी को हराना संभव नहीं हैं। शिवपाल के इस आमंत्रण के पीछे की वजह यही है कि उनकी पार्टी पहला चुनाव लड़ने जा रही है ऐसी स्थिति में प्रदेश में अपना कद बड़ा करने के लिए वो कांग्रेस को गठबंधन के लिए दावत दे रही है, वहीं कांग्रेस एसपी और बीएसपी से दरकिनार हो कर शिवपाल का हाथ थामने के मूड में नजर भी नहीं आ रही है.

कांग्रेस की ओर से अभी इस आमंत्रण को लेकर कोई जवाब नहीं आया और आगे आने की संभावना भी नहीं लग रही है लेकिन सत्ता के मिजाज़ के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है, कई बार देखा गया है कि राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए दो कट्टर प्रतिद्वंदी एक हो जाते हैं और कमजोर भी सहयोगी बन जाता है, चुनाव के पहले भले ही दोनों के बीच कोई गठबंधन न हो लेकिन चुनाव के बाद एक न हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है.

चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट

2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रवैया अपना रही है, दागी नेताओं के लिए इस बार चुनाव जीतने की राह आसान नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव को लेकर दागी नेताओं के लेकर दिशानिर्देश जारी किए हैं जिसे चुनाव आयोग सख्ती से पालन करने जा रहा है… इसके लिए केंद्रीय चुनाव आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों दिशा निर्देश जारी किए हैं. सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश के अनुसार चुनाव लड़ने वाले दागी उम्मीदवार को अपने आपराधिक रेकॉर्ड टीवी चैनल और अखबारों के माध्यम से मतदाताओं को बताने होंगे.

उन्हें सभी लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा बड़े अक्षरों में अखबारों में छपवाना होगा. टीवी चैनलों में भी ऐसी जानकारी विस्तार से देनी होगी. यही नहीं ऐसे नेताओं को टिकट देने के लिए राजनीतिक दलों को दलों को भी इस बारे में अपनी वेबसाइट पर विस्तार से बताना होगा। दागी उम्मीदवारों को ये हलफनामा चुनाव के एक माह के भीतर चुनाव आयोग को देना जरूरी होगा. चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का पालन इस लोकसभा चुनाव में सख्ती से करना चाहता है.

इसके पीछे मकसद यही है कि दागी उम्मीदवार राजनीति से दूर रहें. आपको बता दें कि इससे पहले आपराधिक रेकॉर्ड वाले उम्मीदवार चुनाव आयोग को शपथपत्र दे कर काम चला लेते थे जिस से कि जनता को उनके आपराधिक प़ृष्ठभूमि की जानकारी नही होती थी. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऐसे उम्मीदवारों की दागी छवि मतदाताओं के सामने आना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के इस दिशा निर्देश के बाद दागी उम्मीदवारों के साथ साथ उन राजनीतिक पार्टियों पर भी अंकुश लगेगा जो इस तरह के उम्मीदवारों को पार्टी से टिकट देते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा निर्देशों के बाद दागी उम्मीदवारों की राह कठिन नजर आ रही है, वही ऐसी राजनीतिक पार्टियां जो ऐसे उम्मदीवारों को ज्यादा तवज्जों देती रही हैं उनको भी 2019 के लोकसभा चुनाव में फूंक फूक कर कदम रखने की जरूरत पड़ेगी.

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऐसे उम्मीदवारों की दागी छवि मतदाताओं के सामने आना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के इस दिशा निर्देश के बाद दागी उम्मीदवारों के साथ साथ उन राजनीतिक पार्टियों पर भी अंकुश लगेगा जो इस तरह के उम्मीदवारों को पार्टी से टिकट देते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा निर्देशों के बाद दागी उम्मीदवारों की राह कठिन नजर आ रही है, वही ऐसी राजनीतिक पार्टियां जो ऐसे उम्मदीवारों को ज्यादा तवज्जों देती रही हैं उनको भी 2019 के लोकसभा चुनाव में फूंक फूक कर कदम रखने की जरूरत पड़ेगी.

ट्रेंडिंग

काम की खबरें

देश

विदेश

मनोरंजन

राजनीति