अब न आना अपने देस, लाडो !

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छोटी सी उमर परणाई ये बाबो सा ..काईं थारो करयो मैं कसूर..हो..इतरा दिना तो म्हाने लाड लडाया..अब क्यों करो सा म्हाने दूर …
बचपन से ये गीत सुनती आ रही हूँ| पर मुझे लगता है इस गीत का सही अर्थ एक लड़की विवाहोपरांत ही समझ पाती है| विशेष रूप से हम हिंदुओं में एक विशेष वर्ग है मारवाड़ी| यूँ तो सभी जातियों में अधिकतर इसी मानसिकता को बेटियों पर थोपा जाता है। उन्हें ये विश्वास पूरी तरह दिलाया जाता है कि वो ‘पराया धन’ है| ताकि विवाहोपरांत वो मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार रहे और ये समझे कि उसका वास्तविक घर उसका मायका नही पति का घर है| साथ में ये सीख भी पल्लू से बाँध दी जाती है कि अब जीना-मरना सब वही पति के साथ है| ये कहकर विषम परिस्थितियों में भी उसके मायके वापस लौट आने का द्वार बंद कर दिया जाता है| आखिर क्यूँ?  किसने बनाये हैं ये रीति-रिवाज़ और परम्पराएँ?
प्राचीन काल में हिंदु राजा-महाराजाओं के शासनकाल में उनकी रानियों को यथाोचित आदर और सम्मान प्राप्त था| कभी उन्हें प्रताड़ित और शोषण नही किया गया| राज परिवार प्रजा के लिये एक आदर्श होता है और आम जनता उनके जीवन से ही प्रभावित होकर अपने जीवन में उन आचार-विचारों को अपनाती है ,उनका पालन करती है| परन्तु हमारे पूर्वजों ने शायद इसे  भली-भाँति नही समझा| बरसों से ही राजस्थान में बेटियों को कम उम्र में ब्याह दी जाने वाली परम्परा आज भी कायम है| उन्हें बोझ समझा जाता है| माता-पिता जब स्वयं अपनी संतान को भार समझे तो कोई दूसरा इस भार का वहन क्यूँ ,किसलिये और कितने दिन करेगा? किस विश्वास पर वे अपनी फूल जैसी बच्ची को इतने सारे अनजान लोगों के बीच छोड़ आते हैं| उनका हृदय नही काँपता?
मैं ये कतई नही कह रही कि हर लड़की जो ससुराल जाती है उसे ये सब कष्ट भोगने पड़ते हैं| परन्तु अधिकतर यही देखा गया है कि ससुराल में उन्हें वो प्रेम,वो सम्मान,वो स्वतंत्रता नही मिल पाती जो मायके में होती है|
हाँ कुछ जिम्मेदारियों का वहन और उसका पालन विवाहोपरांत आवश्यक होता है और करना भी चाहिये हर लड़की को| परन्तु उसकी आशाओं और इच्छाओं को जबरन रूढ़िवादी मानसिकता की नकेल डालकर सात ताले में बंद कर देना उचित नही|
क्या विवाह पश्चात उसके सारे सपने,उमंगें,आशाएँ सब जिम्मेदारियों और परम्पराओं की भेंट चढ़ जाती है? क्या ब्याह के बाद उसका बचपन कही खो जाता है? उससे एकाएक बड़ा बना दिया जाता है| ये अहसास दिलाया जाता है की वो अब बच्ची नही रही| वो हँसे अवश्य मगर तब जब सबकी मंज़ूरी हो अन्यथा उसे बाग़ी या पागल करार कर दिया जाता है| राजस्थान में तो अब भी पर्दा प्रथा है| नौ इंच का घूंघट ओढ़ना क्यूँ ज़रूरी है ये बात मुझे आजतक समझ नही आई| क्या सारे नियम-कायदे और कानून क्या बस स्त्रियों के लिये हैं? उसे त्याग की मूरत का ज़बरदस्ती वाला मुखौटा पहना कर विश्व भर में एेसी छवि बना दी गई है कि दुनिया मैं औरत ही वो सजीव रूप है जो अपने लिये नही बस अपने घर-परिवार,अपनी संतान के लिये सोचती है|
