लगता है सभी जज अदालतों में चुनाव नतीजों की प्रतीक्षा में हैं

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हर मुकदमें में देखिये तो ऐसा ही लगता है कि जैसे सारे जज 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों की प्रतीक्षा कर रहे हैं..

जैसे कमलनाथ ने मुसलमानों से विधानसभा चुनाव से पहले कहा कि बस चुनाव तक सहन कर लो उसके बाद हम उन्हें (हिन्दुओं को) सम्हाल लेंगे –वैसे ही लगता है, कांग्रेस ने जजों को आश्वस्त किया हुआ है कि बस 2019 तक हमारे नेताओं की गिरफ़्तारी रोके रखो –अगर हम जीत गए तो तुम्हारे वारे न्यारे कर देंगे.

यही कारण है कोई अदालत किसी कांग्रेस के किसी भी नेता को गिरफ्तार नहीं होने दे रही है. चिदम्बरम और उनके बेटे की 10 महीने से अदालतें गिरफ़्तारी रोक रही हैं –कार्ति एक बार गिरफ्तार हुआ और तभी उसने धमकी दे दी थी प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के अधिकारियों को कि मेरे पिता के सरकार में आते ही मैं तुम्हे देख लूंगा.

चिदंबरम की बीवी नलिनी चिदंबरम पर FIR दर्ज हुई कोलकाता में और अग्रिम जमानत दे दी मद्रास हाई कोर्ट ने –उसके बाद कोलकाता कोर्ट ने जमानत दे दी.

शशि थरूर पर FIR दर्ज हुई सुनंदा पुष्कर की हत्या में लेकिन गिरफ़्तारी पर रोक साथ साथ लग गई जबकि पत्नी की हत्या के मामले में सबसे पहले पति पर शक करके उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाता है लेकिन थरूर से 4 साल में कभी पूछताछ भी नहीं हुई.

अब सबसे नया मामला जीजा जी, रोबर्ट वाढरा का है –उसे कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश होने के लिए तो आदेश दिया मगर गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी और हर बार रोक बढ़ाई जा रही है.

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अयोध्या मामले की सुनवाई 2019 चुनाव के बाद होनी चाहिए और अदालत हालात ऐसे बनाती गई कि जैसे सिब्बल का हुकुम बजाया गया हो –अब सुनवाई चुनाव के बाद ही होगी. मध्यस्थता के लिए एक महीने का समय दिया गया है –अगर एक महीने में मध्यस्थों ने फैसला दे भी दिया तो बीच चुनाव में अदालत कुछ नहीं करेगी.

मगर सिब्बल की अधिकारियों को खुली धमकी सुनाई नहीं दे रही कि हमारी सरकार बनेगी तो सबकी जवाबदेही तय की जाएगी –ऐसी धमकी आनंद शर्मा ने भी दी है.

राजनेताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार एक साल में हो जाना चाहिए –लेकिन माँ-बेटे पर डॉ स्वामी के हेराल्ड केस में फैसला होने के अभी कोई आसार नहीं हैं -तारीख पड़ती है तो एक महीने से कम नहीं पड़ती –राहुल पर संघ की मानहानि का केस भी पता नहीं कहाँ है –फैसला हो तो उनके चुनाव लड़ने पर भी फैसला हो – मगर सुप्रीम कोर्ट तो आदेश दे कर खामोश हो गया –कोई निगरानी तो है नहीं – तो ट्रायल कोर्ट्स क्यों परवाह करेंगे.

लेकिन अदालतें अगर कांग्रेस नेताओं के दबाब में उन्हें बचा रही हैं तो उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि अगर कांग्रेस सत्ता में ना आई तो क्या होगा -अगर कांग्रेस उन्हें लड्डू बाँट सकती है तो गैर कांग्रेस सरकार क्या उल्टा  नहीं कर सकती है ? और वह कांग्रेस से सांठगांठ की क्या गहन जांच नहीं करा सकती ? मोदी की ईमानदारी का नाज़ायज़ फायदा उठा रहे है कांग्रेस के  लोग अदालतों से मिल कर !

(सुभाष चन्द्र) 
09/03/201

——————————————————————————————————————-(न्यूज़ इंडिया ग्लोबल पर प्रस्तुत प्रत्येक विचार उसके प्रस्तुतकर्ता का है और इस मंच पर लिखे गए प्रत्येक लेख का उत्तरदायित्व मात्र उसके लेखक का है. मंच हमारा है किन्तु विचार सबकेहैं.)                                                                                                                               ——————————————————————————————————————

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