Afghanistan: तलबगार Taliban के अब चीन, तुर्की, रूस और कतर भी

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तालिबान ने अफगानिस्तान पर अपना कब्ज़ा पूरी तरह  जमा लिया  है और अमेरीका को काबुल से बाहर  का रास्ता  दिखा दिया है परन्तु अफगानिस्तान पर तालिबान  की मुहर के पश्चात  भी वह अब तक अपनी नये सरकार का ऐलान  नही कर पाया है. बल्कि उससे पहले ही तालिबान ने अपनी ताजपोशी के लिये छ: देशों को न्यौता भी दे डाला है जिसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान की मौजूदगी  तो जग जहिर ही है. इस बार तीन और देश तालिबान  के समर्थन सूची में शामिल  हो गये हैं .अब कुल मिलाकर छ: देश तालिबान  के साथ हैं वे हैं रूस,चीन तुर्की,ईरान, पाकिस्तान और कतर. ये सभी देश तालिबान  द्वारा  आयोजित  उद्घाटन  समारोह  में शामिल  होंगे.

शह और मात का खेल

ध्यान  देने वाली  बात यह है कि तालिबान सरकार के अब कई देशों के  साथ अच्छे संबंध तो बन गये हैं  पर अंदरूनी तौर पर “शय और मात”  की पॉलिसी चल रही है. कब घोड़ा ‘अढ़ाई’ की चाल चल दे इसी फिराक में स्थिति  दोनों ओर से वही है.  अन्य कई देशों से भी तालिबान अपने संबंध स्थापित  करने के प्रयास  में हैं. परन्तु चरमपंथी तालिबान कूटनीति को देखते हुए दुनिया के अधिकाँश देश अब भी ‘वेट एंड वॉट’ की नीति  का अनुसरण कर चल रहे हैं.

तालिबान का समर्थन  क्यूँ? 

यह बात भी सोचने वाली है कि आखिर क्यूँ इस खूँखार तालिबान का  समर्थन को तैयार  है कुछ देश जबकि तालिबान इतिहास  खून से रंगा पड़ा है. इनका समूह कट्टरपंथी से चरमपंथी हो गया.  कितने ही विस्फोट और विमान अपहरण में तालिबानियों की अहम भूमिका रही है. आईये जानते है कुछ ऐसे ही सत्य.

कटोरा खान हैं तालिबान  पर मेहरबान

तालिबान के समर्थक के रूप में उभर कर जो पहला नाम आता है वो है पाकिस्तान. सर्वविदित है कि अफगानिस्तान और अमेरिका स तालिबान का  वर्षों से युद्ध  चला आ रहा है परन्तु पाकिस्तान अकेला  ऐसा देश रहा है जो तालिबान का समर्थन करता आ रहा है.  पाकिस्तान में तालिबान का ‘हेड आफिस’ होना इसकी सबसे बड़ी वजह है कि  विदेशी ताकतें अफगानिस्तान में अपने पैर नही जमा पाती.  पाकिस्तान के केंद्रीय मंत्री ने यह दावा किया है कि “पाकिस्तान, तालिबान का ‘संरक्षक’ रहा है और लंबे वक्त तक उनकी देखभाल की है। पाकिस्तान, तालिबान शासन को मान्यता देने वाला सबसे पहला देश हो सकता है.”

चालाक चीन की रणनीति

अब नम्बर  आता है चीन का जो वैसे भी पतली गली से प्रवेश पाने में माहिर है. अमेरिका के तालिबान से रूखसती के बाद चीन तालिबान  में अपना प्रभुत्व जमाने को बेहद उत्सुक है वहीं अपने देश में उईघुर मुसलमानों को हेंपने में कोई कसर नही छोड़ रखी इस ‘ड्रैगन’  ने. अपने “बेल्ट एंड रोड” प्रोजेक्ट के विस्तार को लेकर अन्य  देशों की प्रॉपर्टी हथियाने की नीति पर चल रहे चालाक चीन अफगानिस्तान को भी इस मसले में एक महत्वपूर्ण कड़ी समझ रहा है परन्तु स्वयं की सुरक्षा और स्थिरता के लेकर उसके मन में भी तालिबान  की “कथनी और करनी” में अंतर को लेकर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा हुआ  ने दावा किया है कि वह अफगानिस्तान में समावेशी सरकार बनाने के पक्ष  में है और हालांकि तालिबान और चीन के कई नेताओं ने कुछ मसलों को लेकर कई बार बातचीत की है.

