राज-रानी जीत भी सकती हैं

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राजस्थान में हालात ने करवट बदली है..अब यहाँ कांग्रेस को करवत कासी मिल सकती है..

राजस्थान के चुनाव में मोड़ लगातार नज़र आ रहे हैं. कई कारण ऐसे सामने आ रहे हैं जो बता रहे हैं कि गणित उलटी भी हो सकती है. गणित उलटी होने का अर्थ है राजकुमार नहीं रानी जीत सकती है.

अभी तक ऊपरी तौर पर यही माना जा रहा था कि इस चुनाव के साथ भाजपा-राज प्रदेश से पांच साल के लिए विदा लेगा. एंटी इंकम्बेंसी तो है ही वैसे भी यहां के वोटर को हर बार पिछला दुहराने की आदत नहीं है. चुनाव विश्लेषक और राजनीति विशेषज्ञ सीधे-सीधे रानी की राजसत्ता के पराभव की आकाशवाणी कर रहे थे किन्तु अभी अचानक आसमानी हवा की बयार बदल सी गई है. 

कांग्रेस के टिकट बंटवारे में भारी गड़बड़ियां हुई हैं जो उसके लिए मुश्किलात खड़ी करेंगी. भाजपा ने कमर कस ली और कसम भी खा ली कि जीत हासिल करके रहेंगे. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राजस्थान में परमानेंट डेरा डाल लिया. मोदी ने तय से अधिक जनसभाएं करने का संकल्प कर लिया. मोदी की जनसभाओं को जनता ने समर्थन भी पूरा दिया है. योगी आदित्यनाथ मोदी की तरह ही स्टार कैम्पेनर के रूप में उभर कर सामने आये हैं. नाथ सम्प्रदाय से उनको भरपूर सहयोग प्राप्त हो रहा है. उनकी रैलियां भी अधिकतर नाथ सम्प्रदाय और मुस्लिम सम्प्रदाय के इलाकों में हो रही हैं. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपनी गतिविधियां अधिक से अधिकतम के स्तर पर पहुंचा दीं. बीजेपी ने कमल और दिए का अभियान भी शुरू है. केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों को लक्ष्य बनाया गया है. और उनसे उम्मीद भी पूरी है. बीजेपी कार्यकर्ता इन लाभार्थियों के द्वार पर जाकर दिए जलाएंगे और उनसे वोट का आग्रह करेंगे. पार्टी ने टिकट भी इस बार काफी सावधानी और समझदारी से दिए हैं जो उसकी जीत को सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेंगे.

उधर कांग्रेस में आपसी खींचतान भी बड़ा अंदरूनी नुकसान कर सकती है. अशोक गहलौत और सचिन पायलट दोनों ही अस्सी से ऊपर रैलियां कर चुके हैं पर जनता अभी तक समझ नहीं पाई है कि कांग्रेस को जिताया तो उनका मुख्यमंत्री कौन होगा. सीएम का चेहरा साफ़ कर देना फायदेमंद साबित हो सकता था कांग्रेस के लिए लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

जहां मोदी और शाह धड़ाधड़ जनसभाएं कर रहे हैं वहीं राहुल ने इस महीने राजस्थान में तीन ही जनसभाएं की हैं. प्रदेश चुनाव को लेकर युवराज की यह गंभीरता दर्शनीय है. कांग्रेस मात्र राजपूतों की रानी से नाराज़गी और किसानों के क़र्ज़ की माफ़ी के मुद्दे को भुना कर जीत पक्की करना चाहती है. दोनों ही मुद्दे ठीक हैं पर उनकी परिधि क्या वास्तव में उतनी है जो वसुन्धरा को विजयश्री हासिल करने से रोक सके?

(पारिजात त्रिपाठी)

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