अध्यात्म कथा-6: दान की पराकाष्ठा

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भारत भूमि सदा से दानियों की संवेदनाओं के साथ फूली-फली है। आज के समय में अंग-दान, वीर्य दान, कोख दान अपने चरम पर है और कोई सहायतावश और कोई स्वार्थवश यह कार्य करता है, आज के सामाजिक परिवेश में यह देहदान आवश्यकता बन गई है।
इस से पूर्व दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा थी जो कहीं कहीं आज भी दृष्टिगोचर होती है । माता-पिता की आज्ञा से केवल ईश्वर सेवा का लाभ निहित था। जिसको कि स्वार्थवश महंतों आदि ने कुरूप व विभीत्स रूप प्रदान किया। यह भी एक प्रकार का कन्यादान है।
आम्रपाली को नगरवधू के रूप में दिया जाना भी समाजहित का उदाहरण है यदि उसका विवाह एक ही व्यक्ति से होता तो मरने- मारने की संभावनाएं अधिक थीं।
इसी क्रम में कर्ण का कवच व कुंडल का दान आता है, जो कि यह जानते हुए किया गया है कि रक्षा कवच देने के बाद उनका स्वंय का जीवन समाप्त हो जाएगा।
वैदिक ऋषि थे दधीचि। इनके जन्म के संबंध में अनेक कथाएँ हैं। यास्क के मतानुसार ये अथर्व के पुत्र हैं। पुराणों में इनकी माता का नाम ‘शांति’ मिलता है। इनकी तपस्या के संबंध में भी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। इन्हीं की हड्डियों से बने धनुष द्वारा इंद्र ने वृत्रासुर का संहार किया था। वेद शास्त्रों आदि के पूर्ण ज्ञाता और स्वभाव के बड़े ही दयालु थे।
अहंकार तो उन्हें छू तक नहीं पाया था। वे सदा दूसरों का हित करना अपना परम धर्म समझते थे। उनके व्यवहार से उस वन के पशु-पक्षी तक संतुष्ट थे, जहाँ वे रहते थे। गंगा के तट पर ही उनका आश्रम था। जो भी अतिथि महर्षि दधीचि के आश्रम पर आता, स्वयं महर्षि तथा उनकी पत्नी अतिथि की पूर्ण श्रद्धा भाव से सेवा करते थे।
यूँ तो ‘भारतीय इतिहास’ में कई दानी हुए हैं, किंतु मानव कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने वाले मात्र महर्षि दधीचि ही थे। देवताओं के मुख से यह जानकर की मात्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही असुरों का संहार किया जा सकता है, महर्षि दधीचि ने अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर दिया।लोक-कल्याण के लिये आत्म-त्याग करने वालों में महर्षि दधीचि का नाम आदरसहित लिया जाता है। दधीचि तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति और वैराग्य में इनकी जन्म से ही निष्ठा थी।
कथा कहा जाता है कि एक बार इन्द्रलोक पर ‘वृत्रासुर’ नामक राक्षस ने अधिकार कर लिया तथा इन्द्र सहित देवताओं को देवलोक से निकाल दिया। सभी देवता अपनी व्यथा लेकर ब्रह्मा, विष्णु व महेश के पास गए, लेकिन कोई भी उनकी समस्या का निदान न कर सका। बाद में ब्रह्मा जी ने देवताओं को एक उपाय बताया कि पृथ्वी लोक में ‘दधीचि’ नाम के एक महर्षि रहते हैं। यदि वे अपनी अस्थियों का दान कर दें तो उन अस्थियों से एक वज्र बनाया जाये। उस वज्र से वृत्रासुर मारा जा सकता है, क्योंकि वृत्रासुर को किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता। महर्षि दधीचि की अस्थियों में ही वह ब्रह्म तेज़ है, जिससे वृत्रासुर राक्षस मारा जा सकता है।
इन्द्र ने दधीचि का अपमान किया था, जिसके कारण वे दधीचि के पास जाने से कतरा रहे थे। इन्द्रलोक की रक्षा व देवताओं की भलाई के लिए और अपने सिंहासन को बचाने के लिए देवताओं सहित महर्षि दधीचि की शरण में जाना ही पड़ा। महर्षि दधीचि ने इन्द्र को पूरा सम्मान दिया तथा आश्रम आने का कारण पूछा। इन्द्र ने महर्षि को अपनी व्यथा सुनाई तो दधीचि ने कहा कि- “मैं देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हूँ। फिर दधीचि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी अस्थियों का दान देना स्वीकार कर लिया। उन्होंने समाधी लगाई और अपनी देह त्याग दी।
इस कथा का संदेश-बोध है यह है कि संस्कृति रक्षा के लिए हमारे कर्मयोगी ऋषि-मुनियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया है, संस्कृति रक्षण और जतन के लिये अपनी हड्डियों का खाद करके संस्कृति का संवर्धन किया है। ‘
विषय गंभीर विषय अंतहीन है। कहना यही है कि दान की कोई परिभाषा,स्तर व पराकाष्ठा नहीं है केवल और केवल देना फिर वह किसी भी रूप में हो दान की श्रेणी में आता है।
आज के युग में दान के नाम पर ढोंग का धंधा अपने चरम पर है । दुनिया नर-पिचाशों में बदलती जा रही है। चहुँ दिश मौत का तांडव हो रहा है और सिक्कों की खनक में सिसकियां दम तोड़ रही हैं। आज का मानव उपरोक्त परिभाषाओं को तोड़-मरोड़ कर निज लाभ हेतु किसी भी स्तर पर इस्तेमाल कर रहा है परहित की किसको पड़ी है, सही मायने में “हाथी के दांत खाने के और ,और दिखाने के और चरितार्थ हो रहा है।”
(सुनीता मेहता)

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