China से India का युद्ध हुआ तो क्या होगा?

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रूस यूक्रेन की तरह अगर कभी भारत को किसी के साथ युद्ध के लिए मजबूर होना पड़ा तो क्या होगा.

साफ़ तौर पर देखें तो एक ही देश है जो भारत को युद्ध के लिए उकसा रहा है और वो है चीन. पाकिस्तान की न हिम्मत है न हैसियत. पाकिस्तान भारत को ललकारने की बात सोच भी नहीं सकता. ऐसे में चीन ही बचता है जो भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है.

दुनिया चीन को विश्व की महाशक्ति के रूप में जानती है और चीन भी यही मानता है. लेकिन मानने और जान्ने से भी बड़ी बात होती है होना. जो सच होता है वो अक्सर दिखाई नहीं देता.

ऐसे में अगर किसी को ये लगता है जो शायद चीन को लगता होगा कि भारत पर चीन आक्रमण करेगा तो भारत पर भारी पड़ेगा. लेकिन सच तो ये है कि ये सच नहीं है.

तथ्यों के कठोर धरातल का सत्य कुछ और ही कहानी कहता है. आपको अचम्भा नहीं होना चाहिए ये सुन कर कि भारत के लिए चीन को हराना उतना ही आसान होगा जितना पाकिस्तान को हराना. और सत्य ये भी है कि भारत सही भारत के सभी मित्र भी इस सत्य से परिचित हैं.

अमेरिका भी जानता है और यूरोप को भी पता है कि चीन पर भारत भारी पड़ेगा पर हैरानी की बात ये भी है कि चीन को ये बात पता नहीं है. इसलिए ही वो लगातार भारत की सीमा पर हिमाकत करके युद्ध की स्थिति बनाने पर तुला हुआ है.

बात करते हैं भारत के साथ चीन के पिछले युद्ध की. वो युद्ध युद्ध नहीं था, वो एक धोखा था जहां पर एक तरफ माओ जैसा एक दगाबाज़ डिक्टेटर था जिसने मित्रता की आड़ में भारत को छूरा घोंपा था तो दूसरी तरफ एक नरमदिल प्रधानमंत्री, जवाहल लाल नेहरू, इसलिए बेहतर हो कि हम उस युद्ध को युद्ध न मानें – वो एक धोखा था और अक्सर धोखेबाज़ कामयाब हो जाते हैं.

उस समय का भारत तैयार नहीं था न ही किसी युद्ध के लिए और न ही आत्मसुरक्षा के लिए. भारत के पास कोई अपना खुफिया तंत्र विकसित नही था. आकाशीय युद्ध के क्षेत्र में हम नहीं के बाराबर ही थी. नेहरू के भारत के पास कोई भी सैन्य नीति नहीं थी. ऐसे भारत के लिए युद्ध की बात करना बेमानी है. इसी कारण भारत हार गया और चीन फूला न समाया.

पर आज का भारत नेहरू का नहीं, मोदी का भारत है. आज का भारत पिचहत्तर साल आगे वाला भारत है. और आज का भारत पिछलग्गू या चुप्पा-शरीफ नहीं -आगे चलने वाला, तन का खड़े होने वाला और आँखों में आँखें दाल कर बात करने वाला भारत है.

आज चीन भारत से जीत जाएगा ये एक शुद्ध ग़लतफ़हमी है. भौगोलिक रूप से देखिये तो चीन भारत की तरह संगठित देश नही है और इस कारण ही अंदरूनी तौर पर चीन मजबूत नहीं है. असली चाइना तो मेनलैंड चाइना है बाकी सारा इलाका उसने कब्जा करके हड़पा हुआ है. और इस क्षेत्र के लोग चीन के लिए जंग नहीं लड़ेंगे क्योंकि वे खुद चीन से त्रस्त हैं.

आज लद्दाख और उसके आसपास के भयानक सर्दी वाले इलाके इलाके चीनी सैनिकों के लिए मुश्किल इलाके हैं. यहां की सर्दी चीनी सैनिकों को बर्दाश्त नहीं हो पाती. आज यहां पर भारत की सेना डट कर खड़ी है जबकि 1962 में यहां पर भारतीय सेना नहीं थी इसलिए चीनी सेना आसानी से भारत के अंदर घुस गई थी.

आज हालत ये है कि चीन भारत के खिलाफ तिब्बत को अपना मुहरा बना रहा है. चीन तिब्बत के लोगों को भारत के खिलाफ लड़ना सिखाना चाहता है और इसके लिए वो उनसे अपील भी कर रहा है. चीन को डर है कि भारत और अमेरिका इस क्षेत्र से ही चीन पर आक्रमण करेंगे.

चीन नाटक चाहे जितने करे और दिखावे कितने भी दिखाए पर चीनी सैनिकों का युद्ध के लिए तैयार न हो पाना उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है. उसके सैनिकों में न उत्साह है और न पर्याप्त ऊर्जा क्योंकि वे भाड़े के सैनिक है जिनको पता है कि वे पैसे के लिए सेना में हैं, देश के लिए नहीं.

गलवान घाटी की आमने सामने की लड़ाई आपको याद ही होगी. बिना गोला बारूद के हुई इस लड़ाई में किस तरह तोडा है भारतीय सैनिकों ने चीनियों को वो उनको आज भी याद होगा. हमारे बीस मरे थे तो उनके हमने चालीस से ज्यादा मारे थे. भारत के सैनिकों के मांस में युद्ध की दृढ़ता और भुजाओं में शक्ति है जो चीन के सैनिकों के भीतर नहीं है.

चीन की एक और परेशान है और वो भी उसकी सेना है अर्थात उसकी जलसेना. हिन्द महासागर में स्थिति ये है कि म्यांमार ने चीन को अपना एक द्वीप दे दिया है और उधर श्रीलंका ने भी हंबनटोटा चीन को गिफ्ट कर दिया है लेकिन हंबनटोटा का एयरपोर्ट भारत के पास है. इस हालत में भारत जल मार्ग से देश को सुरक्षित रखेगा और युद्ध की स्थिति में भारत चीन को हिन्द और अरब महासागर में रोक देगा तब चीन के लिए बचने का रास्ता ढूंढना मुश्किल हो जाएगा.

भारत चीन के विरुद्ध अपनी विदेश नीति सुनुयोजित ढंग से मजबूत कर रहा है और शरलंका बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से संबंध सुदृढ़ कर रहा है. श्रीलंका की हालत खराब है और ऐसे में भारत उसे भोजन देकर उस पर उपकार भी कर रहा है और उसे अपना भी बना रहा है. ऐसे में अपनी मदद के बदले भारत को श्रीलंका से ये शर्त भी स्पष्ट कर देनी होगी कि अब से श्रीलंका भारत का प्रतिनिधि बन कर ही आगे बढ़ेगा. भारत को इस तरह की अपनी जरूरी शर्तों को श्रीलंका के साथ पक्का कर लेना होगा.

और आगे चल कर भारत को इसी नीति पर म्यांमार और बांग्लादेश के साथ भी व्यवहार करना होगा. इससे सीधा लाभ ये होगा कि भारत दक्षिण एशिया में चारों तरफ से इतना मजबूत हो जाएगा कि चीन के लिए भारत को घेरना मुश्किल हो जाएगा और भारत पूरी तरह से आक्रामक हो कर इन देशों को अपने लिए इस्तेमाल कर सकेगा. और युद्ध के सुख दुःख में ये देश भी भारत के बराबरी से भागीदार बनें और भारत मूल रूप से एक वृहद दक्षिण एशियाई अस्तित्व में दिखाई दे.