अध्यात्म कथा -17 : जब अंतःकरण शुद्ध हुआ

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मथुरा में बाल ब्रह्मचारी तेज से भरपूर स्वामी दयानंद पाखंड के जुल्मों को गिराए जाते थे। प्रतिदिन शास्त्रार्थ होते थे। प्रतिदिन उनके विरोधी हारते थे ,दांत पीसते थे वे  कि  यह साधु कल मथुरा में हम से ही पढ़कर गया था आज हमारी ही पोल खोले देता है। हमारी अधूरी जानकारी पर भारी पड़ता है। शास्त्रार्थ में हमसे हारता नहीं, इसे हराने का कोई और उपाय करना चाहिए।
उपाय सोचा गया ,वे लोग एक वैश्या के पास गए ,सुंदर थी वह  उससे बोले हम तुझे बहुत से आभूषण देंगे। अमुक उद्यान में दयानंद रहता है ।तू उसके पास जा उसके पास जाकर कोलाहल मचा देना कि इसने मुझे छेड़ा है हम निकट ही छिपे रहेंगे और बाहर निकल डंडे से उसे अधमरा कर देंगे। दयानंद के बाहर निकल जाने पर तुम्हें और रुपया देंगे ।”
वैश्या ने यह बात मान ली। अपने आपको खूब सजाकर कितने ही आभूषण धारण करके वहां गई जहां ब्रह्मचर्य और आत्मा के तेज से चमकते हुए स्वामी दयानंद बैठे थे एक वृक्ष के नीचे आंखें मूंदकर ध्यान मग्न।
वेश्या ने उनको दूर से देखा तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे आधे पाप धुल गए हैं। निकट गई तो शेष आधे भी धुल गए और अधिक निकट जाने पर अंतःकरण भी पवित्र हो गया। एक चीख उसके मुख से निकल गई। बाल ब्रह्मचारी ने आंखें खोल दी, बोले -“मां कौन हो ?”
“मां ” का शब्द सुनते ही उसका हृदय भर आया। आंखें डबडबा गई अश्रु भरी आंखों से उसकी ओर देखकर अपने आभूषण उतारने लगी। महर्षि ने फिर कहा-” मां तुम कौन हो? अपने बेटे से क्या लेने आई  हो ?”
स्त्री  ने सिसकते हुए कहा—“क्षमा मांगने आई हूं महात्मा! इन आभूषणों ने मुझे अंधा कर दिया था, इनकी मुझे आवश्यकता नहीं।
उसने रोते हुए उसने सारी कहानी महर्षि को सुना दी। महर्षि ने गंभीरता से कहा—“मां, ईश्वर ने जो श्रेष्ठ बुद्धि इस समय दी है, वह सदा बनी रहे यही मेरा आशीर्वाद है।
इस स्त्री के  पाप  भरे मन को बदल डाला महर्षि की पवित्र  आत्मा की शक्ति ने। आत्मा की शक्ति जिनके अंदर जाग उठती है उसके समक्ष एटम बमों और हाइड्रोजन बम की शक्ति भी हार जाती है
(सुनीता मेहता)