अनसुनी अनुराधा – 1 : एक प्यार उजाला रत्ती भर

अनुराधा आज फिर एक नये सफर  और एक नई मंज़िल की ओर बढ़ रही है.. यूँ तो अनुराधा ने बहुत से अनकहे, अनसुने किस्से सुनाए पर ये कुछ खास है खुद मेंं. ये कहानी है दो सहेलियों की..जिनमे प्यार कम,, परवाह ज्यादा थी.. एक दूसरे का ख्याल कम फ़िक्र ज्यादा थी,,, अपने वो गाना तो सुना ही होगा .. बेचारा दिल क्या करे ..सावन ढले.. भादों ढले.. फिल्म थी-‌ ” खुशबू..
‌ कहानी एक छोटे से गांव की है यूँ तो बहुत से सम्प्पन परिवार रहते थे,, लेकिन ठाकुर साहब की बात थोड़ा अलग थी गांव मे,, मान ,, सम्मान,, इज़्ज़त,, रुतबा,, सभी कुछ तो था । और ये सब अभी से नहीं दादा,, परदादा,, की इकट्ठी की गईं जायदाद का हिस्सा था, ठाकुर साहब के घर लड़को के ही नही ,, उनकी बेटियो के भी रिश्ते घर पर आते थे। समस्त परिवार एक साथ रहता था। ठाकुर साहब तीन भाई थे। बड़े भाई अपने परिवार के कर्तव्यो से फरीक, घर , जमीन, और छोटे भाइयों की ज़िमेदारी बख़ूबी निभा रहे है।

‌ आज बात कर रहे है ठाकुर परिवार के बीच वाले भाई जिनकी बेटि का नाम उजाला है,, उजाला के ड़ो छोटे भाई और भी है,, पिता और चाचा , ताऊ की बहुत लाडली, और माँ ,, माँ की दुनिया का सूरज तो जैसे उजाला से ही शरू होताऔर उजाला पर ही अस्त ,,पढ़ाई के साथ साथ घर के कामो मे माँ की मदद करना ..चाची , ताई की सेवा करना,, उनका कहा मानना उजाला के गुण है। गांव मे लड़कियों के पढ़ने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता इस लिए बारवी की परीक्षा ख़त्म होते होते घर वालो ने तय कर लिया उजाला की शादी कर देंगे।
आज वो दिन आ ही गया ,, जैसा घर वालो ने सोचा था वेसे घर मे उजाला का रिश्ता हुआ है। उजाला की बचपन की सहेली,, रत्ती जो है तो गरीब परिवार से पर दोस्ती पर गरीबी , अमीरी का फर्क नहीं पड़ता।
रत्ती उजाला के साथ, उजाला की तरह स्कूल तो नहीं जाती थी,, लेकिन उजाला ने अपनी किताबो से उसमे ज्ञान की जोत जला दी थी। उजाला के कपडे पहन कर ही बड़ी हुई थी। तेज़ धुप मे उजाला की चप्पेल ही उसका सहारा बनी। रत्ती की माँ खेतो पर काम भी करती थी। और पिता सारा दिन घर पर बैठा समय काटता था।
रत्ती उजाला के हाथों को मेहँदी से सजा रही थी। बात करते करते कभी कभी दोनों की आँखे भर आती, कभी माँ से , कभी ताई से दोनों एक ही सवाल करती …लड़कियों को ही क्यू जाना पडता है सुराल,, रत्ती की माँ भी पूरी तरह शादी के कामो में सारा दिन व्यस्त रहती। नए रिश्ते जुड़ना ,, पुरानो की थोड़ी दूरी बनाना ,, बड़ा अजीब था ये चलन,, लेकिन चलना तो इसी तय रास्ते पर है सबको।
