अध्यात्म कथा-3: विचार शक्ति से क्या कुछ होता है?

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दार्शनिक दृष्टि से देखा जाये तो विचार-शक्ति सृष्टि की अवधारणा का बीज रूप है. सामान्यजन प्रायः प्रश्न करते हैं कि विचार की शक्ति से क्या कुछ होता है? दूसरे शब्दों में कहें तो विचार की शक्ति के विश्लेषण की मांग की जाती है उत्सुक सुधिजनों द्वारा। वे ये भी जानना चाहते हैं कि विचार शक्ति मूर्त रूप से कार्य कर सकती है या अमूर्त रूप से – अथवा दोनो रूपों में?
इसका एक दृष्टान्त महाशय स्वेट मॉर्डन ने अपनी पुस्तक पीस,पावर एंड प्लेंटी में देखने में आता है। एक बूढ़े पादरी का वर्णन किया है जिसके वास्तविक दाँत निकल चुके थे। कृत्रिम दाँतो का पूरा जबड़ा उसके मुंह में रहता था।रात को वह दाँतो को निकालकर एक गिलास या प्याले में रख देता और प्रातः फिर से मुँह में लगा लेता।
एक दिन जब प्रातः ही पादरी साहब उठे तो पेट में उनको कुछ पीड़ा महसूस हुई। स्वभाव के अनुसार उन्होंने हाथ बढ़ाया कि दांतों को मुंह में लगा लें,किंतु दांत वहां थे नहीं। पादरी साहब को ध्यान आया कि रात के समय दांतो को मुंह से निकलना भूल गये। वे पेट के अंदर चले गए, उनके ही कारण पेट में पीड़ा होती है।
इस विचार के आने पर ही पादरी साहब चिल्लाने लगे। साथ वाले कमरे से उनकी पत्नी दौड़ती आई; बोली —“क्या हुआ ?”
पादरी साहब करहाते हुए बोले —“रात को में दांत निकलना भूल गया और वे चले गये पेट में।अब वे मेरी आंतों को काटे डालते हैं,मैं मरे जाता हूँ!”
पत्नी ने घबरा कर डॉक्टर को बुलाया । सारी बात सुनकर डॉक्टर ने कहा यह तो सर्जन का केस है। पादरी साहब को अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल के डॉक्टरों ने सारी बात सुनकर कहा—“साहब, इतने बड़े दांत गले के अंदर कैसे चले गए? मनुष्य का गला है हाथी का गला तो है नहीं!”
पादरी साहब ने करहाते हुए कहा —” आप क्या जाने? पीड़ा मुझे हो रही है और आप उपहास कर रहे हैं!”
जिस तन लागे, सो तन जाने, को जाने पीर पराई !
डॉक्टरों ने कहा—” अच्छा भी, ऑपरेशन करके देखते हैं। ऑपरेशन की कोठरी में जाकर पादरी साहब को लिटा दिया। सारे शल्य-यंत्र तैयार कर लिए गए, क्लोरोफार्म मंगा लिया गया, किंतु इससे पहले की डॉट खोलकर पादरी साहब को क्लोरोफार्म सुंघाया जाता, अस्पताल का चपरासी दौड़ता हुआ आया ; बोला —” यह तार आया है।”
डॉक्टर ने खोलकर पढ़ा। पादरी साहब की पत्नी ने अपने पति के नाम भेजा था और लिखा था—” तुम्हारे दाँत बिल्ली उठा कर ले गई थी, चौथे कमरे में मिल गए हैं।”
तार पढ़कर डॉक्टरों के होंठों पर तो हँसी खिलनी ही थी, पादरी भी अपना दर्द भूलकर एकदम उठ बैठा। कहने लगा —” जबसे मैं इस मेज़ पर लेट हूँ, पेट की पीड़ा कम होने लगी है और अब तो बिल्कुल भी नहीं है।”

(सुनीता मेहता)

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