अध्यात्म कथा -19 : जैसा अन्न वैसा मन

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email
भीष्म पितामह  शर-शैय्या पर लेटे हुए थे। महाराज युधिष्ठिर उनसे धर्म उपदेश ले रहे थे। धर्म की बड़ी गंभीर और लाभदायक बातें वे कह रहे थे। तभी द्रौपदी ने कहा—” पितामह ! मेरा एक प्रश्न है, आप आज्ञा दें तो पूछूं?”
भीष्म बोले— ” पूछो बेटी ! तुम भी एक प्रश्न पूछो, मैं उत्तर दूंगा।”
द्रौपदी ने कहा — ” महाराज ! प्रश्न पूछने से पूर्व क्षमा चाहती हूं। मेरा प्रश्न कुछ टेढ़ा है बहुत अच्छा न लगेगा आपको, अगर बुरा लगे तो रुष्ट ना होना।
भीष्म बोले —” नहीं बेटी ! मैं रुष्ट नहीं होता ,तुम जो भी चाहो पूछो।”
द्रौपदी ने कहा —” पितामह ! आपको स्मरण है, जब दुर्योधन की सभा में दुशासन मुझे नग्न करने का यत्न कर रहा था तो मैं रो रही थी , चिल्ला रही थी आप भी वहां उपस्थित थे ! आपसे भी मैंने  सहायता की प्रार्थना की थी । आज आप ज्ञान और ध्यान की बड़ी-बड़ी बातें कह रहे हैं । उस समय आपका यह ज्ञान और ध्यान कहां गया था ? उस समय एक अबला का अपमान आपने कैसे सहन किया?  उसकी पुकार को क्यों नहीं सुना?”
भीष्म बोले —” तुम ठीक कहती हो बेटी ! उस समय में दुर्योधन का पाप भरा अन खाता था। वह पाप मेरे शरीर में समाया हुआ था ; रक्त बनकर मेरी नसों में दौड़ रहा था। उस समय मै चाहने पर भी धर्म की बात नहीं कह सका । अब अर्जुन के तीरों ने उस रक्त को निकाल दिया है। पर्याप्त समय से मैं शरों की शैया पर पढ़ा हूं। पाप का  अन्न शरीर से निकल गया है , इसलिए धर्म की बात कहने लगा हूं।”
यह है अन्न का प्रभाव जैसा अन्न वैसा मन । जैसा आहार, वैसा विचार।
जैसा अन्न जल खाइये, तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिए, तैसी वाणी होय ।।

 

https://newsindiaglobal.com/news/trending/why-man-is-crying-over-deaths-of-his-own-people-when-he-has-been-enjoying-killing-others/15506/