Adhyatma Katha-22 : गिराओ नहीं, उठाओ!

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एक किंग कोंग है। मैं कश्मीर में था वह भी वहीं था। मैंने अपनी कथा में एक दिन कहा मनुष्य को थोड़ा खाना चाहिए। थोड़ा खा कर उसे पचाकर शक्ति में परिवर्तित करके उसे कार्य लेना चाहिए।
मेरी कथा समाप्त हुई तो एक युवक ने मेरे पास आकर कहा — “स्वामी जी, आप तो थोड़ा खाने के लिए कहते हैं, परंतु उस किंग कोंग को देखिए वह तो बहुत खाता है। “
मैंने पूछा — “क्या खाता है ?”
उस युवक ने बताया कि प्रातः काल वह दो बड़ी डबल रोटी के टोस्ट खाता है, इनके साथ एक बाल्टी चाय पीता है, तब एक दर्जन अंडे और एक पाव मक्ख़न खाता है। “
मैंने कहा— ” हे मेरे भगवान ! यह व्यक्ति क्या अब तक जीवित है ?”
वह बोला — ” जीवित क्यों नहीं! और फिर यह तो अभी प्रातः काल हुआ। इसके पश्चात दोपहर को भी खाता है शाम को भी, रात को भी। दोपहर के भोजन में दो मुर्गे केवल चटनी के रूप में खाता है ।”
मैंने कहा —” इतना खाकर वह करता क्या है ?”
उसने कहा — ” दूसरों को गिराता है।”
मैंने कहा — ” बस गिराता ही है ना, उठाता तो नहीं किसी को ?”
जिस भजन से दूसरों को गिराने की शक्ति मिले , वह तो ठीक नहीं उसका कोई लाभ नहीं !जो दूसरों को गिराता है, वह स्वंय भी गिरता है!