अध्यात्म कथा-15 : सब छोड़ो, सत्संग न छोड़ो !!

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महर्षि दयानंद जिन दिनों जेहलम में थे, उन दिनों वहां महता अमीचंद जी बहुत सुंदर भजन गाया करते थे, परंतु मूल रूप से थे वे शराबी और उनका आचार भी कुछ बिगड़ चुका था।
महता अमीचंद नित्य स्वामी जी के पास आया करते थे। एक दिन महता अमीचंद ने प्रभु भक्ति का बहुत ही मनोहर गाना गाया। स्वामी जी ने सुना तो कहा -अमीचंद, तुम हो तो हीरे ,परंतु कीचड़ में गिर पड़े हो।”
बस तीर चल गया, निशाना बैठ गया था। उसी समय से महता अमीचंद का जीवन पलट गया।
महता ने मदिरा छोड़ दी और व्यभिचार को महापाप समझने लगे। इतना ही नहीं महता अमीचंद सचमुच ईश्वर के सच्चे भक्त बन गए।
ये उनके भीतर के संस्कार थे कि महर्षि दयानंद के एक वाक्य ने उनके जैसे एक शराबी व्यभिचारी का जीवन परिवर्तित कर डाला और उसे शुद्ध आचार विचार वाला भक्त बना दिया।
इसलिए कहा जाता है कि सब कुछ छोड़ दो किन्तु सत्संग कभी न छोड़ो। सत्संग से जुड़े रहो और सज्जन बनने की दिशा में निरंतर प्रयत्नशील रहो। बस उसके बाद तो मात्र प्रतीक्षा ही करनी है उस घड़ी की जब आपका भाग्योदय हो जायेगा।
कबीर दास ने सीधे सादे शब्दों में इस गंभीर बात को कहा है
कबिरा संगति साधु की, नित्य प्रति कीजिए जाए।
दुरमति दूर बहावसी ,देसी सुमति बताय।।
(सुनीता मेहता)

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