बहुत हद तक ये सत्य भी है,पर क्या वो इंसान नही? क्या उसे अपना जीवन जीने का अधिकार नही?  क्यूँ सदैव उसे ही अपनी सारी इच्छाओं का परित्याग करना आवश्यक है? मैं इस कथन की पुनरावृति कर रही हूँ कि सबके साथ ऐसा नही पर अधिकतर ऐसा ही है| आधुनिक से आधुनिक परिवारों में भी खुलकर नही तो अप्रत्यक्ष दबाव अवश्य झेलना पड़ता है| मध्यमवर्गीय और निचले वर्ग की तो बात करना ही व्यर्थ है| जहाँ लड़कियों को विवाह करके घर में लाते ही इसी दकियानूसी सोच के साथ हैं कि घर का कार्य करेगी और वंश को आगे बढ़ायेगी| अब एक और आधुनिक सोच शामिल हो गई है कि कमाऊ बहू चाहिये जो घर भी सँभाले और नोट भी कमाये| खैर आत्मनिर्भर होना बुरी बात नही| स्वेच्छा से करना चाहे तो बहुत अच्छी बात है पर किसी प्रकार का दबाव नही होना चाहिये| वो ये सब कुछ आप नही कहेगें तब भी करेगी पर सिर्फ यही क्यूँ करे? क्या उसे अपने सपनों को जीने और साकार करने का अधिकार नही? यहाँ उसे सब सहन करना होगा क्यूँ?  क्या ये घर उसका नही?
माता-पिता ने पराया धन कह कर विदा कर दिया और अपनी ज़िम्मेदारियों से छूट गये| ससुराल में किसी बात का विरोध करे तो माँ-बाप के घर भेज देने का ताना दिया जाता है| आखिर उसका घर है कौन-सा? या उसका कोई घर है भी या नही? ऐसे बहुत से प्रश्न है जिनका उत्तर हर लड़की के लिये जानना अनिवार्य है| क्या वो एक सुंदर जीवन जीने का हक नही रखती?
इसका मुख्य कारण है मायके वालों की मानसिकता,जो शत-प्रतिशत ग़लत है| आखिर वो बेटियों को ऐसी सोच के साथ पालते ही क्यूँ है कि वे पराया धन है| बेटियों को लक्ष्मी का रूप कहा जाता है| यदि ये सत्य है तो अपनी लक्ष्मी को कोई किसी पराये घर नही भेज देता| माना कि पुरानी परम्पराओं का निर्वाह करते हुए उन्हें विदा भी कर दिया जाता है परन्तु इन विचारों के साथ नही कि ‘वो घर अब तेरा बिटिया ये घर अब परदेस है| ‘जिस आँगन में उसका बचपन बीता,जिस पिता की गोद में खेलकर वो बड़ी हुई,जिस माँ की ममता का आँचल उसे सदैव छाया देता रहा ,उसी घर जाने के लिये वो बुलावे की बाट जोहने लगती है| मेहमान हो गई है चार दिनों की| क्यूँ वो अब भी अपनी मर्ज़ी से मायके में जा कर नही रूक सकती कुछ दिन अपनी इच्छा से| क्यूँ सारे अधिकार अब भाभी के चाबी के छल्लों में सिमट कर रह जाते हैं,जो तय करेगें कि ननद बाई को कितनी बार और  कितने दिन रहना होगा मायके में|
यदि उस पर अत्याचार हो तो वो ये फैसला आँख मूँद कर क्यूँ नही ले सकती कि उसका एक घर और भी है जहाँ वो जा सकती है| कहने का तात्पर्य ये नही कि हर छोटी बात पर मायके पहुँच जाओ| घर में छोटे-मोटे वाद-विवाद होते हैं,जिसे आपसी समझ और सूझ-बूझ से सुलझा लेना चाहिये| पर जहाँ शोषण व अत्याचार हो वहाँ मौन रहना कहाँ की समझदारी है|
ऐसा नही कि हर घर की ये कहानी है पर घर-घर में ऐसा होता अवश्य है|
जैसा कि बात इन हालातों तक न  पहुँचे इसके लिये सर्वप्रथम इस  सोच को ही नकारना होगा कि “बेटियाँ पराया धन है| “
दूसरा उनकी उचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध होना चाहिये और विवाह पूर्व उन्हें आत्म-निर्भर अवश्य बनाएँ ताकि भविष्य में कभी ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हों तो वे स्वयं उसका सामना करने में सक्षम हों और अपने लिये एक नई और सही राह का चुनाव कर सकें| उन्हें आत्महत्या जैसे संगीन कदम न उठाने पड़े |
‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान चल तो रहे हैं सरकार की ओर से पर क्या सही मायनों में बेटियाँ सुरक्षित हैं?
