Supreme Court’s major decision on Aravalli mining (सुप्रीम कोर्ट का अरावली खनन पर बड़ा फैसला): 10 साल खारिज अब मंजूर

On: December 24, 2025 1:10 PM
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Aravalli mining को मंजूरी मिली: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के प्रस्ताव को दी स्वीकृति

Aravalli mining

10 साल पहले खारिज, अब मंजूर: अरावली खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के प्रस्ताव को स्वीकार किया। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन साधने की दिशा में बड़ा कदम है। हरियाणा-राजस्थान सीमा पर अरावली खनन को लेकर लंबे विवाद के बाद अब सस्टेनेबल तरीके से काम शुरू हो सकेगा।

अरावली खनन का मुद्दा 2015 से चल रहा है, जब केंद्र सरकार ने पहाड़ियों की परिभाषा तय करने के लिए 100 मीटर ऊंचाई का फॉर्मूला पेश किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे पहले खारिज कर दिया था, क्योंकि पर्यावरणविदों का कहना था कि इससे अरावली की पारिस्थितिकी को खतरा होगा। लेकिन अब कोर्ट ने केंद्र के संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसमें वैज्ञानिक माइनिंग प्लान और सख्त पर्यावरण नियम शामिल हैं। यह फैसला उत्तर भारत की हवा और पानी की गुणवत्ता के लिए अहम साबित हो सकता है। राजस्थान और हरियाणा में मौजूदा खदानों को ही सीमित रखा जाएगा, नई लीज पर रोक रहेगी।

अरावली खनन को लेकर Save Aravalli कैंपेन तेज हो गया था। पर्यावरण मंत्री ने स्पष्ट किया कि परिभाषा में कोई बदलाव नहीं किया गया, बल्कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर फोकस है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी समिति की रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला लिया, जिसमें कहा गया कि बिना वैज्ञानिक प्लान के खनन से पहाड़ियां खत्म हो सकती हैं। अब केंद्र को चार राज्य—हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली—के साथ मिलकर यूनिफॉर्म डेफिनिशन बनानी होगी। इससे अरावली खनन केवल नियंत्रित क्षेत्रों तक सीमित रहेगा।

अरावली खनन के समर्थक कहते हैं कि इससे स्थानीय रोजगार बढ़ेगा और निर्माण सामग्री सस्ती होगी। राजस्थान जैसे राज्यों में चूना पत्थर और अन्य खनिजों की डिमांड ज्यादा है। लेकिन पर्यावरण एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि पहाड़ियां कटने से दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ेगा और रेगिस्तान फैल सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि हर खदान के लिए पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन जरूरी होगा। अरावली खनन 100 मीटर नियम के तहत अब साइंटिफिक तरीके से होगा, जिसमें रीफॉरेस्टेशन भी शामिल है।

पहलूफायदेनुकसान
आर्थिकस्थानीय रोजगार, सस्ती सामग्रीलंबे समय में पर्यावरण क्षति
पर्यावरणनियंत्रित खनन से संरक्षणहवा-जल प्रदूषण, जैव विविधता हानि
सामाजिकविकास परियोजनाओं को गतिस्थानीय समुदायों पर असर

यह तालिका अरावली खनन के दोनों पक्षों को स्पष्ट करती है। केंद्र सरकार का PIB स्टेटमेंट कहता है कि पारिस्थितिकी की रक्षा पहले रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की एकसमान परिभाषा तय की थी, जिसमें मौजूदा खदानों को चलाने की इजाजत दी गई। अब दिसंबर में केंद्र के प्रस्ताव पर मुहर लग गई। जस्टिस ने कहा कि बिना प्लान के खनन ‘डेथ वारंट’ जैसा है। अरावली खनन पर नई लीज बैन रहेगी, लेकिन पुरानी को रिन्यूअल मिल सकता है। यह फैसला हरियाणा के महेंद्रगढ़ और राजस्थान के अलवर जैसे इलाकों को प्रभावित करेगा। राजनीतिक रूप से BJP ने इसे विकास का संकेत बताया, जबकि विपक्ष ने पर्यावरण खतरे की चेतावनी दी।

अब चारों राज्यों को साइंटिफिक माइनिंग प्लान जमा करना होगा। अरावली खनन के लिए GPS मैपिंग और मॉनिटरिंग सिस्टम लगेगा। PIB के अनुसार, सतत विकास सुनिश्चित होगा। अगर नियम तोड़े गए तो कोर्ट सख्त कार्रवाई करेगा। यह फैसला न सिर्फ अरावली खनन, बल्कि पूरे देश के माइनिंग पॉलिसी को प्रभावित करेगा। पर्यावरण समूह अब PIL दायर करने की तैयारी में हैं। कुल मिलाकर, 10 साल के इंतजार के बाद संतुलित रास्ता मिला है।

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