राजस्थान के चुनावी अखाड़े में असली पहलवान

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रानी के राजस्थान में चुनाव को लेकर भागादौड़ी जारी है. पार्टियों के टिकट देने वालों से ज्यादा तेज भाग रहे हैं टिकट लेने वाले. चुनाव का समय ही एक ऐसा समय होता है जब आप नेताओं को देख सकते हैं. न केवल आप नेताओं को सामने देख सकते हैं बल्कि उनको दौड़ते भागते हुए भी देख सकते हैं. यह समय होता है जब नेताओं के चेहरे पर आपको देखते ही मुस्कान आ जाती है और वे आपका स्वागत करने के शब्दों की कंजूसी जरा भी नहीं करते.

आजकल राजस्थान का चुनाव परिदृश्य अप्रत्यक्ष रूप से अखाड़ा बना हुआ है किन्तु इसमे प्रत्यक्ष तौर पर अखाड़े के लोग नजर आ रहे हैं. पहलवानों की बाढ़ सी आई लगती है सड़कों पर. या ऐसे कहें कि आजकल राजस्थान में पहलवानों की चांदी हो गई है. क्योंकि नेताओं को अब उनकी जरूरत दूसरी तरह से महसूस हो रही है. अब पहलवान डराने के काम से ज्यादा दिखाने के काम आ रहे हैं.

दरअसल इस बार चुनाव प्रचार में एक अलग किस्म के दिखावे की शैली देखी जा रही है. नेता लोग अपने पीछे डोले दिखाने वाले पहलवानो को इस्तेमाल कर रहे हैं. और नेताओं के पीछे खड़े हो कर अपनी सुडौल देह-यष्टि दिखाने वाले पहलवान नेताओं के बड़े काम आ रहे हैं. इसके एवज में नेताओं द्वारा इन पहलवालनों को भारी रकम का भुगतान किया जा रहा है.

ये दो तीन महीनों के दौरान पहलवानों की पूछ बढ़ गई, लगती है और नेताओं के समर्थक ऐसे पहलवानों को अपने यहां काम पर लगाने में जुट गए हैं. ये पहलवान शायद जनता के दिल के ज्यादा करीब हैं. इनको दुहरा काम दिया गया है. एक तरफ इन्हें अपने नेता जी के पक्ष में वोटरों को रिझाने की जिम्मेदारी सम्हालनी है वहीं उन्हें नेताजी की रैली आदि के दौरान जरूरी सुरक्षा भी मुहैया करानी है.

(सुस्मिता कजरी)

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