आतंक का जवाब आतंक नहीं – ‘Vaidik’ Vichar

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

 

2008 में अहमदाबाद में हुए आतंकी हमले के अपराधियों को विशेष अदालत ने जो सजा सुनाई है, वह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी सजा है। इसमें 38 अपराधियों को मृत्युदंड, 11 को उम्रकैद और 48 पर 2.85 लाख का जुर्माना लगाया गया है।

इसके पहले 1991 में राजीव गांधी हत्याकांड में 26 लोगों को सजा-ए-मौत हुई थी। इस आतंकवादी हमले में 56 लोग मारे गए थे और 240 लोग घायल हुए थे। 70 मिनिट में 21 बम फटे थे। यदि सूरत में मिले 29 बम और फट जाते तो पता नहीं कितने लोग मरते। इस मुकदमे का फैसला आने में 14 साल लग गए, यह अपने आप में अच्छी बात नहीं है।

इन अपराधियों को यदि साल-दो साल में ही फांसी पर लटका दिया जाता तो इस सजा का कहीं ज्यादा असर होता लेकिन सैकड़ों गवाहों से पूछताछ और पुलिस की खोजबीन अच्छी तरह से इसीलिए की गई कि न्याय में कमी न रह जाए। न्यायाधीशों ने गहराई में जाकर निष्पक्ष फैसला करने की कोशिश की है।

7 हजार पृष्ठ के इस फैसले में 77 आरोपियों में से 22 को बरी कर दिया गया है। यदि यह फैसला जल्दबाजी में होता तो ये 22 लोग भी लटका दिए जाते। इस फैसले को सांप्रदायिक नजरिए से देखना भी उचित नहीं है। इस आतंकी हमले की सारी पोल जिसने खोली है, वह भी एक मुसलमान ही है। उसका नाम अयाज़ सय्यद है।

भारत के औसत मुसलमानों को भी इस आतंकवादी हादसे ने बुरी तरह आहत किया था। इस हमले की जिम्मेदारी ‘इंडियन मुजाहिदीन’ और ‘स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया’ नामक संगठनों ने ली थी। पुलिस की जांच-पड़ताल से पता चला है कि इसमें गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र, केरल और कर्नाटक के आतंकवादी भी शामिल थे।

एक अर्थ में यह देश के सभी मुसलमानों को बदनाम करनेवाले संगठन थे। इनके सज़ायाफ्ता लोग में 21 से 40 साल के लोग भी हैं। ये लोग गोधरा कांड के बाद हुए दंगों का बदला लेने पर उतारु थे। इन्होंने अपने आतंकी विस्फोटों की झड़ी भारत के दूसरे शहरों में भी लगाई थी। इन्हें शायद पता नहीं है कि इनके विस्फोटों में मरे लोगों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही थे।

इन आतंकियों ने अपना निशाना तो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अन्य मंत्रियों को बना रखा था। ज़रा सोचिए कि यदि ये लोग अपने इरादों को अंजाम दे पाते तो देश के करोड़ों निर्दोष मुसलमानों की दशा क्या होती? 2002 में गुजरात के दंगों में मारे गए मुसलमानों के प्रति देश के सभी हिंदुओं और मुसलमानों को काफी अफसोस था लेकिन आतंकवादी हरकतों ने उस अफसोस को भी नदारद कर दिया।

इन आतंकवादियों को अब जो कड़ी सजा मिल रही है, उसके कारण बहुत-से घरों में अंधेरा हो जाएगा लेकिन लोगों को बड़े पैमाने पर सबक भी मिलेगा। सबक यह है कि कोई भी आतंकी कितनी ही चालाकी करे, वह न्याय के शिकंजे में फंसे बिना नहीं रहेगा। जिन परिवारों ने इस आतंकी हमले में अपने प्रियजनों को खोया है, उनके घावों पर यह मरहम भी कुछ काम नहीं करेगा।

कुछ मुस्लिम संगठन अदालत के इस फैसले पर सांप्रदायिक रंग चढ़ा रहे हैं लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि भारत की अदालतें अपने फैसले जाति और मजहब के आधार पर नहीं करती हैं। आतंकवादी कोई हो, हिंदू या मुसलमान, उसे कठघरे में खड़े होना ही पड़ेगा और अपने किए का फल भुगतना ही पड़ेगा। इस फैसले ने यह सिद्ध किया है और इसका यही संदेश है कि आतंक का जवाब आतंक नहीं हो सकता।