आज शादी का दिन भी आ गया । हर कोई अपनी जिम्मदारी का जिम्मेदार था। आज उजाला और रत्ती सारा दिन रत्ती भर भी अलग नहीं हुई साथ बैठी रही। आज तो जैसे कुछ बाते बची ही नहीं करने को,, दोनों को एक ही गम कल दोनों अलग हो जायेगी। पुरे सावन साथ रहने वाली रत्ती , उजाला अब कहाँ बारी बारी से एक दूसरे को झूला पायेगी,, जब रत्ती की माँ खेतो पर काम करती दोनों सहेलिये मिनटों मे अपनी छलांग से सारा खेत नाप देती। एक साथ कितनी होली , कितनी दिवाली मनायी,, एक साथ एक ही थाली मे कितनी बार खाया खाना। सब.. जैसे सब बदल जायेगा,, सब दूर …
उजाला शादी की रस्मो मे व्यस्त, रत्ती ने एक पल भी उसका साथ न छोड़ा . गांव की औरते हँसी कर रही थी… अरी ..साथ ही जायेगी क्या… पर न रत्ती को किसी की परवा,, न उजाला उसे छोड़ना चाहती थी। उजाला विदा हो रही थी,, उजाला की आँखे रत्ती को ढूंढ रही थी,, अभी तो थी यही मेरे साथ .. रत्ती मे हिम्म्त नहीं थी उजाला को जाते देखे,,, रत्ती कही खिड़की का एक कोना पकडे रो रही थी,, उजाला दूर और दूर आँखों से होती जा रही थी।
नम आंखे लिए सभी रिश्तेदार भी चले गए। अब यहाँ रत्ती वहाँ उजाला भी जैसे ज़िन्दिगी के बनाये तरीको के आगे नतमस्तक थी। रत्ती की माँ को भी रत्ती के ब्यह की चिंता होने लगी थी। एक दिन हिम्मत कर छोटी ठाकुराइन से बात छेड़ ही दी। और कुछ ही दिनों मे ठाकुर साहब ने ठीक ठाक घर देख रत्ती को भी अपनी बेटी की तरह विदा किया ।
रत्ती की शादी पर उजाला भी आई थी,, दोनों साहेलिये बहुत दिनों बाद मिली बातें खत्म ही नहीं हो रही थी। उजाला ने ही जिद कर रत्ती के शादी की सारी रस्मे अपने घर से ही कराई थी। रत्ती की माँ तो जैसे बार बार पैरों मे गिरी जा रही थी। बहुत उपकार , बहुत उपकार बोल बोल कर जबान जैसे थक ही नहीं रही थी,, वही बेसुद रत्ती के पिता को तो जैसे कुछ पता ही नहीं था कि बेटि का रिश्ता कहाँ हुआ , कैसा हुआ,, लेकिन कहते है करने वाला तो भगवांन है उसने तो सब सोच रखा था।
अब दोनों सहेलिये अपने अपने घर खुश थी। और दोनों सोचे बैठी थी की इस बार हम दोनों सावन मे अपने घर जायेगे ,, और दोनों को ही जल्दी थी की कब कोई संदेसा आये माँ के यहाँ से,,
लेकिन भगवान की बनाई फिल्म मे वो हर सीन अपनी मर्ज़ी का डालता है,, इंसान से नहीं पूछता,, उजाला जब गांव पहुँची तो तांगे से उतरते ही अपनी माँ के गले लगी,, उसके बाद ताई , चाची और सभी बड़ो का आशीर्वाद लेते ही .. पहली पंक्ति .. माँ रत्ती.. रत्ती आ गई क्या. पहले कुछ खा तो लो इतनी देर की चली हो. नहीं माँ मै रत्ती को ले कर आती हूं फिर दोनों साथ ही खायेंगे.
माँ उजाला का कस के हाथ खिंचती हुई बोली -..रूको उजाला.. तुम अभी वहाँ नहीं जा सकती,, उजाला माँ को घूरती हुई.. अरे वा.. क्यू भला.. आज काकी का चौथा है.. उजाला पागल सी देखती हुई..किसका ,,, किसका चौथा है..माँ समझती हुई.. हाँ बेटा .. रत्ती की माँ को आज चार दिन ही गए ..चली गई दुनिया से.. उजाला एक साथ न जाने कितने सवाल कर रही थी..
