Adhyatma Katha-29: जाको राखे साईंया मार सके न कोय !

 बिहार में भूकंप आया तो मैं कोलकाता में था ।महात्मा हंसराज जी का तार वहां पहुंचा कि बिहार में पहुंचो । देखो कि सहायता और सेवा का कार्य कैसे करना है। पंडित ऋषि राम जी और सेठ दीपचन्द  पोदार के परिवार के श्री आनंदी प्रसाद को साथ लेकर मैं बिहार पहुंचा।
मुंगेर के नगरों में जाकर देखा तो वहां हजारों लोग दब गए हैं। दोपहर के समय भूचाल आया दुकानें खुली थी । ग्राहक दुकानों से सामान खरीद रहे थे। भूकंप ने सबको गिरती दीवारों और छतों के नीचे दबा दिया उनमें दुकानदार भी दब गए और ग्राहक भी।
मलबे को हटाने का कार्य प्रारंभ हुआ तो पहले दिन कुछ लोग जीवित निकले , कुछ घायल निकले , कुछ सिसकते हुए , कुछ ठीक निकले। तीसरे चौथे दिन भी कुछ लोग जीवित निकले ,  बाकी केवल लाशें।
ज्यों-ज्यों  दिन बीतते गए , त्यों-त्यों लाशें मिलने लगीं । सोलहवें  दिन एक मकान का मलबा उठाया गया, तो एक आदमी बिल्कुल अच्छा भला , बिल्कुल जीवित निकल आया ।
उसे देखकर हम सब कुछ आश्चर्यचकित हुए। किस प्रकार ईश्वर – विश्वास हमारे ह्रदयों में झूमके जाग उठा ,यह तो हम ही जानते हैं। हमने उससे पूछा इतने दिन कैसे जीवित रहा?
वह बोला — ” मैं केले बेचता हूं। केलो का ढेर अपने पास रखे बैठा था कि पृथ्वी हिल उठी। छत का शहतीर मेरे ऊपर आ गिरा बाकी छत उसके ऊपर आई , इसलिए मुझे चोट नहीं लगी। तभी एक बार पृथ्वी फिर हिली । मेरे ऊपर गिरे मलबे में से एक ओर से हवा आने लगी पता नहीं किस ओर से, परंतु उसने  मुझे मरने से बचा दिया ।तभी पृथ्वी एक बार  फिर हिली , दुकान का फर्श टूट  गया ।उससे पानी उछल पड़ा । इतने दिनों तक मैं इस पानी को पीकर और केले खाकर जीवन व्यतीत करता रहा । कल केले  समाप्त हो गए । आज पानी थोड़ा रह गया । मैंने समझा कि मैं  नहीं बचूंगा ! परंतु तभी मलबे के ऊपर से कुदालें चलने  की आवाज आने लगी, आपने मुझे बाहर निकाल लिया। “
इस व्यक्ति को देखकर मेरे ह्रदय ने पुकार कर कहा :—
 जाको राखे साइयां मार सके ना कोई ।
 बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय।।