अध्यात्म कथा -4 : क्रोध मत करो !

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युधिष्ठिर  और उनके भाई गुरुजी के पास गये तो गुरु महाराज ने पहले दिन का पाठ दिया —” क्रोध मत कर ।”
सबने पढ़ा और गुरुजी ने लिखवाया भी। फिर बोले जाओ अब इसको याद करो, कल  मैं  सुनूंगा।
दूसरे दिन सब बच्चे गुरुजी के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा —” सुनाओ कल का पाठ!”
सबने कल का पाठ सुना दिया —“क्रोध मत कर।’ परन्तु युधिष्ठिर ने नई सुनाया ।
गुरुजी ने पूछा —“युधिष्ठिर! तुझे पाठ याद नहीं हुआ?”
बालक युधिष्ठिर ने कहा— ”  नहीं गुरुदेव! अभी तो नहीं हुआ !”
गुरुजी ने कहा—” कैसा मूर्ख है तू! सबसे बड़ा है, सबसे अयोग्य। जा, कल  अवश्य स्मरण करके आना!”
युधिष्ठिर बोला—” प्रयत्न करूँगा गुरुदेव !”
दूसरा दिन आया तो युधिष्ठिर ने फिर कहा  गुरुजी मुझे यह पाठ याद नहीं  हुआ है !”
गुरुजी ने कड़ककर कहा— “अरे! तेरी बुद्धि घास खाने गई है क्या? तीन शब्दों का पाठ तुझे याद नहीं हुआ?” और उन्होंने एक चपत भी मार दी उसके मुँह  पर।
युधिष्ठिर ने अपना गाल सहलाते हुए कहा – “मैं प्रयत्न करूँगा गुरुजी!”
तीसरे दिन युधिष्ठिर के सामने आते ही गुरुजी ने पूछा – “क्यों, हो गया याद?”
युधिष्ठिर सिर झुकाकर—“नहीं गुरुजी अब भी याद नहीं हुआ।”
गुरुजी ने तीन – चार  चपत उसके मुंह पर लगा दिए । गरजकर बोले – “तू प्रयत्न ही नहीं करता। कल यदि पाठ याद नहीं हुआ तो चमड़ी उधेड़ लूंगा।”
युधिष्ठिर ने पहले की भांति सिर झुकाकर कहा — “मैं प्रयत्न करूँगा।”
फिर वह दुर्योधन आदि  के पास गया, देखा उनकी गालियाँ, ताने आदि सुनकर क्रोध आता है कि नहीं? यह समझ में आया कि कुछ कुछ आता है।
चौथे दिन गुरुजी ने फिर पूछा ?, युधिष्ठिर ने हाथ जोड़ कर सिर झुका दिया, धीरे से बोला – ”नहीं गुरुजी, अभी पूर्णतया याद नहीं हुआ। बस कुछ ही याद हुआ है।”
गुरुजी ने चपत के बाद चपत मारने शुरू कर दिए। युधिष्ठिर खड़ा  मुस्कुराता रहा। गुरुजी हाँफने लगे। थककर रुके तो युधिष्ठिर को मुस्कुराते देखा। आश्चर्य से बोले – ”तू अब भी मुस्कुरा रहा है?”
युधिष्ठिर ने कहा- “आपने ही तो  सिखाया था गुरुजी, कि क्रोध मत कर। अब मैं कह सकता हूँ  आपका सिखाया पाठ मुझे याद हो गया है।”
गुरुजी ने युधिष्ठिर को आगे बढ़कर गले से लगा लिया, वे बोले – ”तू इस पाठ को सदा से जानता था, मैं ही भूल गया था, तुम पास हो गए हो मैं फेल हो गया हूँ।”
क्रोध मत कर जीवन की पहली शिक्षा है जो हमें दी जाती है
इससे आवश्यक शिक्षा शायद कोई नहीं है,ये बाद चाण्डाल होता है, किन्तु यह किसी को याद नहीं रहती, हम सब इसमें फेल हैं।
(सुनीता मेहता)

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