माँ सब बताती रही.. एक दिन पहले रात को काका और काकी मे किसी बात को ले कर बहुत झगड़ा हुआ था ,, रात भर तुम्हरी काकी बहार बैठी रही,, सुबह जब खेतो पर काम करने जा रही थी तो खुद को खूब कोस रही थी,, भगवान सुनता भी नहीं,, ऊठा ले मुझे,,, और हमारे ही खेत पर उस दिन न जाने क्या हुआ ,, ट्यूबेल की तार कही से टूटी और काकी का पैर पड़ गया ,,, और काकी वही,,,, माँ कहते कहते रो पड़ी.. उजाला आंधी, हवा बन न जाने कब रत्ती के घर.. रत्ती दिवार से सर लगाए बैठी थी,, उजाला को देखते ही.. जैसे .. उठ खड़ी हुई,, और गले लग न जाने कितनी देर रोती रही.. तू कहाँ थी,, कहा थी तू..बस यही एक लाइन रत्ती बार बार बोल रही थी.. और ये सावन दोनों की आँखों से बरस रहा था।।।
आज फिर एक बार ज़िन्दिगी के फैसले के आगे दोनों सहेलियो ने सर झुका दिया था,, और अपने अपने घर की जिम्मदारी संभाल ली थी। बच्पन बहुत दूर निकल चुका था,, जीवन के पन्ने पढ़ने, पलटने आ गए थे.. बहुत दिन बीत गए .. पीहर की गलियों की याद दुबारा उजाला को सता रही थी,, लेकिन घर की जिम्मेदारी,, और जिम्मेदार होने का खिताब बहुत भारी पड़ रहा था कंधों पर.
 माँ की चिट्ठी आती है . और गांव की खुशबू भी साथ लाती है.. लिखावट तो बड़े भैया के हाथों की थी,,, पर याद सब की आ रही थी,, की उड़ के पहुँच जाऊ.. मन पकक्का कर के जवाब दे दिया माँ अभी काम बहुत है घर मे शहर से बड़े बड़े आर्डर आ रहे है ,, और घर पर व्यपारियो का आना जाना भी रहता है..तो यहाँ भी माँ अकेली पड़ जाती है,, नवरात्रे खत्म होते ही आऊँगी,,, हफ्ते भर के लिए।। और माँ ताऊ जी से कह कर रत्ती के ससुराल भी खबर करवादे की अगर वो भी आ जाये तो,,,
नवरात्रे भी निकल गए,, और उजाला भी अपने ससुराल से निकल पड़ीं माँ के घर के लिए.. आज फिर तांगे से उतरी,, आज फिर माँ के गले लगी ,, आज फिर ताई, चाची, से मिली,, आज फिर सब बड़ो का आशीर्वाद लिया.. आज फिर वही सवाल दोहराया.. माँ रत्ती आ गई क्या..?? आज फिर माँ ने कहा ..कुछ खा तो ले ..सुबह की चली है.. आज फिर उजाला रत्ती के घर की और दौड़ी ..आज.. फिर… माँ ने उजाला का का हाथ कस के पकड़ा.. और खुद ही ज़मीन पर गिर गई और माथा पकड़ रोने लगी.. उजाला रत्ती.. उजाला .. का दम… निकल गया.. क्या हुआ माँ रत्ती को… माँ रोती हुई ..अरे उसे कुछ हो जाता तो ही अच्छा था..
