पाकिस्तान के संविधान पर मुनीर का कब्जा, लाहौर हाईकोर्ट के जज ने दिया इस्तीफा

On: November 15, 2025 6:52 PM
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पाकिस्तान के संविधान

पाकिस्तान के संविधान पर मीजर जनरल आसिम मुनीर के कब्जे और इसके विरोध में लाहौर हाईकोर्ट के जज के इस्तीफे को लेकर एक SEO-फ्रेंडली, 1000 शब्दों का हिंदी कंटेंट प्रस्तुत है जिसे आप अपनी न्यूज वेबसाइट पर जोड़ सकते हैं:

पाकिस्तान के संविधान पर आसिम मुनीर का कब्जा: विरोध में लाहौर हाईकोर्ट जज का इस्तीफा

पाकिस्तान में हाल ही में असामान्य और विवादास्पद घटनाओं का दौर जारी है, जिसमें सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के हाथों देश की सत्ता केंद्रित होती नजर आ रही है। संसद में पारित 27वें संविधान संशोधन के माध्यम से मुनीर को असीमित शक्तियां दी गई हैं, जिससे पाकिस्तान के संवैधानिक ढांचे में भारी बदलाव हुआ है। इस विवादास्पद फैसले के विरोध स्वरूप लाहौर हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने इस्तीफा देकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला होने का विरोध जताया है।

27वें संविधान संशोधन का सार

पाकिस्तान की संसद ने 27वें संविधान संशोधन बिल को भारी बहुमत से पारित किया, जिसमें सेना प्रमुख आसिम मुनीर को “चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज” (CDF) का नया पद प्रदान किया गया। इस पद के तहत मुनीर पाकिस्तान की तीनों सेनाओं की कमान सौंपी गई है, जिससे वह सबसे ताकतवर शख्स बन गए हैं। यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को कम करता है और एक नया संघीय संवैधानिक न्यायालय (Federal Constitution Court) स्थापित करता है, जो संवैधानिक मुद्दों को देखने का अधिकार रखता है।

असिम मुनीर को मिली अत्यधिक शक्तियां

इस संविधान संशोधन से मुनीर को आजीवन फील्ड मार्शल रैंक देने के साथ-साथ परमाणु हथियारों की कमान और देश के रक्षा बलों के प्रमुख के रूप में व्यापक अधिकार मिले हैं। इसके अलावा, मुनीर को कानूनी संरक्षण भी दिया गया है, जिससे उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकेगी। इस कदम से पाकिस्तान की संसद ने सेना के प्रति असाधारण विश्वास और समर्थन जाहिर किया है, जिसका उद्देश्य देश के राजनीतिक और संवैधानिक प्रणालियों पर सेना की पकड़ और सुदृढ़ करना है।

न्यायपालिका में संकट और विरोध

27वें संविधान संशोधन को लेकर देश की न्यायपालिका में गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इस संशोधन को संविधान की हत्या बताते हुए इस्तीफा दे दिया। इसके बाद लाहौर हाईकोर्ट के एक जज ने भी इस कदम के खिलाफ इस्तीफा देकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा की रक्षा का जोरदार दृष्टांत प्रस्तुत किया। न्यायाधीशों का मानना है कि इस संशोधन से अदालतों की संवैधानिक शक्तियां कमजोर हुई हैं और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा है।

राजनीतिक माहौल और विपक्षी प्रतिक्रिया

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बिलावल भुट्टो जरदारी जैसे शीर्ष नेताओं ने इस संशोधन के पक्ष में मतदान किया। हालांकि, विपक्षी दलों, खासकर इमरान खान की पार्टी ने इसका जोरदार विरोध किया और संसद में विधेयक की प्रतियां फाड़कर प्रदर्शन किया। विपक्ष का तर्क है कि यह संशोधन पाकिस्तान को सैन्य अधिनायकवाद की ओर ले जाएगा, जो देश के लोकतंत्र और संविधान के लिए घातक साबित होगा।

अंतरराष्ट्रीय नजरिया और अस्थिरता

पाकिस्तान में इस संवैधानिक बदलाव और सेना प्रमुख को मिली शक्तियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी चिंता है। कई विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान के लोकतंत्र के पतन और सैन्य दखल के बढ़ने के रूप में देख रहे हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा हो सकता है। इस बदलाव के बाद पाकिस्तान की न्यायपालिका स्वतंत्रता खोती नजर आ रही है, जिससे नागरिक अधिकारों और संस्थागत विश्वास को भारी चोट पहुंच सकती है।

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