स्वमूत्र चिकित्सा – नायाब भी अचूक भी

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मूत्र सामान्य तौर पर घृणित द्रव के रूप में देखा जाता है. यह सीधे तौर पर गंदगी से जुड़ा माना जाता है. पर यही है इसका रहस्य. प्रकृति ने अपने महान रहस्य उन वस्तुओं में छुपा रखे हैं जहां उनकी संभावना की कल्पना भी हम नहीं कर सकते. नीम, करेला, लहसुन आदि का उदाहरण हम ले सकते हैं. कड़ुआ या तीखा अर्थात जो सीधे ग्रहण करने में दुष्कर हो वह जीवन-दायी गुणों से भरपूर है. बात करें गौमूत्र की तो गौमूत्र ही अपने भीतर सौ से अधिक बीमारियों को जड़ से समाप्त करने की क्षमता होती है.

अब और भी गौर से देखें तो पता चलेगा कि पशु अपनी चिकित्सा स्वयं कर लेते हैं. विशेषकर हम कुत्तों में देखते हैं. जब भी वे अस्वस्थ होते हैं बाहर जा कर पेड़ पौधों को सूंघ कर कोई विशेष पौधे या पत्तियां खा लेते हैं और अपनेआप ठीक हो जाते हैं. इसी तरह पशुओं को चोट लग जाने पर वे उस स्थान पर चाट चाट कर स्वयं ही उसका उपचार कर लेते हैं और उनका घाव भर जाता है. यही स्व-शरीर चिकित्सा की क्षमता प्रकृति ने हमें भी दी है पर मानव ने उस दिशा में पर्याप्त अनुसंधान नहीं किया है.

हम अपनी अर्थात मनुष्यों की बात करें तो हमारे शरीर से निकलने वाले द्वितीय अहम द्रवीय स्राव से भी कई रोगों की चिकित्सा होती है और वह है लार. लार से तमाम शारीरिक समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है किन्तु आयुर्वेद के अतिरिक्त और किसी चिकित्सा-पद्धति में इस पर कार्य नहीं किया गया है.

अब हम अपने मुख्य विषय पर आते हैं. लार की तरह हमारे मानव शरीर का दूसरा अहम स्रवित द्रव है हमारा मूत्र. हम इसकी दुर्गंध से भी भागते हैं. किसी अन्य व्यक्ति के मूत्र की बात तो छोड़िये हम अपने मूत्र की गंध या उस पर दृष्टि डालने से बचते हैं. किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि जब हमने जन्म लिया था तो शिशु रूप में हमारे मूत्र से हमारी माता को कभी कोई समस्या नहीं हुई. हमारे सफाई नहलाई धुलाई करने से लेकर हमारे मूत्र सिंचित वस्त्रों को भी बड़ी प्रसन्नता से धोया करती थीं हमारी मातायें. भले ही माता को शिशु-मूत्र से भीगी चादरों पर सोना पड़े किन्तु उनका बच्चा गीले में न सोये इसका ध्यान वे सदा ही रखती हैं. तो क्या ऐसी स्थिति में उन्हें अपने छोटे से नन्हे मुन्ने के मूत्र से कभी बदबू आती है..क्या उनको उससे कोई वितृष्णा या घृणा होती है? उत्तर है – नहीं! क्योंकि वे अपने शिशु के मूत्र को मूत्र रूप में नहीं देखतीं. वे उसे अपने शिशु के शरीर के एक प्राकृतिक व्यवहार के रूप में ही हमेशा देखती हैं.

बस, यही है वह मूल तत्व जिसकी और संकेत करना हमारा उद्देश्य है. मूत्र को मूत्र की तरह नहीं बल्कि शरीर के एक प्राकृतिक व्यवहार या प्राकृतिक द्रव के रूप में ही देखें. मूत्र नामक शरीर से उत्सर्जित होने वाले द्रव में क्या क्या तत्व हैं? वे तत्व हमारे शरीर में पुनः जा कर किस तरह लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं, यह विषय है हमारे आज के इस आलेख का.

अतएव प्रथम तो हम वैज्ञानिक रूप से यह देख लें कि आखिर हमारे मूत्र में कौन से तत्व हैं. तो इस दिशा में सीधे-सीधे यह ज्ञात होता है कि मूत्र, मानव और अन्य कशेरुकी जीवों मे वृक्क (गुर्दे) द्वारा स्रावित एक तरल अपशिष्ट उत्पाद है. कोशिकीय चयापचय के परिणामस्वरूप कई अपशिष्ट यौगिकों का निर्माण होता है, जिनमे नाइट्रोजन की मात्रा अधिक हो स्कती है और इनका रक्त परिसंचरण तंत्र से निष्कासन अति आवश्यक होता है. तब यह मूत्र के रूप में शरीर से स्रावित होता है अर्थात बाहर आता है.