उजाला माँ को हिलाते हुए..माँ,,, माँ.. चाची तुम ही कुछ बोलो.. उजाला रत्ती रत्ती.. बर्बाद हो गई..उसका पति..उजाला चखती हुई..आज फिर दौड़ी ..रत्ती,, रत्ती,,, आज फिर रत्ती दिवार से सर लगाये.. पत्थर बनी बैठी थी,, आज बस उजाला रो रही थी चीख रही थी,, एक सड़क हादसे मे पति की मौत हो गई,, ससुराल वालों ने मनहूस कह घर से निकाल दिया,, कोई और रास्ता तो पता नहीं था,, बस अपने गांव आना ,जाना सिख लिया था रत्ती ने…
दोनों सहेलिये रात भर साथ रही,, और उजाला ने फैसला किया अभी कुछ दिनों रत्ती को अपने ही घर मे रखेगी और यही रहेगी। पंदरा दिन हो चले थे। उजाला के घर से भी बार बार खबर आ रही थी।
आज उजाला ने अपने घर चिट्ठी डाली .अपने पति के लिए आप आये और हमे ले जाये..
ठीक दो दिन बाद उजाला के पति आ गए ,, रत्ती खुद को मजबूत दिखाती हुई उजाला की विदाई की तैयारी कर रही थी,,, की उजाला रत्ती का हाथ पकड़ बैठक मे सभी बड़ो और अपने पति के सामने खड़ी हो जाती है.. उसे भी पता था ये घर मे बेअदबी है,, घर की लड़किया और बहुएं, कभी बैठक मे जाने की हिम्मत नहीं करती थी,, और सभी लोग देख कर .. बोलो बेटि क्या काम है ..अपनी ताई से कह देती.. उजाला गहरी सॉस लेती हुई..ताऊ जी ..मुझ मे और रत्ती मे क्या फर्क है ..ये कैसा सवाल है,, ये पूछने आई हो..ताऊ जी जवाब देते है.. नहीं पहले बताओ ताऊजी.. ताऊ जवाब देते हुए..तुम दोनों ही इस घर की बेटी हो और क्या..
रत्ती कुछ समझ नहीं पा रही थी,,, और हाथ छुड़ा कर अंदर घर मे जाना चाहती थी,, उजाला ,, कुछ रुक कर.. तो ताऊजी अगर हम दोनों ही इस घर की बेटि है तो आज दोनों ही विदा होंगे..इस घर से..ताऊजी ..क्या मतलब.. जी ताऊजी उजाला आज आँखों मे आंखे डाल कर बात कर रही थी,,,
आज रत्ती की शादी भी अभी और यही होगी,, .. पिता जी, और चाचा जी अपनी अपनी जगह से उठ गए .. लड़की पागल तो ना हो गई,, कही चौराहे पर पैर पड़ गया क्या.. नहीं ताऊ जी मै रत्ती को अपने साथ ले कर जाऊँगी,, अब मेरे पति इसके भी पति होंगे.. रत्ती हाथ छुड़ा कर अंदर भाग गई,,, और कमरा बंद कर लिया ..
वही उजाला अपनी बात पर अड़ी,,, अकेले ही सब का मुकाबला कर रही थी,,, अगर जायेगे तो हम दोनों ही जायेगे नहीं तो यही रहूगी मै भी,, घर की तेज़ होती आवाजे सुन रत्ती बहार आई और उजाला के हाथ पैर जोड़ने लगी,,, पागल ये किताबे नहीं जो हम बाट ले,, ये तेरे कपडे नहीं जो मै ख़ुशी ख़ुशी पहन लू,,
उजाला रत्ती को गले लगाते हुए बोली- पागल, तुझे किताबें दीं कि तू स्कूल नहीं जा सकती थी,, पर कही न कही मेरे बराबर खड़ी हो सके,, तुझे कपडे दिए की तू खुद को कम न समझे मेरे बराबर खड़ी हो सके,, कभी तुझ को खुद से अलग नहीं समझा ,, फिर एक रिश्ता जो अभी कुछ ही महीनो पहले जुड़ा वो हमारे बीच कहाँ से आ गया,, कुछ भी हो जाये अब अब तुझे अकेला नहीं छोडूगी,,, एक बार खुद से अलग कर के देख लिया ..अब नहीं.. और उजाला की जिद सारे घर पर भारी पड़ी,, सच मे घर से दो बेटियों की विदाई हो रही थी.. अनुराधा भी पास खड़ी थी,, अपनी नम आँखों के साथ.