#MeToo की पहली कहानी- ऐसे शुरू हुआ MeToo कैम्पेन

Share on facebook
Share on twitter
Share on google
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

मी टू. आज गूँज रहा है ये शब्द दुनिया भर में. और इसकी गूँज कई लोगों के दिलों की धड़कनें बढ़ा रही है और कइयों के चेहरे पर मुस्कान की वजह भी बन रही है. क्या है ‘मी टू’. जो नहीं जानते उनके लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक है. जैसा कि ज़ाहिर है, ‘मी टू’ का शाब्दिक अर्थ है मैं भी. लेकिन ‘मी टू’ अपने इस अर्थ से आगे बढ़ कर अब एक अभियान में बदल चुका है और यह अभियान कोई मामूली अभियान नहीं, वैश्वक अभियान बन कर आज दुनिया भर में फैल गया है.

‘मी टू’ का अपने अभियान में मूल अर्थ है कि मैं भी हुई हूँ शिकार..ज़ोर जबरदस्ती की. न सिर्फ ज़ोर जबरदस्ती बल्कि अगर जोर जबरदस्ती की सिर्फ कोशिश भी हुई है तो यह यौन शोषण का मामला बनता है. और यही है ‘मी टू’ अभियान याने कि यौन शोषण के खुलासे का अभियान. ‘मी टू’ अभियान शुरू हुआ अमेरिका से जो चल कर अब भारत पहुँच चुका है. आइये बताते हैं आपको वह पहली कहानी जिसने जन्म दिया ‘मी टू’ को.

 

छह साल की एक नन्ही सी बच्ची थी. प्यारी सी मासूम. अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर रहने वाली इस अश्वेत बच्ची को मोहल्ले में सभी प्यार करते थे. एक दिन किसी वजह से उसे पड़ौस में रहने वाले एक व्यक्ति के घर जाना पड़ा और तब उस पड़ौसी जिसके घर के सभी लोग बाहर गए हुए थे ने अपनी बुरी नज़र इस बच्ची पर डाली. और दरवाजे पर खड़ी बच्ची को घर के अंदर खींच लिया. वो बच्ची कुछ समझ पाती उसके पहले ही दरवाजे अंदर से बंद हो चुके थे. इसके बाद हैवानियत का मंज़र देखा उस घर की दीवारों ने. एक रोती बिलखती बच्ची के साथ हुए यौन शोषण ने उस बच्ची के शरीर को तार तार कर दिया. लेकिन बहादुर बच्ची ने अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई जीत ली और महीने भर बाद वह फिर से ज़िन्दगी के घर वापस आ गई. और इस नन्ही बच्ची को न चाहते हुए भी उस दर्द के साथ जीना पड़ रहा था.

औऱ फिर ठीक दस साल बाद उसके साथ वही हुआ जिसे वह भुला देना चाहती थी. सोलह साल की इस लड़की के साथ फिर बलात्कार हुआ. इस बार उसका बलात्कार करने वाला कोई पड़ैसी नहीं था बल्कि उसका अपना एक दोस्त था जिसने दोस्ती का फायदा उठा कर उसकी अस्मिता को रौंद डाला था.

लेकिन इस बार इस घटना को इस लड़की ने नहीं भुलाया और आगे चल कर साल 2006 में उसने सारी दुनिया को चीख चीख कर बताया कि वह शारीरिक शोषण का शिकार हुई है और ऐसा उसके साथ एक बार नहीं दो दो बार हुआ है. इस अश्वेत महिला का नाम है टराना बर्क.  न्यूयॉर्क के ब्रॉंक्स में रहने वाली टराना बर्क आज पैंतालीस साल की हैं. 2006 में ही उन्होंने मी टू अभियान की शुरुआत की और इस सिलसिले में उन्होंने एक संस्था भी बनाई है – गर्ल्स फॉर जेंडर एक्विटी. आज यह ‘मी टू’ की गूँज जो हम सारी दुनिया में देख रहे हैं और इसका श्रेय जाता है टराना बर्क की सराहनीय पहल को. और टराना के हैशटैग ‘मी टू’ ने आज दुनिया भर के यौन उत्पीड़कों की जान सांसत में डाल दी है.

(पारिजात त्रिपाठी)

ट्रेंडिंग

काम की खबरें

देश

विदेश

मनोरंजन

राजनीति