रूस खेल रहा है लुका-छिपी

रूस भी लगातार तालिबान से संपर्क में है. तालिबान  से हमदर्दी के पीछे रूस का अपना स्वार्थ है.  मॉस्को फॉर्मेट पर चल रहे रूस ने वर्ष  2018 में तालिबान के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक में 12 देशों को होस्ट किया था जिसका मुख्य उद्देश्य अफगानिस्तान में शीघ्र-अतिशीघ्र शांति बहाल करना था.  रूस अफगानिस्तान में बड़े दांव खेलना चाहता है लेकिन इतिहास की सीख से वह बचता नजर आता है। तालिबान के आने से रूस के लिए मध्य एशिया की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई हैं परन्तु रूस तालिबान को समर्थन देने के पूर्व समावेशी अफगान सरकार की प्रतीक्षा  में है. हालांकि ताजा सूत्रों के अनुसार रूसी एएसए और भारत के नेशनल सिक्योरिटी  आफिसर अजित डोभाल के बीच 8 सितंबर को इसी अफगानी  संकट को लेकर  एक अहम वार्ता  होने वाली है जिसके तहत दोनों देश मिलकर इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण फैसले साथ मिलकर लोगों ये उम्मीद  की  जा रही है.

ईरान भी अब तालिबान  की समर्थक 

ऐसे ही ईरान ने अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान छोड़ने से काफी खुश नज़र आ रहा है और अफगानिस्तान  में तालिबान शासन  का अभिनंदन  करने के पक्ष  में है जबकि ईरान और तालिबान के ऐतिहासिक रिश्ते कुछ खास अच्छे नही रहे है. इसकी प्रमुख  वजह शिया-सुन्नी के बीच का संघर्ष रहा है.  ईरान के लिए अफगानिस्तान एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश भी है व्यापारिक  नज़रिये  से.  अमेरिका ने ईरान पर कुछ प्रतिबंध लगाये हैं औरउसी के मध्य व्यापार तथा  अन्य कनेक्टिविटी  को लेकर तेहरान भी ये चाहता है कि काबुल से किसी न किसी रूप से जुड़े रहें.

दल बदलू तुर्की के तेवर

इधर तुर्की भी एक खिलाड़ी  के रूप में सामने आया है.  ‘दल बदलू’ अंदाज़ में पहले नाटो गठबंधन में अमेरिका के साथ रहने वाला तुर्की अब तालिबान सरकार के पक्ष में दिख रहा है.  तुर्की राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन ने ये कहा है कि वे तालिबान शासन कोअपना पूरा सहयोग देगें जबकि इसके पूर्व इसी तुर्की ने तालिबान की कटु आलोचना की थी. तुर्की लगातार तालिबान के साथ जुड़ा रहा है. तुर्की भी अपना फायदा  देखते हुए यह चाहता है कि सुरक्षा, स्थिरता, शरणार्थी संकट आदि गंभीर मसालों के बीच कुछ ऐसा होना चाहिए  कि  दोनों देश लाभान्वित हों. तुर्की  अफगानिस्तान  मार्केट  पर टकटकी लगाये बैठा है कि इस युद्ध से त्रस्त देश में इस मौके का फायदा उठा सके.

कतर रहा है सेंट्रल ट्रांजिट  

कतर के तालिबान से अच्छे संबंध रहे हैं.  कतर न अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा में वार्ता का मुख्य  केन्द्र रहा है. यह सेंट्रल ट्रांजिट हब बन गया है अब काबुल पर तीलिबानी शासन की हुकुमत के पश्चात. कतर अब तक  एक मिडिएटर  की भूमिका  में रहा है.  कतर में स्थायी राजनीतिक कार्यालय वर्ष 2013 में स्थापित किया गया. बता दें कि साल 2020 तक बातचीत का दौर इस दौरान  चलता रहा और अंतत: अमेरिकी सैऩ्यसुरक्षा बलों ने  अफगानिस्तान से विदा ली. काबुल एयरपोर्ट पर तकनीकी सहायक के  रूप में कतर सहयोग दे रहा है तालिबान  को.

अन्य देशों की ” वेट एंड वॉच” पॉलिसी

ये बात भी विचारणीय  है कि  अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन  के पश्चात पाकिस्तान और चीन ही वो देश हैं जिन्होंने काबुल में अपने राजनयिक मिशन को बरकरार रक्खा हुआ है. जबकि अन्य देश ने अपने राजनयिक  केन्द्र काबुल से दूसरी जगह स्थानान्तरित  कर लिये हैं.  अब देखना ये है कि चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, तुर्की और कतर ,सऊदी अरब जिन्होंने तालिबान जैसे देश के शासन को  अपना समर्थन सबसे पहले दिया है उस सूची में कुछ और देशों के नाम और जुड़ते हैं या फिर अन्य देशों द्वारा “वेट एंड वॉट” की नीति अपनाते हुए अफगानी  संकट की सुरक्षा  हेतु कुछ अहम कदम उठाये जाते हैं.