यूपी की सियासत में आए शिवपाल के ‘अच्छे दिन’, योगी से मिला मायावती का बंगला तो मुलायम से मिला मोर्चे के लिए आशीर्वाद

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यूपी की सियासत में उठापटक का दौर जारी है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ये कयास मुश्किल हैं कि गठबंधन का ऊंट किस करवट बैठेगा. लेकिन बदलते समीकरणों से राजनीतिक दलों की आपसी नजदीकी दिखाई देने लगी है. समाजवादी पार्टी में खुद को अपमानित और उपेक्षित महसूस करने वाले शिवपाल यादव के शायद यूपी पॉलिटिक्स में अच्छे दिनों की शुरुआत हो गई है. समाजवादी सेकुलर मोर्चा का गठन करने के बाद जहां पहली दफे उनके साथ मुलायम सिंह ने मंच साझा किया तो वहीं यूपी की योगी सरकार ने भी शिवपाल को बंगला देकर सियासी सम्मान जताया.
खासबात ये है कि शिवपाल को यूपी की पूर्व सीएम मायावती का बंगला दिया गया है. मायावती इस बंगले को छोड़ने के मूड में नहीं थीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बंगला खाली करना पड़ गया. मायावती इस बंगले को कांशीराम के स्मारक के तौर पर बनाए रखना चाहती थीं. लेकिन अब शिवपाल के नाम ये बंगला अलॉट हो गया है.

इतने बड़े बंगले को हासिल करने के बाद शिवपाल की अपनी सफाई भी साथ है. वो जानते हैं कि सवाल उठेंगे. शिवपाल का कहना है कि वो पांच बार से विधायक रहे हैं. उन्हें अपने लंबे राजनीतिक करियर और विरोधियों की वजह से सुरक्षा के चलते एक अदद बंगले की जरूरत थी. ऐसे में उनकी जरूरत को योगी सरकार ने तुरंत समझा और राज्य संपत्ति विभाग ने मायावती का बंगला शिवपाल के नाम कर दिया.
सवाल ये है कि इस बंगले के बदले क्या साल 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव बीजेपी की मनोकामना समझेंगे?
दरअसल, शिवपाल यादव के समाजवादी पार्टी से अलग हो कर समाजवादी सेकुलर मोर्चा बनाने से जितना फायदा बीजेपी को नहीं होगा उससे ज्यादा नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा. शिवपाल ने अपने मोर्चे की बुनियाद ही उन नेताओं के दम पर रखी है जिन्होंने समाजवादी पार्टी में लंबा वक्त गुजारा. लेकिन उपेक्षा के चलते पार्टी छोड़ने को मजबूर हो गए. समाजवादी पार्टी के बागी, वरिष्ठ और शिवपाल के करीबियों से बना समाजावादी सेकुलर मोर्चा दरअसल समाजवादी पार्टी की बी टीम है. मुस्लिम-यादव समीकरणों पर आधारित ये सेकुलर मोर्चा बीजेपी के पक्ष में साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़ी भूमिका निभा सकता है.

दरअसल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के यूपी में गठबंधन ने बीजेपी की बढ़ती ताकत पर ब्रेक लगाने का काम किया है. बुआ-भतीजे के गठबंधन की वजह से ही बीजेपी को गोरखपुर, कैराना, नूरपुर जैसी सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा. अब इसी फॉर्मूले के तहत एसपी-बीएसपी साल 2019 को लेकर बीजेपी के खिलाफ ताल ठोंक रही हैं. इस संभावित गठबंधन को अभी से अपनी जोड़ी पर इतना भरोसा है कि वो कांग्रेस को भी यूपी में भाव नहीं दे रहे हैं. ऐसे में दलित, ओबीसी और मुस्लिम वोटर को देखते हुए एसपी-बीएसपी के गठबंधन में सेंध लगाने के लिए एक तीसरी पार्टी की सख्त जरूरत है ताकि वोटों का बंटवारा हो सकें. ऐसे में शिवपाल यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चे का उम्मीदवार अगर न भी जीते तो वो कम से कम एसपी और बीएसपी के उम्मीदवार को जीतने भी नहीं देगा. ऐसे में ‘लोहा लोहे को काटता है’ कि तर्ज पर शिवपाल अपने नए मोर्चे के साथ तैयार हैं. अब तो उन्हें बड़े भाई मुलायम सिंह यादव का भी आशीर्वाद मिल गया है. तभी शिवपाल का भीतर से शुक्रिया अदा करते हुए योगी सरकार ने बंगला देकर यूपी की बदलती राजनीति में उनका स्वागत किया है.

(भुवन भट्ट)

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