अब भी कई जगहों पर भूख और ग़रीबी के कारण बेटियों को कम उम्र में ब्याहने के नाम पर अपनी उम्र से दोगुने उम्र के लड़के के साथ ब्याह दिया जाता है|
कम उम्र में ब्याह न करने का कानून पास तो किया गया है पर केवल उल्लंघन करने के लिये| गाँवों में अब भी छोरियों को छोटी आयु में ही ‘बालिका वधू’ बना दिया जाता है| हँसने-खेलने के दिनों में ही ये अन्याय करके उनके भोले बचपन को रौंद दिया जाता है|
कन्या भ्रूण हत्या तो वर्षों से चली आ रही है| कुछ अपवादों को छोड़कर अब भी यही मानसिकता पल रही है कि यदि दो लड़कियाँ पैदा हो जाएं तो बेटे के लिये तीसरा अटैम्ट लिया जाता है| क्यूँकि वंश तो बेटों से ही आगे बढ़़ता है ना| किसने कहा ये ….जब बेटियाँ ही वंश को आगे बढ़ाने का आधार हैं तो क्यूँ नही समाज बेटों की विदाई करता? बेटियों से भी वंश-वृद्धि हो सकती है| जब तक इस हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सोच को नही बदला जायेगा तब तक बेटियों की दुर्गति इसी प्रकार होती रहेगी|
ऐसा नही है कि इस कुप्रथा के दमन हेतु प्रयास नही हुए|
बालविवाह को रोकने के लिये कई लोग आगे आये जिनमें राजाराम मोहन राय और  केशबचन्द्र सेन का नाम प्रमुख है| इन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा एक बिल पास करवाया जिसे Special Marriage Act कहा जाता हैं इसके अंतर्गत विवाह के लिए लडकों की उम्र 18 वर्ष एवं लडकियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गयी थी जिसेप्रतिबंधित करवाकर  Child Marriage Restraint  नामक बिल पास किया गया इसमें लडको की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष और लडकियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष  कर दी गयी।
भारत में भी सरकार द्वारा भी बाल विवाह रोकने के कई प्रयत्न किये गए और कई क़ानून बनाये गए जिस से कुछ  सुधार अवश्य आया परन्तु ये पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ। सरकार द्वारा कुछ क़ानून बनाये गए हैं जैसे बाल-विवाह निषेध अधिनियम 2006 में बाल विवाह को आंशिक रूप से रोकने के स्थान पर इस पर सख्ती से प्रतिबंधित लगाया गया है। इस कानून के अन्तर्गत युवा अपनी इच्छा से वयस्क होने के दो साल के अन्दर अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकते है।
समाज कितना भी आधुनिक हो गया है पर सोच वही पुरानी है| लकीर के फकीर का राग अलापना बंद करना होगा|  हमारे देश के घर-घर में जब तक बेटी बेटों के समान स्वच्छंद और स्वतंत्र नही होगी,उन्हें समान रूप से जीने का अधिकार नही मिलेगा|
आज बेटियों ने सास-ससुर के साथ अपने माता-पिता को संभालने की जिम्मेदारियाँ निभाई है| फिर उनके अस्तित्व,उनकी क्षमता पर ये प्रश्नचिन्ह क्यूँ? कुछ इस प्रकार का बदलाव लाने की आवश्यकता है कि लड़कियों को ये महसूस न हो कि उन्हें बंदीगृह भेजा जा रहा है| है ना कितना हास्यास्पद कि उम्र कैद की सज़ा देते वक्त कितना सजाया-सँवारा जाता है लाडो को जैसे कोई बलि का बकरा हो| बेटियों की विदाई ग़लत नही पर बेटियाँ पराई भी तो नही है ना!