विश्व रेडियो दिवस और मेरा पहला प्यार

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यूं तो बचपन से ही रेडियो घर में था ,लेकिन रेडियो से दोस्ती हुई उस वक़्त जब सिविल सर्विसेज की तैयारी में रातभर पढ़ना होता था । अपनी ही मेहनत के पैसों से एक प्यारा सा रेडियो खरीदकर लाई थी जो सिर्फ मेरा था मेरी टेबल पर उसका एक कोना ही उसका आशियाना बना । रात भर कभी किताबों से कभी रेडियो से बातें होतीं। कुछ गीत जो दिल में बस गए एक प्रेरक गीत की तरह जिनकी पंक्तियां मोटिवेशनल सपोर्ट करती थीं उस हर वक़्त में जब अभावों में संघर्ष करना पड़ता……

जिंदगी एक सफ़र है सुहाना… चांद तारों से चलना है आगे और जिंदगी का सफर है ये कैसा सफ़र ……ये दोनों ही गीत मन के अनसुलझे सवाल और जवाब बनकर बजते रहते…..घर वालों के शादी को लेकर तमाम दबावों के चलते सिविल सर्विसेज की तैयारी तो सिसकियां लेने लगी लेकिन किताबों और रेडियो से इश्क हक चुका था । तमाम जिम्मेदारियों में किताबों से भी दूरियां हुईं लेकिन रेडियो ने मेरी मोहब्बत को दिल की गहराइयों से स्वीकार लिया था तभी तो ससुराल ,रसोई ,घर ,बाहर ,गाड़ी हर जगह रेडियो मिलता गया मुझे और कहता कि तेरा मेरा प्यार अमर फिर क्यूं तुझको लगता है डर ……

एक दिन ऐसा भी आ गया जब रेडियो और मेरे प्यार को स्वीकृति मिल गई और मुझे रेडियो एंकर के रूप में चुन लिया गया। अब रेडियो और मैं एक दूसरे की आवाज़ बनकर साथ गुनगुनाने लगे थे ।हमारे प्यार का एक नया सफ़र शुरू हुआ जिसमें ज़िन्दगी में तमाम नए रिश्ते जुड़ते गए और इन्हीं रिश्तों के ताने बाने में एहसासों के सफ़र पर चलते चलते पूरी दुनिया ही बसा ली मन में । इस खूबसूरत दुनियां में बहुत कुछ सीखा जो जीवन जीने के लिए ज़रूरी होता है और रेडियो से मेरा रिश्ता गहराता ही चला जा रहा है।

आकाशवाणी के स्टूडियो से गहन होता रिश्ता कई मायनों में ख़ास है क्योंकि इन्हीं दीवारों और साउंडप्रूफ कमरों में रहकर सीखा की मन के भीतर की सिसकियों को बाहर मत जाने देना ,बाहर सिर्फ चटख,चहकती, सुरीली आवाज़ें ही छनकर जा सकती हैं क्योंकि यहां आवाज़ के जादूगरों का बसेरा है। यहीं पर सीखा एक बन्द कमरे में ख़ुद से बातें करना ,ख़ुद को ख़ुद की पसन्द का गीत सुनाना और अपने ख्वाबों में अनदेखे अनजाने तमाम दोस्तों को हर बार एक काल्पनिक सफर पर ले जाना ।अनदेखे अनजाने दोस्तों के दिलों में ख़ास जगह बनाना उनका प्यार पाना । सिर्फ आवाज़ों और गीतों के सहारे  तमाम लोगों से जुड़ जाना  ।

किताबी बातों सा लगता है ये सब, लेकिन सच कहूँ तो ये काल्पनिक  दुनिया ही स्टूडियो के बंद कमरों में   स्क्रिप्ट ,माइक और हमारे साथ कब वास्तविक होती जाती है पता नहीं चल पाता। 

अनदेखे,अनजाने  लोगों का  हमसे जुड़ना और हमारा उनसे ,साथ में उनके पत्रों का आना जाना पत्रों में फरमाइश , शिकायत, रूठना , और  हमारे द्वारा उनकी फरमाइश के  गीत बजाकर  उन्हें मनाना  । ऐसा निःस्वार्थ   ताना- बाना  जो  सिसकती आवाज़ों को खनकती आवाज़ में तब्दील कर दे कोई और है क्या?????

   कोई और है जो करे बचपन की ठिठोली बालजगत में, महिलाओं को  गृहलक्ष्मी का गुण बतलाये, युवाओं को राह दिखाती युववाणी, श्रम की परिभाषा श्रमिक जगत में, गांवो की चर्चा हो खेती किसानी लोकयन में ,वृद्धजनों की बात जहां हो कल्पतरु की छाया सी। 

यही तो है आकाशवाणी ,यही तो है मेरी रेडियो ज़िन्दगी और मेरा सूफियाना से सच्चा इश्क़ । वेलेंटाइन सप्ताह के आख़िरी पड़ाव यानी प्रेम दिवस पर सब लोग मेरे लिए दुआ करना कि मेरा ये इश्क़ बरकरार रहे और मेरे इश्क़ की रुमानियत महसूस हो हर किसी को  ,जब तक रहूं रेडियो और मैं एक दूसरे की धड़कन बनकर धड़कते रहें करोड़ों दिलों में इश्क की आवाज़ बनकर ।

(शालिनी सिंह)

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