ansuni anuradha-3: बड़ी हवेली का छोटा घर

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आज फिर आपकी अनुराधा …एक नये सफर ..एक नयी मुलाकात …

मेरी जिंदगी सवारी …मुझ को गले लगा के …बैठा दिया फलक पे…   मुझे खाक से ऊठा के…. कितना खूबसूरत है न ये गाना …कितने सच्चे हैं इसके बोल.. ये भी सच है  … इसकी सच्चाई  का मोल रहा किसी के जीवन मे.. जी हां आज अनुराधा बात कर रही है एक सच्ची दोस्ती की…

गर्मियों की कड़कती दोपहर ..  दुलारी अपने काम से लौटी पसीने मे लथपथ..  कच्चे फर्श पर बैठ  अभी सांस तेज़  चलती साँसों को  जरा आराम दे ही रही थी कि पाँच साल की बेटी अम्रा आकर माँ की गोद  मे धम से बैठ गई – अम्मा, आज फिर भैया ने तीनो रोटी खा ली,, मैने मांगी तो बोला जब अम्मा आएगी बना देगी..

दुलारी की साँसे अब मध्यम हो सी गई थी – ला जरा अम्मा को पहले मटके से पानी तो पिला दे…फिर बना देती  हूं तेरी रोटी..

अम्रा उठी और एक गिलास में माँ को पानी दे दिया…  उधर से राजू भी पसीने मे लथपथ ..लाल मुँह  …घर में दौड़ा चला आता है…

फिर दुलारी राजू को डांटने लगी – क्यू रे राजू…तीनों रोटी खा गया… छोटी को कुछ नहीं छोड़ा..

वो बोला – अम्मा हाथ की रोटी थी नमक वाली,,, बड़ी हवेली वाली काकी ने आज मट्ठा दिया था  बहुत अच्छी लग रही थी तो खा गया… लेकिन मट्ठा तो दिया था न …छोटी को मैने…

दुलारी का पति कहने को तो बड़े बड़े ठेकेदारो  के साथ काम करता था । मिस्त्री का.. अपना पक्की छत का दो कमरों का मकान भी था,, लेकिन गलत आदतों,, और  शराब पीने की लत .. बच्चो और दुलारी की ज़िन्दिगी जैसे नर्क थी,,  कभी घर मे अट्टा होता,, कभी दाल ,, तो कभी पानी ही पी कर सो जाते..दुलारी घरों मे काम करती.. तो बच्चों को दो टाइम की रोटी मिल जाती,,

 राजू को पढ़ने का बहुत शौक था. पास ही बड़ी हवेली वाली काकी जहाँ दुलारी काम भी करती थी, राजू को अपने बेटे की पुरानी किताबे, कपडे और कभी कुछ खाने को भी फेंक देती थी.. स्वभाव की बहुत नर्म थी वो।

दुलारी दिन पर दिन अपने  बच्चो के लिए खूब मेहनत  करती..लेकिन सांस की बीमारी और लगातार खाँसी,, से बहुत परेशान थी,, इस वजह से दो घरों का काम छूट भी गया था,, अब बस खेतो पर कुछ काम और बड़ी हवेली मे जानवरो की देख रेख का ही काम था,, बड़ी हवेली वाली मालकिन ने कितनी बार कहा .. मै पैसे दे देती हू …तू जाकर दावा क्यू नहीं लाती,, हर बार दुलारी कल पर टाल देती.

राजू को अब इतनी समझ आ गई थी,, की माँ बीमार रहती है तो छोटी का ध्यान भी रखना है। और बड़ी हवेली की मालकिन का बेटा…आजाद ..उसका सबसे अच्छा दोस्त भी बन गया था,, उसकी पुरानी किताबे पढते पढते…. अब उसकी बराबरी करने लगा था,, जो सवाल मास्टर जी उसे देते,, वो चुटकियों मे हल निकाल देता,, 

आज दुलारी काम से जल्दी घर चली गई …  उसी के साथ खेत पर काम करने वाली  .. ममता काकी जो आई थी.. न जाने उसने माँ के कान मे क्या कहा.. कि माँ जानवरों को खुला छोड़ चली गई,,  राजू पहले तो इंताजर करता रहा माँ बड़ी हवेली ही वापस आएगी,, बहुत देर देखा ..नहीं आई ..राजू जानवरो को चारा, पानी, डाल कर घर की और निकल गया..  आज़ाद भी चिल्लाते हुए राजू को आवाज दे रहा था… कि दौड़ता हुआ उसके घर पुहुच गया,,, दोनों ही कभी घर के सामने खड़ी भीड़ देखते ….कभी एक दूसरे को..

