अध्यात्म कथा-८ : स्वार्थवश किया गया क्रोध आपका सबसे बड़ा शत्रु है !

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महाराजा रणजीतसिंह के जरनैल सरदार हरिसिंह नलवा कश्मीर में थे,जब उन्हें महाराजा का संदेश मिला कि पठानों की फौजें अटक के पर पहुंच गई हैं और वहां पहुंच कर उन्हें हटाओ।
सरदार हरिसिंह नलवा तेज़ी से कश्मीर से अटक की ओर बढ़े, वे गढ़ी हबीबुल्लाह के मार्ग से एबटाबाद की ओर बढ़ रहे थे कि दोमेल के निकट रहने वाले पठानों ने मर्ग देने से मना कर दिया।
नलवा ने कहा—” तुम क्या चाहते हो? तुम्हारे साथ मुझे लड़ना नहीं है।”
पठानों ने कहा— ” लड़ना हम भी नहीं चाहते, लेकिन हमारी शर्तें माने बिना आप आगे भी नहीं जा सकते।”
सरदार हरीसिंह नलवा ने सारी बात को मज़ाक समझा; पूछा—” क्या शर्तें हैं ?”
पठानों ने कहा —” आज शाम को हम आपस में फैंसला करके बतायेंगे।”
नलवा ने कहा—” कोई बात नहीं, आप शाम तक बताओ ।हम कल जायँगे।” परन्तु जिस बात को नलवा ने मज़ाक समझा था ,वह उनके लिए समस्या बन गई। शाम हो गई, कोई शर्त नहीं बताई गई,
दूसरा दिन भी बीत गया, फिर तीसरे दिन भी कोई संदेश नहीं आया, पठान मार्ग रोके खड़े थे। नलवा जी उनसे बिना लड़े आगे बढ़ना चाहते थे और समय व्यतीत हुआ जा रहा था। हरीसिंह चकित थे,करें तो क्या करें?
एक रात वे सो रहे थे कि ठप ठप की आवाज़ सुनकर जाग गए।पास खड़े पहरेदार से पूछा— यह आवाज़ कैसी है ?
पहरेदार —” साहब, वर्षा हो रही है।”
हरिसिंह —” वर्षा की आवाज मैं भी सुनता हूं, परन्तु यह ठप ठप क्या हो रहा है ?”
पहरेदार—” सरकार, सब लोग अपनी छतों पर चढ़कर मिट्टी को कूट रहे हैं। इस प्रदेश की मिट्टी ही ऐसी है कि कूटे पीटे बिना ठीक नहीं रहती।”
हरिसिंह चोंककर बोले —” क्या कहा तुमने? एक बार फिर कहो तो!”
पहरेदार— “सरकार, इस इलाके की मिट्टी ऐसी है कि बिना कूटे पीटे दुरुस्त नहीं होती।”
नलवा जी हंसकर बोले — ” यह मेरी ही गलती थी कि इस मिट्टी की विशेषता को मैं समझ नहीं पाया। सेना को आज्ञा दो की इसी समय पठानों पर आक्रमण कर दो।जो जहां मिले, उसको वहीं पीट डालो!”
थोड़ी देर में हर ओर मार-पीट होने लगी।प्रातःकाल होने से बहुत पहले कितने ही पठान गर्दनों में पल्लू डाले उनके पास आये। हरीसिंह गर्जकर बोले —“क्या चाहते हो ?”
पठानों ने सिर झुकाकर कहा—“कुछ नहीं श्रीमान!”
हरिसिंह बोले —” क्या शर्तें हैं तुम्हारी ?”
पठानों ने कहा—“सरकार, कोई शर्त नहीं। मार्ग साफ है। आप जाइये ,कोई आपको रोकेगा नहीं।”
यह है ठीक और उचित क्रोध जो घर से बाहर और देश की रक्षा के लिए, उसकी स्वतंत्रता के लिए और धर्म की रक्षा के लिए किया जाये! ऐसा क्रोध आत्मदर्शन के मार्ग में रुकावट नहीं।
जो रुकावट है वह क्रोध जो घर में, किसी स्वार्थ हेतु किया जाये। इस क्रोध घर को , परिवार को, जाति को, देश को अर्थात समूल नाश कर देता है। ऐसा क्रोध बुद्धि को नष्ट कर देता है ,जब बुद्धि नष्ट हो जाये तो सर्वनाश हो जाता है।
(सुनीता मेहता)

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