हाथ छुड़ाने वाले तीन तलाक को ‘हाथ’ का साथ

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किसी का मूल अधिकार छीन लेना या किसी को उसके मानवीय अधिकार से वन्चित कर देना हुकुम नहीं होता किसी का – न धर्म का, न ही धर्म के ठेकेदारों का!

संसद में फंसा हुआ है तीन तलाक को हलाक करने वाला कानून. और संसद से बाहर सारे हिन्दुस्तान में इस समय हर मुस्लिम महिला चाहे वो शादीशुदा हो या गैर-शादीशुदा, सभी सांस रोक कर संसद की तरफ देख रही है इस उम्मीद के साथ कि अगर ये कानून बन जाये तो कितना अच्छा हो! ऐसा हो जाये तो वे सुरक्षित हो जायें उनका घर सुरक्षित हो जाये!

तीन तलाक को कुरआन का हक बताने वालों को ये पता नहीं कि धर्म किसी को पीड़ित करने का नाम नहीं हैं. अपनी नीच सोच को जिसमे आपका स्वार्थ सिद्ध होता है उसे इस्लाम की आवाज़ बता कर बरसों से आप महिलाओं का शोषण करते आये हैं. हालात इतने बुरे हैं कि औरत पैर की जूती होती है मर्द के लिए – इस तरह के मुहावरे बन गए हैं.अब आखिरकार मजलूम महिलायें अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगी हैं. और यह अधिकार भी सीमा से आगे जा कर नहीं अस्तित्व का संकट बन चुका एक बड़ा वंचित अधिकार है, अब भी महिलायें इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएंगी तो आने वाले दिनों में इस्लाम में घर नाम की संस्था खत्म हो जाएगी.

ये तो बात हुई इस्लाम के ठेकेदारों की जिन्होंने अपनी ही औरतों को ग़ुलाम बना कर उनको इंसानी हक से वंचित किया हुआ है. लेकिन अब इस तरह की संकीर्ण मानसिकता वाले मुस्लिम पुरुषों का बनाया हुआ क़ानून जिसे वे बार-बार कुरआन का हुकुम बना कर औरतों को मजबूर करते हैं कि वे अपनी ग़ुलामी की ज़िंदगी को जारी रखें और उनके मर्द हर चार दिन में उनको तीन तलाक दे कर फिर नयी औरत को अपनी प्यास बुझाने के लिए दुल्हन बना लें और फिर कुछ दिन बाद उसको भी तीन तलाक दे कर फिर नई औरत अपने घर और अपने बिस्तर पर उठा लाएं.  साफ़ ज़ाहिर है कि ये कितना एक तरफ़ा और कितना गिरा हुआ घटिया शरीयत का क़ानून है जो न केवल नाइंसाफी है बल्कि आज इक्कीसवीं सदी के सभ्य समाज पर एक धब्बा भी है.

अब बात करते हैं तीन तलाक को समर्थन देने वाली कांग्रेस की. कांग्रेस की नेत्री इंदिरा गाँधी की ह्त्या होने पर 1984 में कोंग्रेसियों द्वारा सिक्खों का कत्लेआम करने वाली पार्टी वैसे भी हिन्दू और सिखों को अपना वोट बैंक नहीं मानती. इसलिए अब उसके पास मुस्लिम वोट ही बचे हैं. मुस्लिम घरों में औरतों को ग़ुलामी की ज़िंदगी कुछ इतनी बदतर है कि लाखों औरतों का तो घर से भी बाहर निकलना उनके मर्दों को मंज़ूर नहीं है. इस स्थिति में साफ ज़ाहिर है कि कांग्रेस के वोटर मुस्लिम मर्द ही ज्यादा हैं मुस्लिम औरतें नहीं.

ये मर्द मजहबी तौर पर कट्टर भी हैं और इंसानियत के हकूक से ज्यादा अपने स्वार्थों की संकीर्णता के लिए मरे जाते हैं. आज के आधुनिक युग में जब ज़िन्दगी में समानता का अधिकार प्रजातंत्र ने दुनिया भर के लोगों को दिया हुआ है, मुस्लिम मर्दों ने इस्लाम का सदियों पुराना क़ानून जबरदस्ती चलाये रख कर न जाने कितनी बुराइयों को खुले आम वैधानिक बनाया हुआ है. औरतों के शोषण और ग़ुलामी की बात तो बहुत ही छोटी और मामूली है, इसीलिये जब देश की सरकार घरेलू शोषण के विरुद्ध मुस्लिम महिलाओं को मानवता का यह अधिकार प्रदान करना चाहती है तो मुस्लिम धर्म गुरु खुले आम टीवी बहसों में शामिल हो कर बेशर्मी से इसका विरोध कर रहे हैं.

अब बात करें कांग्रेस की. कांग्रेस मुस्लिम मर्दों के वोट को नज़र में रख कर मुस्लिम औरतों के इंसानी हक के खिलाफ तो जा रही है, पर उसे इस मूर्खतापूर्ण नाइंसाफी का परिणाम समझ नहीं आ रहा है. होगा साफ़ तौर पर ये कि अब तक जो भाजपा सिर्फ हिन्दू वोटों से जीतने लगी है अब मुस्लिम महिलाओं के वोट पाकर और भी बड़ी विजेता बनेगी. 

भाजपा की तो दोनो ही हालत में जीत है. आप कानून बनाने में मदद कर देंगे तो भी श्रेय भाजपा को ही जाना है और अगर आप कानून नहीं बनने देंगे तब भी मुस्लिम खवातीन आपको माफ करने से रहीं – इन दोनो ही हालत में मुस्लिम महिलाओंं का वोट भाजपा को जाने वाला है! 

स्पष्ट है कि जहाँ भाजपा सरकार अल्पसंख्यक महिलाओं को न्याय दिलाने के लिये कानून लाना चाहती है वहीं इसका विरोध करने वाले विपक्ष के विरोध का आधार न्याय-अन्याय नहीं बल्कि वोट-परस्ती है – चाहे वो राहुल की कांग्रेस हो, माया की बसपा हो, अखिलेश की सपा या ओवैसी की एआईएमआईएम हो!  

भाजपा और शिवसेना को छोड़ कर देश की हर पार्टी मुसलमानो को चलते-फिरते वोट मान कर चलती है. मुसलमान मर्दों को नाराज़ करके तीन तलाक वाले कानून को समर्थन देना इन सबके लिये अपने मुस्लिम वोटों को खतरे में डालना है. इन्साफ और मानवता गये तेल लेने!

बेहतर होता कि सारे भारतीय सांसद मानवता के इस कार्य में अपना योगदान देते और ध्वनि मत से यह कानून पास होता.. किन्तु स्वार्थ में अंधे विभिन्न राजनेता और इस्लाम के तथाकथित ठेकेदारों को अपनी दुकानदारी के खतरे मे पड़ जाने का डर है. इसलिए वे पूरी कोशिश कर रहे हैं कि यह नाइंसाफी कायम रहे. लेकिन मेरा ख़याल है कि यदि इन लोगों को इंसानियत की परवाह नहीं है तो न सही, पर ऊपर वाले से इनको ज़रूर डरना चाहिए..क्योंकि कहते हैं कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती !!

(पारिजात त्रिपाठी)