सम्भोग से ज्यादा सुखद अहसास मौजूद है

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दोस्तों संभोग ऐसी क्रिया है जिसका आंकलन हम सभी ने जरूरत से ज्यादा करके रखा हुआ है।संभोग का उद्देश्य प्रजनन मात्र है,प्रजनन क्रिया सहजता से हो जाये इसी हेतु संभोग प्रक्रिया सुखद है।यदि संभोग क्रिया में हमें कोई सुखद अनुभव नहीं बल्कि कष्टकारक अनुभव होता तो हो सकता है पृथ्वी में जीवन आगे ही नहीं बढ़ता।

पर यहाँ प्रश्न यह है कि क्या ऐसी क्रियाएं भी हैं जो सम्भोग से भी बेहतर अहसास प्रदान करती हैं? जी हाँ संसार तो असीमित सम्भावनाओं से भरा हुआ है,असाधारण और असीमित आनंद इसमें समाया हुआ है ,संभोग तो मात्र क्षणिक सुख देता है।चलिये इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें बहुत ज्यादा भटकने की जरूरत नहीं है,हमें बस अपनी ही सभ्यता में झांकने की जरूरत है।

आजकल पश्चिमी वैज्ञानिकों के लिए योग,ध्यान(meditation) एक बड़ी कौतुहूलता का विषय बना हुआ है।

क्या कारण है कि विदेशों में अलग अलग शिक्षण संस्थानों में लोग मैडिटेशन के पाठ्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं?क्या वजह है कि हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड जैसे बड़े-बड़े विश्विद्यालयों में भी सम्बंधित पाठ्यक्रम मौजूद हैं।क्या कारण है ध्यान अथवा मैडिटेशन में वर्षों से चल रहे रिसर्च कार्यों का?

दोस्तों बात यह है कि हम सभी अपने प्रश्नों का उत्तर ढूंढते वक्त अपनी सभ्यताओं और शास्त्रों के तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं देते हैं।योग/ध्यान वगैरह में पश्चिमी कौतुहूलता का कारण यह है कि पश्चिम में कई लोगों ने योगिक क्रियाओं से उतपन्न होने वाले अद्भुत अनुभवों के दावे किए हैं,जैसे कि किसी ने तनाव कम होने की बात की है, किसी ने व्यक्तित्व में सुधार की बात की है तो किसी ने मन में सहजता का अनुभव किया है।दोस्तों आपको तो पता ही होगा कि हमारे शास्त्रों में परमानन्द की बातों का जिक्र है,सत-चित्त-आनंद की बातें बताई गई हैं।बस यही परमानंद की स्थिति ही श्रेष्ठ आंनद अथवा परमसुख की स्थिति है।संभोग इत्यादि से होने वाले आनंद तो संकीर्ण अथवा क्षणिक आंनद हैं।

चलिये योग या प्राणायाम/ध्यान की वह श्रेष्ठ स्थिति तो बड़े बड़े ज्ञानी तपस्वियों के ही बस की बात है,परन्तु इस स्थिति को पाने की कोशिश में लोग जो प्रतिदिन योग व ध्यान का अभ्यास करते हैं,इसी दौरान भी कई लोगों को विभन्न अनुभवों का अहसास होता है,यह अनुभव भी कम से कम सम्भोग के आनंद से तो बेहतर ही होता है।क्योंकी इस तरह के किसी अनुभव की छाप आपके स्वभाव और व्यक्तित्व में जीवन पर्यंत रहती है,यह अनुभव सदैव आपके साथ सकारात्मक रूप में बना रहता है,यह क्षणिक नहीं होता है।

निरन्तर प्राणायाम या ध्यान (meditation) करने वालों के अंदर सुखद स्थिरता का ऐसा संचार होता है कि उनका जीवन दृष्टिकोड़ व्यापक हो जाता है वे जीवन के अलग-अलग कार्यों में विचित्र सुखों की अनुभूति करने लगते हैं।

जैसे कि;

ढलते सूर्य को देखते हुए आसाधारण सुख की अनुभूति करना-

समुद्र,नदी या तालाब के किनारे बैठकर हिलोरे लेते हुए जल का सुखद अनुभव लेना-

बागवानी करते हुए प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव करना-

यूं कहें तो मानवीय मन दर्शन और आनंद के शिखर में पहुंचने लगता है।

परन्तु इस स्थिति तक पहुंचने के लिए मनुष्य को अगाध संयम की आवश्यकता होती है,चलिये दोस्तों मै अपने शब्दों को यहां पर विराम देता हूँ,यदि यह लेख पढ़ते हुए आपको भी कुछ सुखद अनुभव हुआ हो तो इसे अपवोट जरूर करियेगा क्योंकी आपकी प्रोत्साहनाओं से ही हमें लिखने का उत्साह मिलता है।

(आयुष्मान सिंह)

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