Aim of life: हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?

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हमारा जीवन इस पृथ्वी पर क्यूँ है? क्या प्रयोजन है हमारा इस धरती पर आने का? सिर्फ खाना-कमाना,राग-द्वेषसोना-जागना,काम-लोभ बस यही तो नहीं करने आये हम या कुछ और भी है इसके पीछे का सत्य|प्रश्न कौंधता है मस्तिष्क की शिराओं में कि हमारे अमूल्य जीवन का उद्देश्य क्या है? हमारी मानव सभ्यता का विकास विभिन्न क्षेत्रों में अपने उत्थान पर है परन्तु मृत्यु पर विजय न पा सका मतलब विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली. मानव का हृदय,किडनी सब कुछ प्रत्यारोपण करने में सक्षम है परन्तु इस देह से प्राण निकल जाने का रहस्य आज भी नहीं जान सका.  खैर ये तो मृत्यु  का सत्य है.

ड्रैक इक्वेशन थ्योरी

हमारी मानव सभ्यता का विकास एकदम से नहीं हो गया. इसके पीछे बीस लाख वर्षों का गूढ़ इतिहास है जब मानव की उत्पति हुई थी|सभ्यताएँ आई और गई. हमने तो बचपन में मोहन जोदड़ो,हड़प्पा की सभ्यता के बारे में पढ़ा था पर हाल फिलहाल एक लेख में  “ड्रेक इक्वेशन” के बारे में पढ़ा तो ये मालूम हुआ कि ये सभ्यता समीकरण का आँकलन करने की परिभाषा देती है तो कहने का तात्पर्य ये है कि सभ्यता दर सभ्यता मानव के परिवेश,रहन-सहन,विज्ञान,अर्थ-व्यवस्था का विकास हुआ जिसने जीवन को बेहतर बनाया जो कि मानव मस्तिष्क में संज्ञानात्मक क्रांति के आने से पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित होता चला गया यानि मानव का विकास संज्ञानात्मक क्रांति से मानसिक,शारीरिक और बौद्धिक स्तर पर हुआ है.

जीन और म्यूटेशन

इस क्रांति का सम्बन्ध “जीन” पर निर्भर करता है यानि कुछ शारीरिक संरचना,बिमारीयाँ जेनेटिक होती हैं जो चाहे अनचाहे विरासत में मिल जाती हैं परन्तु जब डी एन ए की कोशिकाओं में रासायनिक तत्वों या वायरस के कारण कोई उत्परिवर्तन जब आ जाता है तो वो स्थाई परिवर्तन होता है और यही से इस क्रांति का जन्म होता है जिसके फलस्वरूप मानव बेहतर से और बेहतर हुआ है. आज सभी क्षेत्रों में मानव ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है तो कुल मिला कर आज तक जितने भी परिवर्तन या बदलाव आये हैं वो “म्यूटेशन” के कारण ही है.

जादुई शक्ति की प्रतीक्षा 

फिर भी हम कई मुद्दों में  फेल हैं जैसे मानवता,अंधविश्वास,धर्म,अराजकता,भ्रष्टाचार. हम लकीर के फकीर बन कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाते हैं कई मुद्दों पर कि कोई चमत्कार होगा, कोई गुमनाम उपग्रह से विमान उतरेगा कोई “जादू” जैसा अजीब प्राणी अवतरित होगा जो हमारी सभी इच्छाओं की पूर्ति कर देगा. मानव-जाति में फैली वैमनस्यता,व्याभिचार,,धार्मिक स्तर पर मतभेद,अंधविश्वास,राजनीति में भ्रष्टाचार इन सबका जादुई छड़ी घुमा कर अंत कर देगा. फिर से सत्य,अहिंसा का शंखनाद पूरे विश्व में गूँज उठेगा. “ओम शांति” के मंत्रोच्चार से ये धरती फिर से पावन हो उठेगी. सबके अन्दर वही “मैं आत्मा” का “अमृत मंत्र” बहने लगेगा.
मतलब इतनी उन्नति और तरक्की करने के बाद भी आज का मानव असहाय,लाचार और बेचारा ही है.

जन्म लेने का वास्तविक प्रयोजन 

हमारा जन्म लेने का प्रयोजन ही मानवता,इंसानियत,परोपकार और दीन-दुखी के प्रति सहयता का व्यवहार,सत्कर्म ही है जो आज के युग के स्वार्थी मानव के कर्म और विचारों से कोसों दूर है.
अंतत: हम ये क्यूँ नहीं मान लेते कि समस्त “विश्व-सत्ता” का मोह बस अज्ञानता की अवस्था है और कुछ भी नहीं!