घर कुछ ही दूर था..जैसे जैसे वह घर की और  बढ़ रहा था ,,, आवाजे कुछ ,,, और ,,, कुछ और तेज़ होती जा रही थी..क्या हुआ.. राजू फटी हुई सी आँखों से देखते हुए और तेज़ कदमो से आगे चलता जा रहा था,, छोटी भी रो रही है..

अंदर माँ अधमरी ज़मीन पर पड़ी थी,, बापू आज दिन मे ही नशा कर आये थे,, और ये कौन???  है लाल साड़ी मे…

सात साल के राजू को कुछ समझ नहीं आ रहा था,,, बापू चिल्लता रहे थे,, तू अपने बच्चो को ले और कही भी मर ये अब हमारे साथ ही रहेगी,,,  मालकिन बन के,,,,,, और राजू और छोटी क़ो आदेश मिला नई माँ है तुम्हारी ……

अब घर मे एक  मेंबर  और  बढ़ गया था,, ओर झगड़ा भी,,  बापू बढ़िया बढ़िया चीज़ नई माँ के लिए रोज़ लाते ,, और  दुलारी अपने बच्चो के लिए लड़ती,, माँ दिन पर दिन और बीमार होती जा रही थी,, लेकिन काम से छुट्टी नहीं लेती,,,      आज रात बहुत तेज़ बारिश हो रही थी,, दुलारी जैसे एक  मिनट भी नहीं सोई थी,, लगातार खांसे जा रही थी,,  राजू बेचारा बार बार उठता.. कभी माँ की कमर सहलाता,,, कभी पानी पिलाता,,,  रात का एक बजने को था,,

राजू ने देखा .. बापू बाहर आये .. और माँ को दो थपड़ लगा कर बोले ये इलाज है तेरा,,, न सोती ,, न सोने दे रही है,,, अंदर से नई माँ ने आवाज दी,, छोड़िए ,, अब आ जाओ,, वैसे भी रात तो काली हो ही गई है,,,

दोनों बच्चे ये देख रोने लगे,,, राजू छोटी को चुप करता , करता जाने कब खुद भी सो गया,,,      बीच मे राजू की आंख खुली तो माँ बैठी थी,, बार बार धोती के कोने से अपना महुँ पौछ रही थी,, ये देख राजू भी सो गया,,

 सुबह छोटी  राजू के पास बैठी,, खेल रही थी कि आवाज सुन राजू भी उठ गया,, तभी छोटी बोली भैया भूख लगी है ,, माँ को उठाओ न,, राजू उसे रोकते हुए,, माँ रात भर नहीं सोई,, सोने दे,, मै काकी के यहाँ से कुछ लाता हूं..

सुबह सुबह,, काकी ने  थोड़ा सा सत्तू एक कागज मे लपेट दिया.. अब दोपहर हो चली थी,, दुलारी बेसुध  पड़ी थी,, कि बड़ी हवेली से नौकर आता है,, राजू आज माँ काम पर नहीं आएगी क्या..

 पता नहीं … सो रही है पूछ लो… नौकर …दुलारी , दुलारी चिलाते हुए जाता है,, हिलाता , डुलाता है,, पर दुलारी हो तो कुछ बोले,, दुलारी नहीं उसका मृत शरीर था बस.

 तभी बड़ी हवेली खबर पहुचती है,, राजू छोटी को गोद मे ले … कुछ तो हुआ है पर कुछ समझ नहीं आ रहा,,,  राजू अंदर जाता है ,,, माँ ,, माँ कोई आवाज नहीं,, कोई उत्तर नहीं,,, अंदर से नई माँ चिलाती हुई,,, अरे क्या हो गया,,, क्यू घर सर पे उठा रखा है,,,  तभी   बराबर से काकी आती है ,,, और दोनों बच्चो को अपने घर ले जाती है.

राजु और छोटी अपने ही घर के सामने पड़ोसियों की तरह पल रहे थे..

बड़ी हवेली वाली काकी का दिल भी हवेली जैसा ही है। आज  राजू और आज़ाद एक ही कंपनी  मे बड़े अधिकारी है। छोटी अपने घर,  राजू के पिता को राजू और छोटी ने आखरी समय उनके अंतिम संस्कार से पहले देखा था.. नई माँ भी कुछ समय बाद उन्हें छोड़ कर चली गई थी।