आयुर्वेद अनंत काल से मानव रोगों का निदान है. देखा जाए तो यही विश्व की सर्वप्रथम और सर्वोत्कृष्ट चिकित्सा पद्धति है. भारत में विदेशियों ने अपने आक्रमणों और शासन के दौरान भारतीय चिकित्सा की इस महान पद्धति के विनाश की हर कोशिश की. पुस्तकालयों को जलाने से ले कर आयुर्वेद अनुसन्धान केंद्रों और आयुर्वेदिक चिकित्स्कों सभी को ख़त्म करने के प्रयास किये गए. फिर भी है बात कुछ तो ऐसी कि हस्ती मिटती नहीं हमारी..

आयुर्वेद जीवित है आज भी और रहेगा हमेशा. क्योंकि यह जीवन जगत से जन्मा है, पेड़ पौधों से आया है और कांड मूल फलों में जन्मा है. इसी आयुर्वेद ने अपनी अनेकों चिकित्सा पद्धतियों की भांति ही मूत्र चिकित्सा को भी विकसित किया. यद्यपि अन्यान्य कारणों से अभी यह मुख्यधारा की चिकित्सा नहीं बन सकी है.

तो अब बात करते हैं कैसे होती है मूत्र चिकित्सा. उसके पहले यदि इसके प्रभाव की बात करें तो इसका प्रभाव अचूक है बशर्ते इसकी चिकित्सा पूर्ण विधि-विधान से की जाए. स्वमूत्र चिकित्सा का अर्थ है स्वयं के मूत्र द्वारा विभिन्न रोगों का उपचार. इस पद्धति में न तो रोगी की नाड़ी देखने की आवश्यकता है, न एक्स-रे लेने की. न थर्मामीटर लगाना पड़ेगा न ही कोई इन्जेक्शन चाहिये. इसमें दवा लेने या परहेज करने जैसी भी कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना है. इसमे न तो पैसा खर्च होता है न कोई विशेष समय देना पड़ता है या किसी तरह की समय सारणी का ध्यान रखना है. इसमें स्वमूत्र ही चिकित्सक एवं स्वमूत्र ही चिकित्सा है. रोगी स्वयं बिना खर्च और बिना किसी परिश्रम के स्वमूत्र सेवन कर रोगमुक्त हो सकता है.

स्वमूत्र चिकित्सा के माध्यम से कई असाध्य बीमारियों का उपचार भी संभव है. स्वमूत्र चिकित्सा छह प्रकार से की जाती है – स्वमूत्र से सारे शरीर की मालिश करके, स्वमूत्रपान द्वारा, केवल स्वमूत्र और पानी के साथ उपवास करके, स्वमूत्र की पट्टी रख कर, स्वमूत्र के साथ अन्य प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग करके तथा स्वमूत्र को सूर्य किरण देकर.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई शिवांबु का पान करते थे. शिवांबु अर्थात स्वमूत्र. भारत में स्वमूत्र चिकित्सा को प्रोत्साहित करने में उनका योगदान सदा ही स्मरित किया जायेगा. शिवांबु शब्द भी प्रचलन में मोरारजी भाई के माध्यम से ही आया है.

शिवांबु चिकित्सा न केवल असाध्य रोगों का निदान करती है बल्कि इसमें चिरयूवा रहने के गुण भी अंतर्निहित हैं. बुढ़ापे से कैसे बचें अर्थात वृद्धावस्था की समस्याओं से कैसे बचें और वृद्धावस्था को दूर कैसे करें, आदि तमाम महत्वपूर्ण जीवनोपयोगी उपयोगिता छिपी है स्वमूत्र चिकित्सा में. और दिलचस्प बात ये है कि भारत से अधिक भारत से बाहर इसका उपयोग हो रहा है.

इन सभी में सर्वाधिक सक्षम उपचार विधि स्वमूत्र पान की है. इसका विविध रोगों में त्वरित लाभ देखा गया है. कैंसर जैसे मारक रोगों में भी इसका सफल और सम्पूर्ण लाभ देखा गया है. अमेरिका के डॉक्टर बीट्राइस बार्टनेट ने तो भारतीय शिवांबु चिकित्सा से प्रभावित हो कर उस पर पूरी एक रिसर्च की और फिर उन्होंने यूरिन थेरैपी नामक एक पुस्तक भी प्रकाशित की है. इस पुस्तक में मूत्र चिकित्सा के तमाम तरीकों का जिक्र करते हुए शिवांबु को एक दिव्य द्रव (Divine Liquid) की संज्ञा दी है.

स्वमूत्र चिकित्सा पर भारत में अनुसंधान चल रहे हैं औऱ आने वाले दिनों में यह मुख्य धारा की चिकित्सा में शामिल हो सकती है. बेंगलुरु, मुंबई और कोल्हापुर में इसके चिकित्सा संस्थान हैं. इस चिकित्सा का लाभ लेने के लिए वहां संपर्क किया जा सकता है.

(पारिजात त्रिपाठी)

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