रमजान के महीने में निपट गये Imran Khan

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रमजान के महीने में इमरान खान निपट गए - वो भारत की जय बोल कर कह रहे थे - मोदी जी कृपा कर मुझ बचा लीजिये  -पाकिस्तान का संविधान 1973 की 10 अप्रैल को लागू हुआ था. और देखा जाये तो इसी संविधान दिवस पर ही इमरान खान निपट गये क्यूंकि अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग तो 9 अप्रैल की रात को 12 बजे के बाद ही हुई है.

रमजान के "पाक" महीने में इमरान खान "खाक" हो गए जबकि उन्होंने सारे पापड़ बेल लिए सत्ता बचाने के लिए और अंत में उसके स्पीकर और डिप्टी स्पीकर ने वोट ना करा कर त्यागपत्र दे दिया और इमरान के सारे सांसद सदन से बाहर चले गए.

ऐसा करके इमरान ने पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के सिवाय और कुछ नहीं किया --विपक्ष और अमेरिका पर पत्थर फेंकने से बेहतर था कि सीना तान कर अविश्वाश के प्रस्ताव का सामना करते.

लेकिन एक महीने में 4 बार इमरान खान भारत की तारीफ करते रहे जबकि यही इमरान नियाजी भारत में मोदी और RSS को नाज़ी पार्टी कहते थे -- लेकिन सत्ता खतरे में आने पर यही नियाजी खुद "नाजी" बन गये मगर फिर भी नींबू निचुड़ गए इमरान के.

मुझे तो लगता है इमरान बार बार भारत की तारीफ़ करके नरेंद्र मोदी को कह रहे थे --मेरे बड़े भाई, आप ही मुझे बचा सकते हैं, मुझे बचा लीजिये!   लेकिन दाल नहीं गली --मोदी क्यों परवाह करते.

इधर कुछ दिन पहले नवजोत सिद्धू भी निपट गये थे और अब उनका दोस्त निपट गया इमरान खान --ऐसा ना हो दोनों कहीं "आप" में शामिल हो जाएं - मरियम शरीफ ने ताना मार कर कहा है इमरान को कि हिंदुस्तान इतना पसंद है तो वहीँ जा कर रह लो --उसे पहले अपने बाप को तो लंदन से बुलाना चाहिए जो नसीहत दे रही है इमरान को.

अविश्वास प्रस्ताव लोकतंत्र की एक प्रक्रिया है और ऐसा प्रस्ताव लाने का विपक्ष को अधिकार होता है जिसका सामना सत्ता पक्ष को करना चाहिए. परन्तु नियाजी इमरान ने अपने जर-खरीद डिप्टी स्पीकर के जरिये विपक्ष के प्रस्ताव को खारिज करा दिया.

इमरान खान को हिन्दुस्थान के प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से कुछ सीखना चाहिए था जिनके पास जब संख्याबल नहीं था तो उन्होंने चुपचाप जा कर त्यागपत्र दे दिया था.
एक बात और सत्य है पाकिस्तान के बारे में, अगला प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ के बनने के बाद भी भारत से रिश्तों की सुई कश्मीर पर ही अटकी रहेगी --उसमे कोई अंतर नहीं होगा.