महिला दिवस की उत्सवधर्मिता मायूस करती है

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किये जाने के उद्देश्य न जाने कितनी फाइलों में दबे पड़े होंगे और इस दिवस को आधुनिक पढ़ी-लिखी ,सजग,सक्षम,सबला, नारियों ने बड़ी कुटिलता से उत्सवधर्मिता का स्वरूप दे दिया..

महिला दिवस के अवसर पर कुछ पुरुषों ने इन सशक्त धारदार महिलाओं को प्रोत्साहित,सम्मानित,कर महिलाओं के प्रति अपनी कर्तव्यनिष्ठा प्रमाणित करने की चाटुकारिता करके खुद को कद्रदानों की शीर्ष श्रेणी में खड़ा करने का खूबसूरत प्रयत्न भी किया । कई वर्षों से कुछ ऐसा ही हो रहा है और पिछले पांच वर्षों में ये उत्सवधर्मिता शहरी आबादी में कुछ अलग ही जोश ,जागरूकता,आत्माभिमान की अलख जगा रही है।

मन जानने को बेचैन था कि इस बार किस तरह का आयोजन होगा और इंतज़ार था कि हो सकता है कोई ऐसी ख़बर, पोस्ट,या कार्यक्रम की झलकी देखने को मिले जिससे मुझे महसूस हो कि आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता दिख रही है.. लेकिन ये क्या.. महिलाएं जश्न में डूबी ,तोहफों ,फूलों,नृत्य,संगीत,रैम्पवॉक,पर थिरकती हुई , माइक पर खुद को सबला, सशक्त,स्वावलम्बी होने की संघर्षहीन सुखद सफलता की कहानियों से अन्य सशक्त महिलाओं को प्रेरित करते हुए तालियों की गूंज में आत्ममुग्धता की बेड़ियों में कैद करती और खुश होती महिलाओं को देखकर जी भर आया.. दूसरी तरफ पुरुष भारी मन से अपने अस्तित्व को तलाशते हुए बधाइयां देते हुए मुस्कुराने की नाकाम कोशिशों में भी मुस्कुराते हुए मिला।

ये कैसा एहसास है जो स्त्री को स्त्री होने और पुरुष को पुरुष होने के द्वंद में पूर्ण शक्ति को परिभाषित करती अर्धनारीश्वर की परिकल्पना से परे, खुद को विभाजित कर सशक्तिकरण की थाप पर नृत्य करने की अकुलाहट लिए एक दूसरे पर अट्टहास कर रहा है।

“क्या स्त्री होने का एहसास पुरूष की अनुपस्थिति से है या पुरुष होने का एहसास स्त्री की अनुपस्थिति से? हमारी शक्ति, हमारी वेदना, हमारी खुशी ,हमारी स्वतंत्रता ,हमारी बेड़ियाँ, हमारी सफलता और असफलता , हर एहसास में हर परिस्थिति में एक दूसरे(स्त्री व पुरूष)का सहयोग और असहयोग ही जिम्मेदार है। यानी एक दूसरे के बिना सफलता -असफलता, स्वतंत्रता-दासता, सुख-दुख, सृजन-विनाश , इन सबके कोई मायने ही नहीं हैं। सब छोड़िए हमारे सुंदर होने ,दिखने, दिखाने के प्रयास एक दूसरे के लिए हैं.. इस होड़ में दुनिया बौराई हुई है ..

जब इस सृष्टि की रचना में हम एक दूसरे के बिना न तो पूर्ण हैं ,न सशक्त, न ही हमारे वजूद का अन्य विकल्प .. तो फिर क्यों नहीं सहजता से इस सच को स्वीकार लेते और एक दूसरे को एक दूसरे के नज़रिए से जानने ,समझने, और पहचानने के प्रयास करते हुए नैसर्गिक स्वावलम्बन की परिकल्पना को खूबसूरती से समायोजित कर,नया उदाहरण प्रस्तुत करने के साझा प्रयास करें।
और इन्हीं प्रयासों को संस्कृति, संस्कार में डाल दें तो शायद ही किसी की चीखों, आंसुओं और वेदनाओं के सैलाब से किसी विनाश की संघर्षशील सफलता की कहानी हमें प्रेरित करने के लिए सुनने मात्र को मिले।

कुछ पुरुषों ने इन सशक्त धारदार महिलाओं को प्रोत्साहित,सम्मानित,कर महिलाओं के प्रति अपनी कर्तव्यनिष्ठा प्रमाणित करने की चाटुकारिता करके खुद को कद्रदानों की शीर्ष श्रेणी में खड़ा करने का खूबसूरत प्रयत्न भी किया । कई वर्षों से कुछ ऐसा ही हो रहा है और पिछले पांच वर्षों में ये उत्सवधर्मिता शहरी आबादी में कुछ अलग ही जोश ,जागरूकता,आत्माभिमान की अलख जगा रही है।..

पीपल की घनी छाँव बनने में वक़्त लगता है,
जटाओं में भी झूलें खुशियां,
इस क़दर सशक्त होने में वक़्त लगता है।
हम वो हरसिंगार नहीं जो,
रात अकेले में सुगन्धित सिंगार करे,
नई किरण के उगते ही झर जाए ।

(शालिनी सिंह)

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