मिला खजाना उत्तर प्रदेश में

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इस बार वास्तव में मिला है खजाना यहाँ..

पहले यह उत्तर प्रदेश ही था जब यहां के एक शहर में देश भर की निगाहें टकटकी लगाए हुए थीं. खजाना निकलने की उम्मीद करने वालों से ज्यादा भीड़ खजाना निकालने वालों की थी, पर निकली एक चुहिया भी नहीं.

जी हाँ, प्रदेश के उन्नाव ज़िले में यह नौटंकी सारे देश ने देखी थी, लेकिन अब यह सच में हुआ है और जब हो गया तब ही लोगों को इस बारे में पता चला है.

यह है उत्तरप्रदेश का बागपत जो कि जाट नेता टिकैत के नाम से जाना जाता है. लेकिन इस बार यह स्थान जाटों की वजह से नहीं बल्कि खजाने की वजह से चर्चित है. इस बार वास्तव में खजाना मिला है यहां पर.

बागपत में मिला यह खजाना 2000 साल पुराना है. इस खजाने में मूल रूप से छोटे-छोटे मिटटी के बर्तन मिले हैं जिनके अंदर भरे हुए हैं दुर्लभ सिक्के. इस ग्राम का नाम है, जहां ये दफीना दफ़न मिला है, खपराना ग्राम है. यहां इस गांव में 100 बीघे से भी अधिक क्षेत्र में काफी प्राचीन समय से मौजूद टीले देखे गए हैं.

मिटटी के बर्तनों में मिले ये सिक्के 2000 वर्ष पूर्व की मुद्रा (करेन्सी) है. बताया जा रहा है कि यह करेंसी कुषाणकालीन राजा वासुदेव के शासन काल में चलती थी.

‘शहजाद राय शोध संस्थान इस पूरे क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व वाली भूमि का सर्वेक्षण किया है. सर्वेक्षण की रिपोर्ट अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भेजी जाने वाली है.

संस्थान के सर्वेक्षण में यहां टूटे-फूटे मिट्टी के बर्तन, महिलाओं की ज्वैलरी,बच्चों के खेल-खिलौने, खाने-पीने की वस्तुएं रखने वाले मिटटी के पात्र भी प्राप्त हुए हैं. संसथान के निदेशक अमित राय जो कि इतिहासकार भी हैं ने कहा है कि वे एएसआई से खपराना गांव में उत्खनन कराने के लिए पत्र भेजेंगे जिससे कि इस क्षेत्र में भूमि के नीचे स्थित प्राचीन सभ्यता दुनिया के सामने आ सके.

प्राप्त जानकारी के अनुसार कुषाण राजा वासुदेव ने अठारह सौ से दो हज़ार वर्ष पूर्व अर्थात 200-225 एडी में अपने शासन काल के समय यह मुद्रा प्रचलित की थी. एक सिक्के का भार लगभग 7 से 8 ग्राम और साइज 23 मिमी है. सिक्के के एक पहलू में मुकुटधारी राजा वासुदेव दिखाई देते हैं. उनके हाथ में त्रिशूल है और दूसरे हाथ से वे यज्ञ में आहूति डालते दिख रहे हैं. सिक्के की दूसरी तरफ त्रिशूलधारी भगवान शंकर डमरू बजाते हुए अपने वाहन नंदी के साथ उपस्थित हैं.

(अन्जू गुप्ता)

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