ऐसी थी मेरी अमृता

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अमृता और इमरोज़ जैसा प्रेम
कौन‌ करता है आज
जानते थे दोनों
मिलन नहीं होगा परन्तु
दोनों अपनी-अपनी
मोहब्ब्त के मुरीद थे
इमरोज़ जानता था
अमृता केवल उसका एक ख्वाब थी
अमृता जानती थी
साहिर उसका
कभी ना पूरा होने वाला सपना था
इमरोज़ और अमृता भी
नदी के दो किनारे जैसे थे
वह नदी, शायद साहिर थी
जो दोनों के बीच बह रही थी
अमृता उस नदी संग बह रही थी
और इमरोज़ भी किनारे-किनारे
अमृता के साथ चल रहा था
परन्तु कुछ तो था
अनोखा,अद्भुत
कुछ पवित्र
जिसकी कसम खा लेने का
दिल करता है
न ऐसा प्रेम किसी ने किया होगा
न हिम्मत किसी में इतनी कि
अमृता जैसा सत्य लिख पाए
हां शायद यही सच्चा प्यार था
उम्र और रिश्तों के
बांध तोड़कर बह गया।
हां यही सच्चा प्यार था जो
अमृता ने किया और लिखा !