हौसलों की उड़ान को सपनों का आसमान

Share on facebook
Share on twitter
Share on google
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

चारों तरफ भीड़ ,कैमरों के फ्लैश की चमक के साथ तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता हुआ हॉल तभी स्टेज पर लाइट के फोकस में धुंधली से साफ होती हुई एक मुस्कुराती हुई सामान्य सी लड़की अनुलेखा खड़ी दिखाई देती गई । जिसे राष्ट्रीय स्तर के सम्मान से नवाजा जाना है..


सामने सोफे पर बैठी उसकी माँ और पापा की नजरें उस पर टिकी हैं ।देखते ही देखते एक सामान्य सी चुप रहने वाली और कभी कभी विरोधी लगने वाली लड़की आज कुछ ख़ास लगने लगी थी। और मां ने अपने ढलकते आंसुओ को अपने आँचल में सुखा लिया था और पापा अपने ज़ज़्बातों को छुपाकर नज़रे चुराकर लोगों से बात करने में व्यस्त थे।

चुराकर डायरी लिखने की आदत ने कब कविताओं की पगडंडियों पर चलते हुए शव्दों से खेलना सीखा दिया और बोलना सिखा दिया पता ही नहीं चला।

“पैसा रेस के उस घोड़े पर लगाया जाता है जिससे जीत की अधिक उम्मीद हो ” ,”लड़कियां विज्ञान और गणित विषय पढ़कर पास नहीं कर पातीं ” , और लड़कियों के लिए पढ़ाई से ज्यादा समय से शादी हो जाना जरूरी है ” । इन तमाम बातों को सुनते सुनते कला वर्ग से स्नातक करके अपनीजज कला की गठरी को मन में छुपाए विवाह के बंधन में बंधकर अनुलेखा खुद को हारा हुआ महसूस करती , लेकिन हर रोज अपने सपने के ताने बाने को मन ही मन बुनती ।इसी बीच एक बच्चे की जिम्मेदारी में भी बढ़ गई और सपनों की उड़ान की तैयारी करते पंख और कमज़ोर हो गए।

मन की आस कमज़ोर पड़ती लेकिन कुछ करने का जज़्बा मरा नहीं था ।सब काम निपटाकर रात को सोचती और दिन में फुर्सत मिलते ही लिखती । कभी कुछ प्रकाशित हो जाता तो कभी रेडियो पर खुद की आवाज़ में ही सुनाने का मौका मिल जाता। डूबते मन को तिनके का सहारा काफी था। इसी बीच स्क्रिप्ट लेखन जैसे विषय को पढ़ाने के लिए भी अनुलेखा के एक शिक्षक ने आमंत्रण दिया क्योंकि वो अनुलेखा की कलात्मक प्रतिभा को अच्छी तरह पहचानते थे और कॉलेज के दिनों बहुत सहयोग भी करते थे। अपने ख्वाबों को लिखने और पढ़ाने का सिलसिला एक किताब का आकार ले चुका था और अनुलेखा के सपनों को आयाम मिल गया था ।

पापा की उम्मीद की रेस का घोड़ा नहीं थी ।विज्ञान और गणित उनकी नज़र में अनुलेखा के लिए न थे और समय से शादी का होना सबसे अहम था। लेकिन इन सबके के बीच अनुलेखा के लिए सपनों के जिंदा रहना सबसे ज़रूरी था । कला की अभिव्यक्ति को खामोशी से किस तरह मंच तक लाना है ये अनुलेखा के सपनों के ताने बाने के मजबूत धागों का ही परिणाम था कि उसकी लिखी किताब अभिव्यक्ति की कला के हर मंच के लिए नया आयाम थी।

चकाचोंध के बीच पुरस्कार मिलते वक़्त अनुलेखा के बिखरे सपनों को आकार मिल गया था ।बैकग्राउंड में हल्की सी ध्वनि में गीत बज रहा था और मंच पर मंच संचालक सम्बोधित करते हुए कहा रहे थे कि अनुलेखा के माता पिता के लिए जोरदार तालियां जिन्होंने अपनी बेटी की इस काबिल बनाया । तालियों की गड़गड़ाहट के साथ जीत की खुशी और आत्मग्लानि के आंसू एक साथ अनुलेखा माँ और पापा की आंखों से निकल रहे थे क्योंकि हौसलों की उड़ान को पंख मिल गए थे ।

(शालिनी सिंह)

ट्रेंडिंग

काम की खबरें

देश

विदेश

मनोरंजन

राजनीति